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‘‘क्लासिक या कल्ट फिल्म को ‘सेल्फ’ में रहने दो, उसका रीमेक मत करो.’’ – चंद्रा बारोट

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1978 की अमिताभ बच्चन व जीनत अमान के अभिनय से सजी सफलतम व कल्ट फिल्म ‘‘डॉन’’के निर्देशक चंद्रा बारोट उसके बाद से गायब थे.पूरे 37 साल बाद वह बतौर निर्देशक फिल्म ‘‘हम बाजा बजा देंगे’’ लेकर आए हैं। जबकि उसी पुरानी ‘डॉन’ का रीमेक बनाकर फरहान अख्तर भी काफी शोहरत बटोर चुके हैं.1978 से 2015 तक के अनुभवो को लेकर चंद्रा बारोट से हुई बातचीत इस प्रकार रही.

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फिल्म डॉन’’ के बाद अब काफी समय गुजर गया.जब आप फिर से निर्देशन के क्षेत्र से जुड़े हैं?

-मुझ पर तिगुनी ‘शनि की साढ़े साती’ लगी थी. मेरे ज्योतिषि ने मुझसे और मेरे मित्र विजय आनंद से कहा था कि,‘अब तुझ पर तिगुनी शनि की साढ़े साती’लगने जा रही है. तिगुनी शनि की साढ़े साती’ के बाइस साल कैसे गुजरे, ईश्वर ही जानता है.फिर 2000 में जया जी ने मेरी मुलाकात सहारा श्री करवायी और 2000 से 2012 तक मैंने सहारा चैनल में काम किया.फिर मेरी मुलाकात अनूप जलोटा जी से हुई, जो कि इन दिनों छोटी फिल्मों के पालनहार बने हुए हैं। उन्ही की वजह से मैने फिल्म ‘‘हम बजा देंगे बाजा’’ निर्देशित की,जो कि हाल ही में रिलीज हुई है.इस फिल्म की कहानी मेरी पत्नी दीपा बारोट ने लिखी.इस कहानी को सुनकर अनूप जी ने कहा कि वह फिल्म बनाने को तैयार है.फिर मेरी पत्नी ने मुझसे इसका निर्देशन करने के लिए कहा. पत्नी को मना कर नहीं सकता था. पर अच्छी बात यह रही कि मैं डिजिटल मीडियम को समझ सका.

फिल्म‘‘हम बाजा बजा देंगे’’क्या है?

यह फिल्म दो भाईयों की है.जिसकी ज्यादा तर शूटिंग हमने राजस्थान में की.इसमें बड़े भाई की भूमिका में जैकी श्राफ व उनकी पत्नी की भूमिका में शीबा हैं.छोटे भाई की भूमिका में नया लड़का अनिकेत विश्वासराव है.यह अमीर परिवार है.छोटे भाई को इस बात की तकलीफ है कि आए दिन अखबार में उसके बड़े भाई के दान व अन्य अच्छे कर्मो को लेकर फोटो छपती रहती है। खुद को लोकप्रिय करने के लिए एक दिन वह अपने चार दोस्तो के साथ मिलकर मीडिया के सामने एक लड़की का अपहरण कर लेता है.पता चलता है कि वह लड़की मुख्यमंत्री की बेटी है.तब वह उस लड़की से माफी मांगकर बताता है कि उसने ऐसा क्यों किया.लड़की अपने पिता को फोनकर कह देती है कि घबराने की बात नहीं है.यह लड़के नेकदिल हैं और वह कल घर वापस आ रही है.मगर इसी बीच मामला बिगड़ जाता है.फिर यह हीरो अपने चारो साथियों के साथ मिलकर लडकी को आईएस आई के चंगुल ऐसे छुड़ाकर लाता है.

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37 वर्षों में क्या बदलाव देखते हैं?

