INTERVIEW!! दीपिका पादुकोण कैमरे के सामने अपने शर्मिलेपन पर विजय पा चुकी हैं – इम्तियाज अली

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‘‘सोचा ना था’’, ‘जब वी मेट’’, ‘‘रॉक स्टार’’, ‘‘हाइवे’’जैसी फिल्मों के सर्जक इम्तियाज अली इस बार ‘‘तमाशा’’ लेकर आ रहे है, जिसमें उन्होंने रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण के साथ दूसरी बार काम किया है। इम्तियाज अली की फिल्मों में भी कहीं न कहीं दर्शन शास्त्र होता है।

फिल्म ‘तमाशा’ क्या है?

सीधे व साधारण शब्दों में कहें तो एक बच्चा अपने बचपन में तमाम कहानियां सुनता रहा है। ऐसा हम सभी के साथ होता है, वह कहानियां सुनते समय अपने दिमाग में कल्पना भी करता है। पर बड़े होने के बाद वह अपनी दुनिया में इस कदर खो जाता है कि वह स्वयं उन कहानियों को खत्म कर देता है। पर एक दिन उसकी जिंदगी में एक लड़की आती है और फिर उसे उन कहानियों की याद आ जाती है। और वह उसे जिस तरह से याद करता है, वही सब इस फिल्म का हिस्सा है। इस फिल्म में यह बात भी कहीं न कहीं नजर आएगी कि हम जितना सामाजिक होते जाते हैं, उतना ही वास्तविकता से कटते जाते हैं।

फिल्म ‘तमाशा’ का ख्याल आपके दिमाग में कैसे आया?

जिस उम्र का बच्चा मेरी फिल्म में है, उसी उम्र से यानी बचपन से मैं भी कई तरह की कहानियों की कल्पना किया करता था। बच्चे के तौर पर भी मैं अपने इर्दगिर्द कई तरह की कहानियों की कल्पना किया करता था। मेरी राय में तमाम दूसरे लोग भी अपने बचपन में इसी तरह की कहानियों की कल्पना किया करते होंगे या यूं कहें कि बचपन में जब हम कहानी सुनते हैं, तो उसे विज्युलाइज करते हैं, फिर चाहें वह ‘हीर रांझा’ हो या ‘लैला मजनूं’।  हम सभी इंसान कहानियां सुनकर कल्पना में जीते और इंज्वॉय करते हैं। मैं भी बचपन से ही कहानियों को लेकर कल्पनाएं करता आया हूँ। शायद आप लोगों ने फिल्म ‘टू् मैन शो’ देखी होगी, जिसमें एक स्टूडियो है, पर हीरो को लगता है कि उसकी निजी जिंदगी चल रही है। जबकि वह टीवी पर एक डेली सोप होता है, तो मुझे भी लगता था कि कहीं मेरे चारों तरफ पूरी दुनिया नकली तो नहीं है, और मुझे मूर्ख बनाया जा रहा है। कहने का अर्थ यह है कि अंततः पूरा संसार ही एक तमाशा है। यह संसार व इंसानी जिंदगी एक स्टेज है। इसलिए मैं यह दावा नहीं कर रहा हूं कि मैंने कोई नयी कहानी कही है, पर मेरे कहने का तरीका थोड़ा अलग है।

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‘तमाशा’ क्या है ? जो मैं देख रहा हूं वह है या कहानी में… ?

जो आप देख रहे हैं, वह भी तमाशा है। आपकी अपनी जिंदगी भी उन तमाशों में से है, जिसे कहानी कहा जा सकता है। वह तमाशा ही है, तमाशा निगेटिव हो यह जरूरी नहीं। कुल मिलाकर यह एक खेल ही है, गुरूगोविंद सिंह जी ने एक जगह कहा है- ‘‘मैं परम पूरख का दासा, देखने आयो जगत तमाशा..’’ तो हम सभी खुद भी तमाशा है, और हर जगह तमाशा ही देख रहे हैं।

फिल्म में रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण के किरदार क्या हैं?

रणबीर कपूर कथा वाचक हैं जबकि दीपिका पादुकोण उसकी प्रेरणा हैं। वह देवीशक्ति है, इंसान को खुद तक पहुंचने के लिए भी हमेशा प्रेरणा की जरुरत होती है।

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फिल्म में कहानी सुनाने के लिए प्रेरणा की जरुरत क्यों पड़ी ?

