मेरे नसीब में चैन नही –रेहाना सुल्तान

1 min


index

 

मायापुरी अंक 11.1974

आपका नाम रेहाना क्यों रखा गया ?

‘आपसे किसने कह दिया कि मेरा नाम रेहाना है, मैं तो आपके मुंह से पहली बार सुन रही हूं कि मेरा नाम रेहाना है ?

‘आप तो मजाक कर रही हैं!

‘या अल्लाह ! पत्रकारों से मजाक क्या मेरी शामत आयी है कि मैं आपसे मजाक करूं, मेरी तौबा !

‘अच्छा तो मेरी गलती सही, आप कोई और मजेदार बात सुनाइए ?

‘अजी आप तो मैदान छोड़कर भागने लगे, कैसे पत्रकार है आप ? मैं आपकी जगह होती तो धरना देकर बैठ जाती और कहती, नही पहले यह बताइए कि आपका नाम रेहाना क्यों रखा गया ?

‘आप आखिर क्या चाहती है ? आप क्या सुनना चाहते है ?

‘अच्छा तो मैं बाद में आऊंगा, शायद आपकी तबियत ठीक नही है ?

‘अरे आप तो पीछा छुड़वा रहे है। खैर छोड़िये, अब मैं आपको बताती हूं कि मेरा नाम रेहाना क्यों रखा गया ?

‘नही, अब आप पहले यह बताइए कि आपने यह नोक-झोक क्यों की ?

‘ताकि आपके पाठको को अच्छा लगे। मैं जानती हूं कि जो कुछ यहां बीतेगा आप वही सब तो लिख मारेंगे इसलिए मैंने सोचा क्यों न आपको थोड़ा परेशान किया जाये ?

‘ओ हो…तो यह बात है….जी हां…

रेहाना बहुत ही खुशमिजाज और मस्त स्वभाव की अभिनेत्री है. मिलकर मजा आ गया। इतनी साफ-साफ और हाजिरजवाबी देखकर तो सोचा कि आज तो बुरे फंसे, लेकिन वह तो बहुत ही हंसमुख थी उसने बताया।

‘जैसे ही मेरा जन्म हुआ, मेरी अम्मा ने मुझे अपने अब्बा के पास गिरबी रख दिया यानी ‘रेहन’ रख दिया बस, अब्बा हुजूर ने हमारा नाम ‘रेहाना’ रख दिया। अब समझे आप ?

हंसते-हंसते मेरा हाल बेहाल था, कहा, ‘जी समझ गया, बिल्कुल समझ गया, और अब कोई यादगार बात या घटना सुनने की इच्छा है…?

‘आपने अच्छी याद दिलायी। मैं आपको अपने प्रारंभिक दिनों की बातें बताती हूं। यह उन दिनों की बातें बताती हूं। जब मैं बम्बई की लोकल ट्रेनों में बैठी आंसू बहाया करती थी। क्या ?

‘जी हां लेकिन आप खामोशी से पूरी बातें सुनिये, सवाल-जवाब बाद में।

‘ठीक है !

सन् 1967 में मैंने पूना फिल्म एंड टेलिविजन इंस्टीट्यूट से एक्टिंग का डिप्लोमा लिया था। अपने सर्टिफिकेट को बगल में दबाये मैं इधर से इधर भटकती रही। मगर काम नही मिला। चाहे मैं अभिनय के योग्य थी भी या नही। आप सोच रहे होगे कि मैंने मुफ्त में ही ‘उर्वशी’ एवार्ड जीता है। अजी साहब नही, इस मंजिल तक पंहुचने में जितनी रुकावटें आयी, अल्लाह किसी को न दे।

‘पूना से बम्बई आयी तो सर छुपाने के लिए मकान भी न मिला. काफी कोशिशों के बाद एक मकान मिला न खिड़की न रोशनदान। मगर बिजली की सुविधा तो है, चलो यही क्या कम है। लेकिन गाड़ी एक बात पर आकर अटक गयी। डिपोजिट का काला पहाड़ सामने आ खड़ा हुआ। और डिपोजिट भी कुल एक हजार रुपये, कोई सौ-दो-सौ नही। मैं तो इतनी बड़ी राशि सुनकर गश खा गयी। क्या करूं क्या न करूं ? तभी ध्यान आया कि एक अच्छे खासे परिवार से परिचय है उनसे उधार लिया जाये। खुश-किस्मती से उधार मिल गया और मकाने पर कब्जा किया।

