आई हैव ब्लाइंड फेथ ऑन गॉड – हिना कौसर

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hina-kausar

 

मायापुरी अंक 42,1975

पिछलें दिनों लखनऊ में एक सांस्कृतिक संगठन की ओर से आयोजित एक मुशायरे में हिन्दी फिल्मों की नवोदित अभिनेत्री हिना कौसर भी शिरकत करने आयी थी। उसी सिलसिले में मुझें हिना से अनोपचारिक गपशप का इत्तफाक हुआ था।

हिना कौसर को जब मैंने पहली दफा देखा तो मेरी आंखे जैसे उनके गोरे लाल से चेहरे पर ठहर गयीं जो एक उत्तेजित उत्सुकता का भाव लिये हुए थी। काली, पर बड़ी बड़ी आंखे और उस पर तराशी हुई भवें, गुलाबी होठों पर स्वागतम का भाव लिये थिरकती मुस्कान, रेशमी, घने व काले बालों को कमर तक झूलती हुई चोटी। कुल मिलाकर किसी पत्थर पर तराश हुइ कला व कल्पना का एक शाहकार हमारे सामने मौजूद था जैसे।

बहरहाल मेजबान ने परिचय कराया और हिना ने बड़ी शीलनता से मुस्कुरा कर खालिस लखनवी अंदाज में अंदाज कहा तो मुझें सुबह की उस मनहूस घड़ी को कोसना पड़ा जब मैंने इरादा किया था कि आज शेव करने व नहाने को आराम दिया जाये। खैर, मुझें विश्वास नही हो पा रहा था कि यह वास्तव में ‘होली आई रे’ की दुबली पतली, लजीली-शर्मीली-सी शॉटगन (शत्रुघ्न सिन्हा) को प्रेमिका के रोल वाली हिना है या ‘वफा को बेवफा’ हिना, जिसकी मासूमियत को मरीचिका ने संजय राखी के सुखी जीवन में जहर घोल दिया था। ‘हम जीत’ के डब्बू की बहन की अदाकारी वाली हिना ढूंढ रहे थे जिसके पति ने उनके साथ छल किया था और ‘परिवर्तन’ की उस नायिका हिना कौसर को याद भी आ गयी, जिसे परिस्थितियों ने ‘कॉल गर्ल’ बना दिया था, और वह इस भूल में रहीं कि उनके प्रेमी ने सब कुछ जानने के बाद ही उनसे विवाह किया था। ‘कृष्ण लीला’ को षोडषी राधा के रूप में भी हिना की छवि हमारे मन-मस्तिष्क पर एक अमिट-सी छाप छोड़ गयी। ‘सात सवाल’ की विभिन्न कॉस्ट्यूम्स से सजी नायिका हिना की हल्की-सी याद आयी। दोस्त के पचपन वर्षीय घड़ी बाबू कन्हैया लाल की जवान पत्नी व धर्मेन्द्र को मुंहबोली बहन की भूमिका वाली हिना के चेहरे पर अंकित कुण्ठा व विवाद के भाव भी सामने घूम गये। ‘कॉल गर्ल’ की मॉर्डन ख्यालातों वाली हिना का सैक्सी कैबरे नुमा नृत्य तो हम अभी हाल ही में देख कर लौटे थे। उन्हीं विभिन्न भूमिकाओं वाली अदाकारी आज हमारे सामने खड़ी चहक-चहक कर दिलो-दिमाग पर पूरी तरह से छा जाने की कोशिश कर रही थी।

बातचीत कब शुरू हुई, याद नहीं आ रहा। लेकिन जब हम यथास्थिति की ओर लौटे तो हिना कह रहीं थी लखनऊ के स्टूडेन्ट्स बहुत बदतमीज़ हैं..