हमारा नायक बचपन से कहानी सुनता रहा है, पर फिर वह अपनी जिंदगी में गिरफ्तार होकर कहानी भूल जाता है। फिर वह उसी से प्यार करता है,जो उसकी जिंदगी में आकर बिना कहे उसकी वास्तविकता को पहचान जाए और फिर उसे वैसा बनने पर मजबूर कर दे, ऐसा हर इंसान के साथ होता है।

फिल्म के लिए रणबीर कपूर या दीपिका पादुकोण का चयन किस आधार पर?

मैं अपनी किसी भी फिल्म में किसी भी कलाकार को निजी संबंधों या दोस्ती के आधार पर नहीं चुनता। रणबीर कपूर मेरे अच्छे दोस्त हैं, मगर दोस्ती का अर्थ यह नहीं होता है कि मैं उन्हें अपनी हर फिल्म में काम करने का मौका दूं। मैं अपनी फिल्म की कहानी व पटकथा लिखने के बाद किरदारों के अनुरूप कलाकारों का चयन करता हूं। यह सच है कि रणबीर कपूर को पहले से पता था कि मैं इस तरह की कोई कहानी लिख रहा हूं। लेकिन उसे भी पता था कि यदि किरदार में वह फिट नहीं होगा, तो मैं उसे नहीं लूंगा। वैसे यह दूसरी बार है, जब मैंने रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण के साथ काम किया है।

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मैंने फिल्म के कुछ दृश्य देखे हैं, इससे पता चला कि रणबीर कपूर का जो किरदार है, वह बचपन से भारत में पला बढ़ा हैं यानी कि उसका पूरा परिवेश हिंदुस्तानी है, पर आप उसकी कहानी को विदेश ले गए इसकी जरूरत क्यों महसूस हुई ?

देखिए, पूरी कहानी हिंदुस्तान की है, पर नायक की एक यात्रा है। वह छुट्टी में कोरसिका जाता है। वहां जाने के पीछे मकसद ऐसी जगह जाना होता है, जहां लोग उसे ना पहचानते हो। हर इंसान विदेश जाने के बारे में ही सोचता है।

रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण के साथ आपने दूसरी बार काम किया है, पहली बार और अब दूसरी बार काम करते हुए इनमें क्या फर्क महसूस किया?

दीपिका पादुकोण बहुत शर्मीली है, पहले उसका शर्मिलापन उसके अभिनय को रोक रहा होता था। उस पर अब वह विजय पा चुकी है, निजी जिंदगी में वह आज भी शर्मीली है, मगर कैमरे के सामने अभिनय करते समय वह अपनी शर्म को भूल जाती है। उसके अंदर आत्मविश्वास आ गया है। रणबीर कपूर चीज ही कुछ और है। इस बार काम करते समय मुझे याद ही नहीं आया कि ‘रॉक स्टार’ के समय उसने क्या किया था। मुझे लग रहा था कि मैं एकदम नए कलाकार के साथ काम कर रहा हूं।

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फिल्म के गाने ‘मटरगस्ती’ में रणबीर कपूर ने देव आनंद की नकल की है, यह किसका आइडिया था?

कुछ सोचा नहीं है कुछ भी हो सकता था मटरगस्ती में हमें खुद नहीं पता था कि अगला शब्द क्या आएगा। नायक लड़की से जब मिलता है, तो उसे अपना नाम नहीं बताता। बल्कि कहता है कि मैं डॉन हूं। वह चलते चलते अचानक देव आनंद बन जाता है बिना वजह के। मुझे लगता है कि फिल्म इंडस्ट्री के सुपर स्टार आम इंसानों के अंदर कहीं न कहीं बसे होते हैं, दोस्त की तरह होते हैं।

आपने फिल्म ‘ब्लैकफ्रायडे’ में अभिनय किया था, उसके बाद अभिनय से दूरी..?

जी नहीं! पहले जवानी की नादानी थी, जब थिएटर में अभिनय कर रहा था, तब भी मुझे लगता था कि निर्देशन में मेरी रूचि ज्यादा है। जब मैं मुंबई आया, तब तक दिमागी तौर पर तय कर चुका था कि निर्देशन ही करना है, दो नावों की सवारी नहीं करनी है।

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आपका प्रेरणास्रोत कौन है?

इंसानी जिंदगी से, जरुरी नहीं कि वह एक ही इंसान हो।

गुलाम अली पर बैन लगा, इस तरह से किसी कलाकार पर बैन लगना कितना जायज मानते हैं?

मैं कलाकार हूं, मेरा मानना है कि कला पर बैन नहीं लगना चाहिए। मेरा मानना है कि किसी भी कलाकार की बेइज्जती मेरी बेइज्जती है। मेरी राय में कला, संगीत व कविता को आप किसी भी तरह की सीमाओं में नहीं बांध सकते।


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