वर्षों बाद भी ’…पिया मन भाये’ की दुल्हनिया रामेश्वरी का मानना है – ‘हर आदमी चाहता है उसकी बहू कम्मो जैसी हो…’

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-शरद राय |  वो एक यादगार साल था…जब एक साल में 29 फिल्मों ने कामयाबी के झंडे गाड़े थे। वो दौर अमिताभ बच्चन की फिल्मों का था। 1977 में कुछ अलग रंग की फिल्मों ने भी कामयाबी हासिल किया था और उसी भीड़ में राजश्री प्रोडक्शन की एक फ़िल्म ने सिनेमा के पन्ने पर नया इतिहास रच डाला था। तब सबकी जुबान पर एकही नाम था “दुल्हन वही जो पिया मन भाये“! हर निर्माता वैसी ही एक फ़िल्म बनाने के लिए आतुर दिखाई दे रहा था। सबकी सोच मे एकही ख्याल था- काश वे भी राजश्री पैटर्न की कोई फ़िल्म बना पाते!

 ’’ उस साल में, सचमुच ’दुल्हन’ को हर ’पिया’ ने इतना पसंद किया कि पसंदगी का वह सिलसिला आज तक जारी है। हर मां बाप को उनकी बहू वैसी ही चाहिए जैसी ’पिया मन भाये’ में कम्मो थी।फ़िल्म की कामयाबी देखकर हमसब हतप्रभ थे !  बाहरी दुनिया मे बहू की कसौटी थी कम्मो ,’सब वैसी ही दुल्हन तलाश रहे थे , तो फ़िल्म इंडस्ट्री में वैसे सब्जेक्ट की तलाश थी। म्यूजिक इंडस्ट्री में वैसे गानों की तलाश थी। हर लड़की ’सपनो के गांव’ में विचरने के ख्वाब पालते बैठी थी। ’ वह फ़िल्म का एक गीतगुनगुनाती हैं-

“ ले तो आये हो हमें सपनो के गांव में, प्यार की छांव में बिठाये रखना…सजना ओ सजना…“

  सचमुच साल 1977 हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के लिए परचम लहराने का साल था।’अमर अकबर अन्थोनी’, ’परवरिश’, ’खून पसीनाः, ’चाचा भतीजा’,:अपनापन’, ’धरमवीर’, ’ड्रीम गर्ल’, ’शिर्डी के साईं बाबा’,:ईमान धरम’, ’हम किसी से कम नहीं’, ’घरौंदा’, ’चोर सिपाही’, ’आपकी खातिर’…’आदि एक से एक सफल फिल्में आई थी। इनके बीच राजश्री की इस एक कम बजट की  फ़िल्म ने ऐसा तीर मारा था जो सभी मल्टी स्टारर बनाने वाले धुरंधरों को सोचने पर विवश किया था। “उस समय सभी की जुबान पर बड़जात्या साहब और राजश्री का नाम था। मैं नई नई हिंदी फिल्मों में कदम रखने वाली लड़की थी , लोग मुझे इतना सर आंखों पर बैठाएंगे, सोच नही सकती थी ! मैं फ़िल्म रिलीज के बाद ही समझ पाई थी कि राजश्री प्रोडक्शन को ऐसे ही फैमिली फिल्मों के लिए नहीं याद किया जाता ! उनके तमगे में तमाम पारिवारिक फिल्में जुड़ी हैं। मैं भी उनकी ही   फ़िल्म से, अपनी पहली फ़िल्म करके बड़ी स्टार बन गई थी।“

    हालांकि यह एक सच्चाई है कि रामेश्वरी ने ’दुल्हन वही जो पिया मन भाये’ के बाद बहुत सी फिल्मों में काम किया, टीवी के लिए काम किया, खुद का प्रोडक्शन शुरू की और वह बिजनेस की दुनिया मे कदम बढ़ाकर इंटरपरेनर भी बनी लेकिन, वो छवि जो उनको दुल्हन की कम्मो बनकर मिला था…शायद नहीं ही मिला। और, यह भी सच है कि जो छाप इस फ़िल्म से फ़िल्म के दादा जी (मदनपुरी) को और फूल वाली नायिका कम्मो को मिला, वो दूसरे कलाकारों को नहीं मिला। वह कहती हैं- “ मैं ऐसी चीजों को भाग्य मानती हूं।“ रामेश्वरी का मानना है। क्लासिक बनाई नही जाती बन जाया करती है। इसके पीछे लेखक निर्देशक लेख टंडन जी और उनकी टीम की मेहनत थी। और नो डाउट राजश्री की मेकिंग और मेकिंग के साथ डिस्ट्रीब्यूशन प्लानिंग का जो उनकी हर फिल्म में दिखता है। और, हमसब ने खूब मन लगाकर काम किया ही था।“

  ’आज के परिप्रेक्ष्य में ऐसी फिल्मों का वजूद क्या है ?“

–  “कहानी वही जो मन को छू जाए ! गीत वही जो मन को भावे- तो परिप्रेक्ष्य चाहे जो हो , वजूद रहना ही रहना है। इस फ़िल्म की कहानी, गीत- संगीत (स्वर्गीय रविन्द्र जैन) सब मन को भाते थे, आज भी वैसे ही लगते हैं तो दुल्हन को कैसे कोई भूल सकता है ! ’’


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Mayapuri

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