INTERVIEW: ‘‘उस फिल्म में तो बतौर निर्माता मैं सिर्फ एक तमाशबीन की तरह था’’ – इरफान खान

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हालांकि इरफान खान इससे पहले फिल्म ‘ लंच बॅाक्स’ में भी अभिनय के अलावा सह निर्माता की भूमिका निभा चुके हैं लेकिन इस बार वे फिल्म ‘मदारी’ में फुलफ्लैश निर्माता बन कर आ रहे हैं। इस फिल्म को लेकर उनसे एक बातचीत।

प्रोड्यूसर बनने का कैसा अनुभव रहा ?

जैसा कि मैं बता चुका हूं कि इससे पहले फिल्म लंच बॉक्स में भी मैं निर्माता की भूमिका निभा चुका हूं लेकिन उस फिल्म में ढेर सारे लोग आ गये थे, इसलिये मैं तो उस फिल्म में एक तमाशबीन की तरह था।

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इस फिल्म को बनाने का आइडिया तो पूरी तरह आपका ही था?

नहीं, सबसे पहले ये आइडिया मेरी वाइफ सुतापा को आया था बाद में सभी को ये काफी पसंद आया। इसके बाद इसे थोड़ा डवलप किया, फिर लेखक रितेश शाह को बुलवाया गया और उसे ये आइडिया सुनाया। बाद में वो जो लिखकर लाया ,उसे सुनकर मेरी घंटी बजी कि यार ये तो कमाल का सब्जेक्ट है।

डायरेक्टर निशिकांत की बतौर डायरेक्टर कैसे एन्ट्री हुई?

इस वक्त तक हम चार पांच जमा हो चुके थे और हमारे दिमाग में चार पांच लोगों का नाम था जिसमें से निशिकांत को चुना गया। निशि ने भी जब सब्जेक्ट सुना तो उसने भी उसी तरह रियेक्ट किया जिस तरह हम सभी ने किया था। बाद में वे ये फिल्म करने के लिये तैयार हो गये ।

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इस तरह की कहानीयां कॉरपोरेट सेक्टर नहीं समझ पाते?

ये हम सभी ने पहले ही तय कर लिया था कि इस सब्जेक्ट को लेकर हम किसी कॉरपोरेटर सेक्टर के पास नहीं जायेगें क्योंकि वे इस फिल्म का कमर्शियल पोंटेशल नहीं समझ पायेगें ।वे अपनी शर्ते या आइडिये भी दे सकते थे कि पांच करोड़ में बना दो या ऐसा कर लो वैसा कर लो। बाद में शैलेस से पैसा एरेंज किया और हमने फिल्म खुद बनाई ।

फिल्म को लेकर आपकी खुद की क्या सोच है?

इस फिल्म को लेकर एक अजीब तरह का सेटेफिकेशन रहा। मैं शब्दों में बयान न करते हुये इतना बता सकता हूं कि इसी तरह का अनुभव मुझे पानसिंह में हुआ था ।उस फिल्म में पहले दो लाइनों का आइडिया था जिसे नापने का कोई फार्मूला ही नहीं था बिल्कुल इसमें भी तकरीबन वैसा ही हुआ। ये फिल्म शुरू से ही कब्जे में आने को तैयार नहीं थी । यहां तक इसका टाइटल भी आधी फिल्म शूट हो जाने के बाद मिला क्योंकि टाइटल के लिये भी हम सभी परेशान थे क्योंकि किसी को कुछ पसंद था तो किसी को कुछ और। एक दिन मैने डिसाइड किया कि आज तो मैं आठ दस शीर्षकों में से एक नाम देकर ही जाउंगा। वरना तो ऐसा लग रहा था कि बच्चा पैदा हो दो साल का हो गया लेकिन उसका नाम तक नहीं रखा।

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कहा जाता है ,ये एक आम आदमी की कहानी है?

ये शब्द बड़ा प्रचलित सा हो गया हैं कि ये हीरो नहीं एक आम आदमी की कहानी है। आप बताईये कि गंगा जमना में दिलीप कुमार क्या थे, दीवार में अमिताभ बच्चन क्या थे या आन मिलो सजना में राजेश खन्ना क्या थे । सभी तो आम आदमी थे। ये भी एक आम आदमी है जो एक्स्ट्रा ऑर्डेनरी काम हाथ में ले लेता है। ऐसे लोग रोजाना हमारे सामने से गुजरते रहते हैं।

कहा जाता है कि इरफान जो भी किरदार निभाते हैं उसमें पूरी तरह से घुस जाते हैं ?

मुझे ऐसा नहीं लगता कि मैं ऐसा करता हूं। हां मैं कहानी और किरदार को अपनी जिन्दगी में जरूर तलाशता हूं जिन्हें मैने एक्सप्लोर नहीं किया तो मैं उन चीजों को एक्सप्लोर करना चाहता हूं। फिर चाहे वो लंचबॉक्स में मोहब्बत का एलीमेंन्ट हो जो इससे पहले मैने कभी नहीं किया था इसी तरह इस फिल्म में बहुत सारे ऐसे एलीमेन्टस हैं जो मुझे पहली दफा करने को मिले ।

आपकी आने वाली फिल्में ?

दुर्गा रानी सिंह, बैंकर टू द पूअर, बेगम सामरू तथा तारिक एंड हिज डॉटर आदि ।

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Mayapuri