पता नही लोगो को मुझमें डाकू क्यों नजर आता हैं – विनोद खन्ना

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015-22 film hatyara Moushumi Chatterjee and Vinod Khanna

 

मायापुरी अंक 15.1974

विनोद खन्ना के सेकेट्री ने मुझे फोन पर बताया कि वे नटराज स्टूडियोज में ‘आखिरी डाकू’ की शूटिंग कर रहे है मैं वही उनसे मिल लूं उन्होनें मुझे लगभग तीन बजे बुलाया था। जब मैं पहुंचा तो मुजरे का सीन फिल्माया जाने वाला था। सैट पर पहुंचते ही ऐसा लगा जैसा मैं किसी बड़े नगर की किसी बड़ी वेश्या के शानदार कोठे पर पहुंच गया हूं चमचमाती दीवारें, कंगन के टुकड़ो से खन खनाते कांच के पर्दे, मुगलशाही कालीन, और बीच में रखी चमकती शराब की सुराही और पान का बीड़ा वल्लाह क्या शान है।

निर्देशक प्रकाश मेहरा ने सिगरेट मुंह से निकाल कर कैमरामैन संतसिंह को इशारा किया तो उनके असिस्टेंट ने सीटी बजायी, सीटी बजने के साथ ही कोने में रखा रिकॉर्ड किया हुआ गाना बज उठा

जब दिल जलाये उमरिया दिवानी तो नदिया किनारे न जाइयो न जाइयो मेरी गली अइयो

और साथ ही घुंघरुओं के साथ रंगीन लंहगा और झिलमिलाती पारदर्शक चुनरी और कसी हुई चौली के साथ डोलती हुई हेलन नाचने लगी। ज्योंही नाच शुरू हुआ कि सफेद पाजमा, आसमानी शेरवानी पहने, आंखो पर सफेद चस्मा डाले घनी मुगलिया काली दाढ़ी वाला एक व्यक्ति जिसके गले में सोने की जंजीर लटक रही थी मसनद पर आ बैठा। आते ही फिर गाना शुरू हुआ गाने के साथ फिर नाच शुरू हुआ और उसने फौरन नर्तकी के हाथों को झटका दे कर अपने बाहुपाश में खींच लिया। नर्तकी अपनी कसमसाती देह के साथ उसे सहलाने लगी और ज्यों ही वह व्यक्ति उन्मत्त होकर उसे चूमने को आतुर हुआ तो झट से बांह छुड़ाकर अलग हो गई और फिर वही गाना वही नाच

जब दिल जलाये उमरिया दिवानी।

वह व्यक्ति पहचान में ही आ रहा था। मैंने और घूरकर देखा अरे यही तो मुगलिया विनोद खन्ना है। वाह क्या गेटअप और मेकअप है। और वह भी अपने आपको छुपाने के लिए फिल्म में भी। वे इस फिल्म में डाकू मंगल सिंह की भूमिका कर रहे है।

शॉट समाप्त होने पर मैं जल्दी से विनोद खन्ना के निकट जा पहुंचा। उन्होनें अपनी सिगरेट सुलगा ली थी। ‘मायापुरी’ के ताजे अंक उनके हाथों में दिये तो पहले कुछ चौंके। बोले आप लोग तो मेरे पीछे भी हाथ धोकर पड़े है। लड़कियों से छेड़छाड़ और वह भी मेरे हाथों। उफ फार गाड सेक मैंने बीच में ही उनकी बात काटते हुए कहा वह चर्चा तो सब जगह हुई है। खैर छोड़िए भी। देखिए हमने आप के बारे में और क्या-क्या लिखा है? और देखिए, ये आपके फोटो, जब मैंने ‘मायापुरी’ के विविध अंको में छपे उनके फोटो दिखाये तो उन्हें संतोष हुआ।

शॉट की तैयारी हो रही थी। मैंने सोचा, बातचीत का इससे अच्छा मौका और क्या मिलेगा। इसी कारण मैंने जल्दी-जल्दी में पूछा क्या आप नायक के रूप में निरन्तर सफलता पाकर खलनायक का चोला पूरा उतार फेंकेगे?

विनोद खन्ना ने सिगरेट का कश खींचते हुए मेरी ओर तेज निगाहों से देखते हुए बोले देखो वकील कभी अपराधी के हक में कानून की लड़ाई लड़ता है तो कभी बचाव पक्ष का वकील बनता है। पर वह चोला यानी चोगा कभी नही उतारता। इसी कारण जो आर्टिस्ट बनना चाहते है वे हर किस्म के रोल करने की चुनौती स्वीकार बनना चाहता हूं न केवल खलनायक। इन दोनों से बड़ा इन दोनों से ऊपर हाड़-मांस का जो इंसान है मैं फिल्मों में उसी को इमेज को उभारना चाहता हूं। मेरा भी वही इमेज होगा। इसी बीच शॉट की तैयारी हो गई। मेरी बातचीत अधूरी ही रह गई।

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Mayapuri