हमारा समय स्वर्ण काल था,जो कि नहीं आने वाला. पहले पूरी युनिट के बीच अपनापन था.इमोषंस थे.पूरी यूनिट के लिए निर्माता के घर से खाना बनकर आता था.कलाकार और फिल्म की युनिट का हर सदस्य एक साथ बैठकर खाता था.अब सब कुछ व्यावहारिक हो गया है.सारे कलाकार अपनी फाइव स्टार होटल जैसी सुविधा से युक्त वैनिटी वैन से बाहर नहीं निकलते थे.यदि आप मुंबई से बाहर षूटिंग के लिए जाते हैं, तो स्टार कलाकारों के साथ चार पांच लोग अलग से जाते हैं और उसका खर्चा भी निर्माता को देना पड़ता है.पहले यदि कलाकार अपने साथ किसी को ले जाता था,तो वह निर्माता से कहता था कि इसकी टिकट निकाल ले,पर वह पैसा वह देगा.बेवजह के खर्च के चलते फिल्म की लागत बढ़ गयी है.मैं उदाहरण देना चाहूंगा.मेरी फिल्म ‘डॉन’ तीन घंटे की थी, जिसमें पांच गाने थे.पूरी फिल्म की लागत 84 लाख रूपए थे.जबकि शाहरूख खान वाली ‘डॉन’ के एक सीन के फिल्मांकन की लागत 84 लाख रूपए आयी.आज की तारीख में क्रिएटीविटी पर मार्केटिंग हावी हो गयी है.हमारे जमाने में हम और अमिताभ बच्चन रात में निकलते थे कि हमारे फिल्म के पोस्टर कहां कहां लगे हैं? हम दोनों थिएटर में बैठकर दर्शकों के रिस्पांस को जानने की कोशिश करते थे.पर हमें भी समय के साथ बदलना पड़ता हैं.मैं आपको बता दूं कि यष चोपड़ा की फिल्म की शूटिंग के दौरान पूरी युनिट का खाना यश चोपड़ा के घर से आता था.अब ऐसा कहां होता है? पर मैंने फिल्म ‘हम बाजा बजा देंगे’ की शूटिंग के दौरान वैसा ही करने की कोशिश की.इस फिल्म की शूटिंग के लिए हम राजस्थान गए थे.75 लोगों की युनिट के लिए तीन नॉन वेजिटेरियन और दो वेजिटेरीयन कुक हम मुंबई से अपने साथ लेकर गए थे,जो कि सभी के लिए नाश्ता से भोजन तक बनाकर दे रहे थे.लोग आज भी मेरा जमाना याद करते हैं। फिल्म ‘डॉन’ के समय मैंने फाइव स्टार होटल शेरेटॉन के साथ डील की थी और अपने फाइटरों को भी मैंने फाइव स्टार होटल में रूकवाया था। सबका कंवेंस हमने डबल कर दिया था.लोग आज भी मेरा नाम लेते हैं.

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रीमेक फिल्मों को लेकर आपकी अपनी क्या राय है?

मैं रीमेक फिल्मों के खिलाफ हूं. के आसिफ ने ‘मुगल ए आजम’ बनायी.इस फिल्म को बनाने के लिए उसने कितने पापड़ बेले होंगे,किसे याद है? 400 घोड़े और पचास हाथी को खड़ा करना खिलवाड़ नहीं था.रीमेक करने वाले यह भूल जाते हैं कि के आसिफ ने 400 घोडे़ और पचास हाथी को किस तरह से खाना खिलाया होगा.अब आप तो कम्प्यूटर पर एक बटन दबाकर एक घोड़े की जगह 100 घोडे़ खड़े कर लेते हैं.पर एक इंसान जो मेहनत करके दिखाने आया था कि मुगल जमाने में क्या हुआ करता था.उसकी मेहनत को आप एक मिनट में खारिज कर देते हैं.इसलिए किसी को भी ‘शोले’ या ‘डॉन’ बनाने का हक नहीं है.यह जो फिल्में बन गयीं, वह बन गयीं.यह क्लासिक फिल्में थीं.फरहान अख्तर ने कहा कि ‘डॉन’एक कल्ट फिल्म हैं.तो मेरा कहना है कि क्लासिक या कल्ट फिल्म को ‘सेल्फ’ में रहने दो,उसका रिमेक मत करो.

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रीमेक फिल्मों के खिलाफ होते हुए भी आपने फरहान अख्तर को फिल्म डॉनका रीमेक करने का हक दिया?

