मैं आज भी बिकाउ नहीं हूं- डेविड धवन

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अपने बेटे वरूण धवन के बारे में बताइये ?

मुझे वरूण में जो सबसे अच्छी बात लगती है वह यह है कि वह मनमौजी लड़का है और बहुत नटखट भी है पर उसकी जिंदगी में उसका काम सबसे ज्यादा अहमियत रखता है मुझसे भी ज्यादा। वह अच्छे काम करना चाहता है और वह कर भी रहा है। मैं तेरा हीरो, हम्पटी शर्मा की दुल्हनियां, और बदलापुर जैसी हीट फिल्मे करने के बाद भी उसके अंदर असुरक्षा की भावना है और वह अपने काम में 100 प्रतिशत दे रहा है और मुझसे पूछता भी है मेरी राय स्क्रिप्ट पर जो उसे दिये जाती हैं पर वह फिल्म करेगा या नहीं यह उसकी राय होती है।

चश्मेबद्दूर के बाद एक निर्देशक के रूप में आपकी अगली फिल्म कौन सी है?

मैं अभी आराम कर रहा हूं पर शायद एक से दो महीने के बाद मैं स्क्रिप्ट देखूंगा और फिल्म को निर्देशित करने के बारे में सोचूंगा। मैं ऐसा नहीं सोचता कि मैं पूरी तरह से अलग हो गया हूं और एक निर्माता बन गया हूं जबकी मेरा बेटा रोहित धवन खुद ही निर्देशित कर रहा है और वरूण खुद स्टार है मेरा ऐसा मनना है कि प्रोडक्शन के लिए मैं शुकगुजार नहीं हूं। मैं बस चाहता हूं कि मैं निर्माता को अपनी रचनात्मक कार्य दिखाऊं और पैसे लूं। मैं वहीं पुराना वाला डेविड हूं जो अस्थायी काम के 22 रू हर दिन लिया करता था और मैं शो एडिट करता था लड्डू सिंह टैक्सी वाला जिसके मुख्य किरदार पेंटल थे, ये है आशा, माजिक लैम्प दूरदर्शन के लिए। मैं आज भी बिकाउ नहीं हूं मैं बैठ के बस का इंतज़ार किया करता था और मेहनत और पसीना बहा कर काम किया है।

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आपने कितनी फिल्में कि हैं एक निर्देशक के रूप में?

39 साल हो गए हैं मुझे इस इंडस्ट्री में। 1976 में मैं पास किया था फिल्म और टीवी इंडस्ट्री पुणे से। शुरूआती दिनों में मैं निर्देशित किया कम से कम 10 साल और उसके बाद मैंने निर्देशित की ताकतवर 1987 में। मैंने 43 फिल्में निर्देशित की हैं 27 सालो में चश्मेंबद्दूर को लेकर। मेरा सफर इस फिल्मजगत में बहुत अच्छा रहा है। मुझे एक चीज़ तो पता चल गई थी इस फिल्म जगत के बारे में की अगर आपकी फिल्म चलती है तो आपकी ज़रूरत है और आपको इज़्जत भी मिलेगी। कई बार मैंने ठोकरें भी खायी है पर मैंने उससे भी बहुत कुछ सिखा है।

आज के सिनेमा के बारे में कुछ बताइये?

मैं आज इस जगत को बहुत पेशवर देखता हूं पहले लोग रिश्तेदारी में ज्यादा विश्वास करते थे। तो यह देखकर सन्न रह जाता हूं कि लोग एक दूसरे को गला काट रहे हैं बिना किसी परेशनी के और पहले हम लामबंद हो जाते थे एक दूसरे पर। कॉरर्पोरेट भी बड़े स्तर पर आ रहा है आगे यह सही भी है और बुरा भी। अच्छा इसलिए क्योंकी इससे बड़ी और अच्छी पकड़ मिलेगी मल्टीप्लेक्स पर जैसे की अकेले निर्माता को जबतक की वह एक नया निर्देशक ना दे एक भी शो के लिए और बुरा इसलिए क्योंकी वह फिल्मों को सब्जी की तरह समझेगें।

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एक एडिटर के तौर पर आप खुद को क्या समझते हैं?

जैसा की सबको पता है मैं एक अच्छा निर्देशक हूं और एक अच्छा एडिटर भी हूं। मैं ऐसा सोचता हूं की मैं एक ज्यादा अच्छा एडिटर हूं निर्देशक से और उस औज़ार पर मैंने बहुत सालों काम किया और मैं मास्टर था सालों तक। मैं शर्त लगा सकता हूं कोई भी यह नहीं कह सकता है मेरी फिल्म इस वजह से अच्छी. बुरी और बेकार है। मैं खुद को बहुत अच्छा एडिटर मानता हूं एक निर्देशक से। मैं शर्त लगा सकता हूं कि मैं फिल्म को काटूंगा और एडिटर को पता भी नहीं चलेगा। मैं फिल्म के आकार को भी बदल सकता हूं एडिटिंग टेबल पर।

क्या आपको लगता है आजकल निर्देशकों को उतने पैसे नहीं मिलते हैं जितने अभिनेता को मिलते हैं?