यह सुनते ही तन-बदन में आग सी लग गयी। क्योंकि मुझे लखनऊ के स्टूडेन्ट्स की नुमायन्दगी करने का भी हक था और यह हरगिज़ मानने को तैयार नहीं था कि यहां के छात्र अपने मेहमान के साथ बदसलूकी कर सकते हैं। इससे पहले कि हम प्रोटेस्ट करते, हिना ने हमारे गुस्से को बिल्कुल ठंडा कर दिया, यह बात मैंने मुंबई में सुनी थी, जबकि यहां आकर मैंने ऐसी कोई बात नही पायी। ये लोग तो बहुत अच्छे हैं।“

और मुंबई के छात्र कैसे हैं?” मेरे अन्दर थोड़ा सुपिरियारिटी काम्पलेक्स-सा उभर आया।

मुंबई तो फिर मुंबई है। बिल्कुल मैकेनिकल लाइफ इसलिए मुझें लखनऊ पसन्द आया। एण्ड यू वुड नाट बिलीव कि कल मैंने यहां दो फिल्में देखी है। ‘कॉंल गर्ल’ और ‘वो मैं नहीं’ मुझें दोनों फिल्में पसंद नही आयीं। ‘कॉल गर्ल’ वाला मेरा सैक्सी रोल तो बिल्कुल ही ‘स्टूपिड’ था

तो फिर ऐसा रोल क्यों स्वीकार किया था?”

दरअसल मुझें जो रोल सुनाया गया था वह बिल्कुल ही दूसरा था और जब फिल्माने का वक्त आया तो बिल्कुल ही बदला जा चुका था। मैं भी मजबूर थी। आप जानते हैं।

मुझें समझ नही आया कि जब हिना उसमें बतौर मेहमान अदाकार थीं तो उस सैक्सी रोल को लेने से इंकार भी तो कर सकती थीं। शायद हिना मेरे चेहरे से दिल की बात ताड़ गयीं और फौरन ही बात का रूख पलट दिया। दरअसल मेरे रोल मेरी अम्मी डिसाइड करती हैं।

अम्मी! मुझें हंसी भी आई और ताज्जूब भी हुआ।

हा. मेरी अम्मी निगार सुल्तान अपने वक्त की बहुत मशहूर रही हैं। उनकी सूझ-बूझ मुझसे यकीनन बेहतर है। इसलिए वह जो कहती हैं, मैं वही करती हूं।

मुझें महससू हुआ कि हिना पर उनकी मां का काफी दवाब है क्योंकि वह थोड़ी देर पहले कह भी चुकी थीं शुरू-शुरू में मुझ पर काफी पाबन्दियां थी। अम्मी नही चाहती थीं कि मैं भी स्क्रीन पर अदाकारी करूं। मुझें नही मालूम कि मेरे अंदर आर्टिस्ट बनने को धुन कब सवार हुई। शायद यह पैदाइशी असर ही था। मैं छुप-छुप कर स्टूडियो जाती थी। म्यूजिक एण्ड डांस तो सीखती ही थी। घर में भी आमतौर पर फिल्मी हस्तियों की आमद-रफत रहती थी। फिर ऐसे माहौल में भला मैं अपने अंदर की आर्टिस्ट को कब तक रोक सकती थीं?”

अगर आपकी मम्मी मशूहूर फिल्मी हस्ती न होती तब तो फिल्मों में आने के लिए काफी स्ट्रगल करना पड़ता ?”

हां। जरूर करनी पड़ती। शायद यह भी होता कि मैं फिल्मों में आती ही न। दरअसल फिल्मी माहौल कुछ ऐसा अजीब-सा है कि हरेक अपने को ‘एडजस्ट’ नही कर पाता। और फिर किस्मत या इत्तफ़ाक का फिल्म आर्टिस्ट की जिंदगी में तो खास दखल रहता ही है। मेरे साथ कुछ ऐसा ही हुआ था। इस बारे में एक दिलचस्प किस्सा है।