जब फरहान अख्तर मेरे पास रीमेक के अधिकार लेने आए, तो मैं मना नहीं कर पाया.हम गुजराती लोग दिल के कोमल होते हैं.फरहान अख्तर मेरे लिए बेटे की तरह हैं.जब मैं ‘डॉन’ बना रहा था, उस वक्त फरहान अख्तर मेरे सेट पर खेला करता था.अपने पिता जावेद अख्तर के साथ मेरे घर भी आया करता था.‘डॉन’ की कहानी सलीम जावेद ने ही लिखी थी.यह एक अलग बात है कि सलीम जावेद की इस पटकथा को देव आनंद, प्रकाश मेहरा और धर्मेंद्र रिजेक्ट कर चुके थे.

मैं याद दिलाना चाहॅूंगा कि 1978 के जनवरी माह में ‘‘गंगा की सौगंध’’,मार्च माह में ‘‘देशप्रेम’,अप्रैल माह में ‘त्रिशूल’ और ‘डॉन’रिलीज हुई.‘डॉन’ के बाद ‘षतरंज के खिलाड़ी’,‘सत्यम षिवम् सुंदरम’और फिर ‘‘मुकद्दर का सिकंदर’’ रिलीज हुई थी.इस तरह 1978 में यश चोपड़ा, राजकपूर, सत्यजीत रे और प्रकाश मेहरा जैसे निर्देशकों के बीच नए निर्देशक चंद्रा बारोट की पहली फिल्म ‘‘डॉन’’ रिलीज हुई थी.उस साल ‘डॉन’ को अवार्ड भी मिले थे.यदि उस वक्त नरीमन इरानी साहब की मौत ना होती,तो हमारी फिल्म को कई दूसरे अवार्ड भी मिल जाते.आप खुद कल्पना कीजिए कि हालात इस तरह के हो गए थे कि ‘खइके पान बनारस वाला..’गीत के गायक को अवार्ड मिला था, पर संगीतकार कल्याणजी आनंद जी को नहीं मिला था.

फिल्म ‘‘डॉन’’ का रीमेक देखने के बाद आप कितना खुश हुए थे?

जब आप खूबसूरत नए जूते पहनकर बाहर निकलते हैं, तो देखने वाले कहते हैं कि क्या लग रहे हैं? पर उन्हे पता नहीं होता कि अंदर से वह जूते आपके पैर को कितना काट रहे हैं.इससे अधिक कुछ नहीं कहूंगा. इसलिए मैंने कहा कि किसी भी फिल्म का रीमेक नहीं बनना चाहिए.

‘‘डॉन’’ के बाद आपने अमिताभ बच्चन को लेकर कोई दूसरी फिल्म बनाने की बात नहीं सोची?

मैंने पहले ही कहा कि ‘डॉन’ की रिलीज के बाद ही मेरे उपर तिगुनी शनि की साढे साती लग गयी थी. ‘डॉन’ के बाद मैंने अमिताभ बच्चन के साथ दो फिल्में साइन की थी.जिसमें से एक फिल्म के निर्माता विनोद दोषी थे.वास्तव में मनमोहन देसाई मेरे दोस्त थे.एक दिन उनका फोन आया कि विनोद दोषी ने अपनी नई फिल्म के लिए अमिताभ बच्चन को साइन किया है और यह फिल्म तुम निर्देषित कर लो.उससे पहले मनमोहन देसाई ने ही विनोद दोषी की राजेष खन्ना वाली फिल्म‘‘सच्चा झूठा’ निर्देशित की थी.मैंने यह फिल्म साइन की.अमिताभ बच्चन, कल्याण जी आनंदजी व सलीम जावेद को भी साइन किया.फिर ‘मेरे हमदम मेरे दोस्त’के निर्माता केवल कुमार ने मुझे फोन अपनी नई फिल्म निर्देषित करने के लिए साइन किया.मैने इस फिल्म के लिए किया.यह एक अंग्रेजी फिल्म पर बनने वाली फिल्म थे.इसके लेखन के लिए मंैने कादर खान को साइन किया.फिल्म में अभिनय करने के लिए अमिताभ बच्चन व जीनत अमान को साइन किया.इन फिल्मों की घोषणा हर ट्रेंड पेपर में हुई थी.मगर ‘डॉन’के बाद अमिताभ बच्चन की तकदीर ऐसी खुली कि उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा.मैं बता दूं कि फिल्म ‘त्रिषूल’ में अभिनय करने के लिए अमिताभ को 9 लाख रूपए और इस फिल्म को लिखने के लिए सलीम जावेद को 21 लाख रूपए मिले थे.अब मेरी फिल्म के लिए अमिताभ बच्चन व जीनत अमान के साथ साथ फिल्म की पटकथा लिखने के लिए सलीम जावेद को पैसे दिए जा चुके थे.पर सलीम जावेद ने फिल्म को लिखने के लिए दो साल से ज्यादा समय लगा दिया.उस वक्त के पटकथा लिखने के लिए नारायण पचास हजार रूपए लेते थे.मैंने अब्रार अलवी को 21 हजार में साइन किया था.यह फिल्म भी बंद हो गयी.तो कुछ लोगों ने मेरा नाम फिल्म बंद करवाने वाले निर्देषक में लेना शुरू कर दिया था.यह षनि की साढ़े साती का ही परिणाम था.

