मैं और शबाना बस बाल-बाल बच गए–विजय अरोड़ा

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मायापुरी अंक 16.1975

सन एण्ड सेन्ड होटल में विजय अरोड़ा से मुलाकात हो गई। हमने पहले उनसेउसकी खैरियत मालूम की क्योंकि वह फिल्म ‘कादम्बरी’ की शूटिंग के दौरान दिल्ली में घायल हो गया थे।
खुदा का फज़ल है। विजय ने आस्था भरे स्वर में कहा। उस दिन तो मैं और शबाना बस बाल-बाल बच गए। वरना आज न मालूम किस दुनिया में होते। ‘यादों की बारात’ से आपको अधिक फायदा नही हुआ। इसका क्या कारण है? आप जैसे कुशल, स्वस्थ और सुन्दर व मधुर भाषी हीरो को तो बहुत ज्यादा बिजी होना चाहिए हमने कहा।
“अपनी-अपनी किस्मत की बात है। विजय ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया। “अच्छा इसका क्या कारण है कि इंस्टीट्यूट से आये हुए लड़के भी अभिनेता की बजाए स्टार बनने के चक्कर में रहते हैं। और स्टार बनते ही वह सारी डिसिप्लिन भूल जाते हैं। निर्माताओं को परेशान करने लगते हैं आखिर ऐसा क्यों है? हमने पूछा।
“फिल्म एक कमर्शियल आर्ट है” इसलिए यहां आकर कमर्शियल बनना ही पड़ता है। लेकिन जहां तक निर्माताओं की शिकायतों का सवाल है उसके लिए वे खुद ही कसूरवार है जब देखते हैं कि फ्लां स्टार बहुत ज्यादा बिजी है तो उसे साइन ही क्यों करते हैं? आप कहेंगे कि स्टार साइन ही क्यों करते हैं? लेकिन अगर आपके सामने निर्माता एक भरपूर रकम रख दे तो आप भी साइन कर लेगें। ऐसी सूरत में इंकार में माली नुकसान तो होता ही है किन्तु बदनामी भी होती है। लोग बदनाम करने लगते हैं कि हीरो बढ़ा नकचढ़ा है, घमंडी है, बड़ों का आदर नही करता, न मालूम अपने आपको क्या समझता है? ऐसी सूरत में बताइए करें तो क्या करें ? विजय ने बड़ी गम्भीरत से उत्तर दिया।


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Mayapuri

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