अब मैं हिना के हुस्न में नहीं बल्कि उनकी दिलचस्प बातों में खोया हुआ था।

एक बार मुझें ‘दो कलियां’ की शूटिंग देखने के लिए मद्रास जाने का का इत्तफ़ाक हुआ। (निगार सुल्ताना इस फिल्म में, ओम प्रकाश की पत्नी और माला सिन्हा की मां के रोल में, एक जिंदगी औरत के चरित्र में थी) मैं उस वक्त सोनिया (आज की नीतू सिंह) से कोई थोड़ी बड़ी रही होऊंगी। माला आंटी (माला सिन्हा) की मुझसे गहरी दोस्ती हो गयी और उन्होंने मुझे भविष्य में फिल्म में काम दिलाने का वादा भी कर लिया। वक्त का हसीन मज़ाक समझ कर मैं उस बात को भूल चुकी थी कि एक दिन माला आंटी मुझें लेने चली आयीं। दरअसल उन्हें विजय भट्ट की ‘होली आई रे’ में अपने लिए एक कमसिन बहु की जरूरत थी। माला आंटी के पुरजोर इसररार के सामने अम्मी की हामी भरनी पड़ी। इस तरह मैं फिल्मों में आयी। बताइये यह इतेफ़ाक नही तो और क्या है ? क्या इसे इंसान की लाइफ में नगलेक्ट (नज़र अंदाज) किया जा सकता है ?

माना कि आप पैदाइशी अदाकारा हैं लेकिन जब आप पूना इंस्टिट्यूट के किसी टेलेन्टेड आर्टिस्ट या किसी हरफनमौला आर्टिस्ट के साथ काम करती हैं तो आपको कोई ‘इनफिरियारिटी काम्लैक्स’ का एहसान नही होता?

नही मेरे अंदर किसी किस्म के काम्पलेक्ज हैं ही नही। कभी कोई ऐसा हादसा भी नही आया कि मैंने अपने को नर्वस फील किया हो। मैं अपने अंदर एक विश्वास तो रखती ही हूं और फिर आई हैव ए ब्लाइंड फेथ ऑन गॉड मुझें खुदा पर पूरा भरोसा है। अपनी अम्मी से मैंने बहुत कुछ सीखा है और मरहूमा मीना जी के करीब रहने का भी काफी इतेफ़ाक हुआ। वह तो मेरा आदर्श थीं। मैं सोच रहा था कि आखिर क्यों हर नयी-पुरानी छोटी बड़ी अभिनेत्रिया मीना कुमारी को अपना आइडियल मान कर चलने का दावा करती हैं। जीते जी तो उन्हें किसी ने भी इतना क्रेडिट न दिया। खैर, बात आगे चलो इसका मतलब यह कि आप मीना कुमारी बनना चाहती हैं।“

क्यों नही! लेकिन उनकी नकल करके नही, बल्कि उनकी तरह करेक्टर में जान फूंक कर। मुझें मीना जी की तरह इमोशनल (भावना प्रधान) रोल पसंद हैं। क्योंकि ऐसे ही रोल्स से अदाकार को अपने फन का कमाल दिखाने का मौका मिलता है। इसलिए मैं इमोशनल रोल्स को महत्व देती हूं जैसे परिवर्तन..

मैं सोच रहा था कि हिना इमोशनल रोल्स पसंद करती हैं और इनकी अम्मी ‘कॉल गर्ल’ जैसे तड़क भड़क वाले रोल्स इनके लिए चुनती हैं। आखिर इतना विरोधाभास क्यों है मां-बेटी की पसंद है?