यानी कि डॉन के बाद आपने कोई फिल्म निर्देशित नहीं की?

‘डॉन’के बाद मैं घर पर खाली नहीं बैठा.मैने दिलीप कुमार और सायरा बानो को लेकर फिल्म ‘‘मास्टर’’ शुरू की.पर उसी दौरान दिलीप कुमार ने ‘क्रांति’ और ‘शक्ति’ में बड़ी उम्र के किरदार निभाने लगे,तो मेरी फिल्म का फायनेंसर भाग गया.फिर मैंने सारिका के साथ फिल्म‘तितली’षुरू की,फिल्म बहुत अच्छी बन रही थी. आधी फिल्म की षूटिंग हो गयी,तभी वह कमल हासन के साथ शादी करके मद्रास चली गयी.फिर मैंने सत्ती शोरी की फिल्म‘ लॉर्ड कृष्णा’’ शुरू की,जिसमें मैंने 21 स्टार कलाकारों को लिया था.पर कुछ दिनों में ही सत्ती षोरी की बेटी की शादी बोनी कपूर से हो गयी और सत्ती शोरी ने यह फिल्म बंद कर दी.फिर मैंने बंगला फिल्म ‘‘आश्रिता’’ बनायी.मैने विनोद खन्ना, डैनी और जय प्रदा को लेकर फिल्म ‘‘बॉस’’ बनायी.2003 में इसे सैंसर प्रमाणपत्र मिला, पर आज तक यह फिल्म रिलीज नहीं हुई.तो मुझ पर षनि की साढ़े साती ऐसी लगी कि मैं घर पर नहीं बैठा.दौड़ता रहा.काम करता रहा.पर काम पूरा नहीं हुआ.षनि देव मुझसे काम करवा रहे थे.हम चार कदम आगे जाते थे और छह कदम पीछे आ जाते थे.पर हम गुजराती परिवार में अच्छाई है कि परिवार के दूसरे सदस्यों व रिष्तेदारों का सहयोग मिला.और हमारे घर की गाड़ी चलती रही.

आपको नहीं लगता कि बॉलीवुड की सफल जोडि़यां टूटने पर बिखर जाती हैं.मसलन सलीम जावेद की जोड़ी को लें?

जड़,जोरू जमीन.सबसे खतरनाक होते हैं.जहां औरत बीच में आ जाती है,वहां सब कुछ तबाह होता है.लेकिन चिंता की कोई बात नहीं.सलीम और जावेद अपने अपने घर में खुष हैं.दोनों के बेटे स्टार बने हुए हैं.फरहान अख्तर हजार करोड़ का अम्पायर बनाकर बैठा है.उधर सलमान खान को कोई छू नहीं सकता.दोनों पिता खुश हैं.फिर उम्र भी इंसान की कमर झुका देती हैं.हर इंसान सुख सुविधाएं जुटाने के लिए काम करता हैं.फिर जब आपके पास पचास गुणा ज्यादा सुख सुविधाएं आ जाएं,तो सोच बदल जाती है.

आपने शनि की साढ़े साती से खुद को कैसे उबारा?

-मैं सच कह रहा हूं मुझे भी फ्रस्ट्शेन हो रहा था.मैं भी परेषान था.पर उपर वाले की मेहरबानी और परिवार वालों का साथ ऐसा रहा कि मेरी कमर नहीं टूटी.आखिर हम भी इंसान हैं.इसके अलावा मुझे दारू सिगरेट किसी चीज की कोई तलब नहीं है.मैं फिल्मी पार्टियों में नहीं जाता था.

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