मैं तो बस यही कहूंगा की यह सब बहुत शर्मनाक है आजकल निर्देशकों को उतने पैसे नहीं मिलते हैं जितने अभिनेताओं को मिलते हैं और निर्देशक जहाज के कैप्टन की तरह होता है। आप इसपर मदद नहीं कर सकते हैं क्योंकी स्टार्स तो स्टार्स होते हैं जैसे की खानस को ही देखो उन्हे 50 के करीब मिलता है और वह अब भी राज कर रहे हैं। यह लोग बहुत चलाक हैं और बहुत ज्यादा मांग करते हैं अपने काम का और उसकी वजह से नये कलाकार भी पागलों की तरह काम करते हैं जैसे की मेरे बेटे वरूण, सिद्धार्थ मल्होत्रा और आलिया भट्ट को करण जौहर ने लॉच किया।

आपको क्या लगता है आजकल कॉमेडी फिल्मे अच्छी कमाई कर रही है?

आजकल कॉमेडी बिक रही है बहुत बड़े पैमाने पर आप आज की कोई भी फिल्म देख लो ज्यादातर कॉमेडी ही होगी। एक समय था जब क्रिटीक्स मेरे फिल्मों का मज़ाक बनाती थी और सी ग्रेड फिल्में कहती थी। लेकिन आज रजाकुमार हिरानी की फिल्म चाहे थ्री इडियट हो, मुन्ना भाई या पीके हो सबमें कॉमेडी का तड़का लगा है। मेरे ज़माने में वह ड्रामा का दौर था पर अब कॉमेडी सच्चाई पर होती है।

मनमोहन देसाई के लिए आप एकलव्य थे इस बारे में आप क्या कहेंगे?

स्वर्गीय मनमोहन देसाई जिसे हम मनजी कहते थे वह मेरे स्कूल में थे । मैं उनके लिए एकलव्य था। वह हमेशा मुझे प्रोत्साहित करते थे। मैं उस वक्त सबसे ज्यादा उत्साहित हो गया था जब उन्होने मुझे अपनी फिल्म को निर्देशित करने के लिए बुलाया था। मैं बहुत दुखी हुआ था क्योंकी मैं वह फिल्म दिवाना-मस्ताना को निर्देशित नहीं कर सका था जब वह जींदा थे। मैं बहुत ज्यादा प्रेरित हूं विजय आनंद से और के.आसिफ से पर आज मुझे राज कुमार हिरानी की फिल्में बहुत अच्छी लगती है खासतौर पर थ्री इडियट्स, मुन्ना भाई एमबीबीएस, और ले रहे मुनेना भाई भी पीके से ज्यादा। मैं बहुत ज्यादा प्रेरित था राज कुमार और ऋषिदा की फिल्मों से। कुछ लोग कहते हैं कि मेरी फिल्म के कुछ सीन दूसरे फिल्ममेकर कॉपी कर रहे हैं। मैं इसे बुरा नहीं मानता हूं बल्कि मुझे अच्छा लगता है मेरे काम को लोग सम्मान दे रहे हैं। अनीस बज़मी के साथ मैं पहले काम कर चुका हूं वह बहुत आज्ञाकारी हैं।

आजकल फिल्में बनाना कितना मुश्किल है?

आजकल फिल्में बनाना बहुत मुश्किल है पैसे को देखते हुए भी पी और ए भी बन रहा है बाधा। आपको ज़रूरत है 15-20 करोड़ की जिससे आप एक बड़ी फिल्म बना सकते हैं। इससे आपको जो घाटा होगा वह बहुत ज्यादा होगा लेकिन कॉर्पोरेट बात नहीं करते हैं इसके बारे में। स्टार अब भी राज़ कर रहे हैं। फिल्में बनाना आसान है पर पर उसे रिलीज़ करना मुश्किल है। पहले निर्माता को मिलता था कम से कम 35 प्रतिशत फिल्म के बजट से लेकिन अब सब सूखा पड़ा। आज जबतक की अभिनेता अपने कीमत को कम करने के लिए आगे नहीं आयेंगे तब तक ये मुश्किल है पर नामुमकिन नहीं फिल्में बानाना।

एक निर्देशक के रूप में चश्मेबद्दूर बनाना कैसा रहा आपके लिए?

मुझे पता है चश्मेबद्दूर ने अच्छी कमाइ नहीं की है पर हां ये धीरे-धीरे हीट हुई थी। वॉयकम 18 के पास, इसके सारे हक थे और उन्होंने मुझसे पूछा था स्क्रिप्ट पर काम करने के लिए। मुझे इसकी स्क्रिप्ट तैयार करने में 8 महीने लगे और मैंने बहुत कुछ बदलाव किया उसमें और उसके क्लाइमेक्स में भी बदलाव किया। मेरी जिंदगी बिल्कुल फिल्म लक्ष्य के ऋतिक रौशन की तरह थी। मैं बहुत एंजॉय किया करता था ग्लैमर को और सबसे ज्यादा तो तब जब अनिल धवन कि हिरोइने मुझसे दोस्ताना व्यवहार करती थी सेट पर। मैं एफटीटीआइ गया था हीरो बनने पर मैं पीछे हट गया। रौशन तनेजा ने मुझसे पूछा कुछ और करने के बारे में पर मुझे एडिटिंग के बारे में कुछ भी नहीं पता था। मैंने तय किया मुझे एडिटिंग सिखनी है और मैं मोहिंदर बत्रा के साथ जुड़ गया जो उस समय फिल्में एडिट किया करते थे। जब एक बार मैंने देखा रित्विक घटक के मेघा ढ़ाका तारा के स्क्रिनिंग पर जब मैंने वह फिल्म देखी तब मेरी आंखे नम हो गई और फिल्म का असर बहुत गहरा पड़ा मुझपर और मैंने तय किया कि मैं फिल्म निर्देशन में करूंगा।

 

 

 


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