एक बात यह भी ब ता दूं कि ‘इमोशनल रोल्स’ पसंद करने के साथ साथ वैरायटी भी चाहती हूं। मेरी आने वाली फिल्मों में आप इस चीज़ को पायेंगे। जैसे इशारा भाई (बी.आर.इशारा) की एक नाव दो किनारे जिसमें मैं हीरोइन हूं। मुझें इस फिल्म से बहुत उम्मीदें हैं। डी.एस.सुल्तानिया की कितने दूर कितने पास भी शुरू हो चुकी है। ये दोनों आर्टिस्टिक फिल्में हैं। देखना न भूलियेगा। यकीनन मेरी एक्टिंग आपको भी पसंद आयेगी। ओ.पी.रल्हन को ‘पापी’ मेरा महत्वपूर्ण रोल है। इसके अलावा भी बहुत-सी फिल्में आ रही हैं।

हमने हिना कौसर से उनके मन पसंद हीरो व निर्माता-निर्देशक के बारे में विचार जानने चाहे तो वह उलझन में पड़ गईं, ओह, आपने तो वाकई मुझें दिक्तत में डाल दिया। किसे अच्छा कहूं और किसे न कहूं? मुझें तो सभी अच्छे लगते हैं, स्वभाव से भी और सूझबूझ से भी, बट इट डज माइ कीन डिजायर टु वर्क विद वेटरेंस लाइक राज कपूर, सत्यजीत रे, गुलजार ऋषिकेश मुखर्जी असित सेन। दिलीप साहब के साथ काम करने की दिल्ली तमन्ना रखती हूं वहीदा जी की भी फिल्में पसंद हैं।“

अदब और फिल्म क्यो दो अलग-अलग चीजें हैं? क्या फिल्मों में अदब नही है?”

इस सवाल को हिना ने कई बार टालने की कोशिश की। मैं समझ चुका था कि हिना को इस विषय पर ज्यादा महारत हासिल नही है। हिना ने स्वीकारा भी, आप खुद सोचिये, मेरी उमर अभी बीस को हद को छू रही है। इतनी कम उम्र में मैं इस सवाल का जवाब देने के लिए ‘मैच्योर’ नही हो पाई हूं। अभी तो मैं हर चीज को देख रही हू, समझ रही हूं। उसकी गहराइयों तक पहुंचने की कोशिश कर रही हूं।

हिना जी, ‘वू मैन लिबरेशन’ के बारे में आपके क्या विचार है?”

मैं ‘वू मैन लिबरेशन’ की पूरी तरह से हिमायत करती हूं। आप मानें या न मानें, मर्दो से औरतें ज्यादा समझदार होती हैं।“ हिना औरतों के मर्दो से कहीं ज्यादा सुपीरियर, इन्टैलिजेन्ट वगैरह वगैरह होने के बारे में तर्क पर तर्क पेश करने लगीं और मुझें भारतीय लोक दल के चैयरमैन जनाब चौधरी चरण सिंह की याद आ गयी। काश, वह हिना की जुबान से औरतों को पुरूषों से हीन समझने के अपने ऊल-जलूल एतराजात का जवाब सुन पाते। किसी ने कहा है कि औरतों के साथ ज्यादा बहस नही करनी चाहिए। मैं भले ही इस कहावत के हक में न होऊं, लेकिन उस वक्त तौ मैंने इस कहावत के जन्मदाता को ही लाख लाख दुआएं दीं और कई जरूरी कामों का बहाना बना कर उठ खड़ा हुआ। इस पर हिना उछल कर खड़ी ही गईं, अरे इतनी जल्दी। आपको मैं चाय तक न पिला पायी। बातों ही बातों में सब भूल गयी।

क्या यह भी आपकी एक्टिंग है हिना जी? तीन बार तो आप चाय पिला चुके हैं।

यह सुन कर वह हक्का वक्का रह गई। क्या यह आपको एक्टिंग लगी?

अजी छोड़िये अब, दिल की बात दिल में ही रहने दीजिये उनके भोलेपन या अभिनय पर वह जो कुछ भी था, फिदा होते हुए मैंने उनसे एक शेर सुनाने की फरमाईश कर दी और उन्होंने यह शेर बड़े अंदाज से सुना दिया

तूफाने बहारे गम से,

डरती हैं ऐ हिना क्यों तारीकियां ही शक ही,

आसार हैं सहर की।


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Mayapuri

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