बॉलीवुड में तानाशाही का दौर…? ‘उड़ता पंजाब’ गिरता सेंसर

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संपादकीय

सवाल महज ‘उड़ता पंजाब’ के सेंसर कट्स तक का नहीं है। सवाल है एक फिल्म के ‘90 कट्स’ को लेकर जो कोहराम बॉलीवुड में मचा है, वो कितना यथार्थ है? सेंसरबोर्ड के सर्टिफिकेट और सेंसर प्रमुख के वक्तव्य के बाद-बात को अदालत तक पहुंचाना दर्शकों के लिए एक छलावा नहीं तो और क्या है? इस हो हल्ले का फायदा फिल्म को मिलेगा, साख गिरी है सेंसर बोर्ड की और इस हो हल्ले का लाभ ले रहे हैं राजनैतिक दल! तात्पर्य यह कि लोकतांत्रिक-बॉलीवुड में तानाशाही का आगाज हो गया है।

फिल्म की विषयवस्तु (ड्रग्स) पर आपत्ति है तो इसमें हर्ज क्या है ? देवआनंद की फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ के समय से सेंसरबोर्ड इस मुद्दे पर कड़क है। सिगरेट के पैकेट तक पर ‘सेचुरेटरी वार्निंग’ लिखी जाती है। यह सरकार की पॉलिसी है। पहलाज जी ने वही किया है जो देश-हित में है। अभिव्यक्ति की आजादी व्यक्ति के ‘जीवित रहने के अधिकार’ से बड़ी नहीं हो सकती! सच तो यह है कि विरोध के स्वर में जो आवाजें उठी हैं उनमें तानाशाही है। पहलाज निहलानी बनाम ऑल हो गये हैं। अनुराग कश्यप ने विरोधियों का एक ग्रुप बनाकर खड़ा कर दिया है। अनुराग चमकते प्रोड्यसूर-डायरेक्टर हैं, उनके साथ सब हैं। पहलाज बुझते प्रोड्यूसर हैं उनके साथ कोई नहीं है। अनुराग कश्यप जब भी कुछ बनाते हैं, पहले से सोच के रखते हैं कि उनकी फिल्म में बवाल क्या रहेगा। अगर ‘पंजाब’ को वह इंगित कर ‘वार’ कर रहे हैं तो उनकी पिछली फिल्म ‘वासेपुर’ में क्या था। ‘बिहार’ भी तो सवाल बन सकता था ? बात मुद्दे की नहीं है फिल्म को चलाने के लिए मुद्दा बनाने की है। इस बार राजनैतिक रोटी सेंकने की कोशिश ने इसे एक और रंग दे दिया है। पहलाज जी बॉलीवुड के ‘सेंसर’ में आखिरी तानाशाह दर्ज हो सकते हैं- मगर सच यह है कि अब फिल्मी-दुनिया में तानाशाही का दौर आ चुका है! और, दर्शकों को भी यह सच समझ लेना चाहिए।


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Mayapuri

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