‘चलो, एक काम अच्छा हुआ। मैंने सहानुभूति के लिए कहा।

‘क्या खाक अच्छा हुआ। रेहाना बोली, ‘एक दिन मैं रात में कुछ देर से घर आयी। दरवाजे पर दस्तक दी तो अंदर से मकान मालकिन चिल्लायी यह वक्त है घर आने का हमें नही देना तुम्हें मकान। उठाओ बोरिया बिस्तर, भागो यहां से। मैंने विनती की, रात के वक्त कहां जाऊं मकान मालकिन शायद पिछले जन्म की वैरन थी, बोली ‘नही, अभी खाली करो. खैर…किसी तरह इस बात पर राजी हुई कि सुबह उनका मकान खाली कर दूंगी रात बीती। सुबह मैंने अपने डिपोजिट की रकम मांगी तो साफ मुकर गयी और गालियां मुफ्त में सुनायी। रुपये गये सो गये, मगर पड़ौस की एक भली महिला को दया आ गयी तो कहने लगी, चलो हमारे यहां, वहां एक कमरा खाली,

‘उनके यहां कमरा तो मिला, लेकिन एक नये सरदर्द का सामना करना पड़ा। यहां पर एक रेहाना नाम की लड़की थी, जो गलत काम करने में पकड़ी गयी। तो मैं बहुत डर गयी। मुफ्त की बदनामी होने लगी। डर के मारे यह मकान भी खाली कर दिया। उसके बाद खार में एक मकान मिला। इधर-उधर से रुपयों का इंतजाम किया तो कमरे पर अधिकतर जमाया, मगर यहां भी चैन नसीब न हुआ इस बीच एक भी फिल्म नही मिली कोई मेरी तरफ ध्यान भी नही देता था खैर…आपको आश्यर्च होगा, इस मकान से भी नोटिस मिल गया. क्या करें साहब, यह मकान भी खाली कर दिया। सामान जान-पहचान वालों के यहां रख दिया और खुद लोकल ट्रेन में बैठ गयी। और रोती रही, अपनी किस्मत को कोसती रही।

‘मगर एक दिन मेरे जीवन में भी बहारें आयी। दस्तक’ और चेतना प्रदर्शित हुई। मेरा अभिनय सराहा गया मेरा परिश्रम, मेरा दर्द, मेरा दुख, रंग लाया, दर्शकों ने मुझे हाथों हाथ उठा लिया। और मेरा नाम रेहाना सुल्तान सब पर छा गया. शायद आप पर ज्यादा. तभी तो आपने पूछा, ‘रेहाना, नाम क्यों रखा गया ?

‘अच्छा अब नही पूछेंगे…बल्कि आपको ही कहने देंगे, कुछ और कहेंगी ?

‘क्यों नही, हम तो अभिनेता है. जनाब थकते नही…जो कुछ कहेंगे सच कहेंगे

‘सच के साथ अभिनय भी तो करती है आप ?

‘नही, अभिनय तो परदे पर….और फिर आपके सामने अभिनय की क्या जरूरत…अच्छा अभिनय के बारे में कुछ कहूं…अभिनय एक मौलिक चीज है. वैसे मैं परदे पर भी अभिनय नही करती बल्कि जैसी हूं वैसी ही नजर आती हूं वैसी ही दिखती हूं. वैसे हर इंसान अभिनेता है. मैं परदे पर आ गयी तो ‘एक्ट्रेस’ बन गयी.

‘शादी के बारे में आपका क्या ख्याल है ? ‘किसकी शादी ?

‘आपकी ? और किसकी ? ‘अभी कोई इरादा नही..

आपको अपनी फिल्म दिल की राहे अभी तक प्रदर्शित क्यों नही हुई ?

शायद वह अभी तक ‘राह’ न पा सकी है.

‘चेतना के बाद आपकी कोई और फिल्म नही हिट’ हुई ?

‘अगर मैं चेतना’ जैसी फिल्मों में ही अभिनय करती तो मेरी हर फिल्म सुपरहिट होती… वैसे अब दर्शको का टेस्ट बदल रहा है.

तभी सेट पर से बुलावा आ गया…मैं कुछ और पूछता, लेकिन तभी रेहाना जाते-जाते कहने लगी, अपने पाठकों से मेरा सलाम कहिएगा.

रेहाना से हुई इस छोटी मुलाकात के बीच मैंने महसूस किया कि फिल्मउद्योग में ‘ग्लैमर-गर्ल की जरूरत ज्यादा है. साधारण-सी दिखने वाली अभिनेत्रियों का यहां कोई मोल नही, मांग नही, मान नही…

यह कितनी हास्यास्पद बात है कि जिस अभिनेत्री को उर्वशी एवार्ड मिला है, आज उसी अभिनेत्री के पास अपनी अभिनय-प्रतिभा दिखाने के लिए एक भी ढंग की फिल्म नही है. और जिस फिल्म में उसने अपने अभिनय का प्रदर्शन किया है, वही डिब्बों में बंद है अगर इस देश का, इस समाज का यही हाल रहा तो कोई लीक से हटकर कदम बढ़ाने का साहस कैसे करेगा ?


Mayapuri