INTERVIEW: मैंने हर साल एक एक स्क्रिप्ट लिख कर कर अब्बास-मुस्तान के पास पहुंचाई है – संजीव कॉल

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लिपिका वर्मा

संजीव कॉल की बेशक पहली लिखित फिल्म, ‘मशीन’ अब्बास मुस्तान के हाथों निर्देशित हो रही है किन्तु इस पहली फिल्म के लिए संजीव कॉल ने लगभग 10 वर्षों तक अपनी चप्पल घिसी है सिर्फ उनकी एक हाँ के लिए? अब आप सोच रहे होंगे कि कहाँ चप्पल घिसी है संजीव कॉल ने किसके ऑफिस में? बस इसी उम्मीद से कि एक न एक दिन निर्देशक अब्बास-मुस्तान इनकी स्क्रिप्ट को सिल्वर स्क्रीन पर उतारे संजीव हर वर्ष एक न एक बाण्डेड स्क्रिप्ट लेकर उनके ऑफिस जाया करते थे। संजीव ने हमसे बातचीत में अपनी पूरी जीवनी जैसे जीवन्त कर दी हो।

तो सुनिये संजीव की जुबानी लिपिका वर्मा की कलम से

आप कैसे फ़िल्मी दुनिया का हिस्सा बने कश्मीर से मुम्बई तक का सफर कैसे तय किया आपने ?

बस उन दिनों की बात है, जब कश्मीरी पंडित सारे कश्मीर छोड़ कर जा रहे थे। मैं भी अपने माता-पिता के साथ जम्मू पधार गया। न जाने कैसे मुझमें भी लिखने का शौंक उमड़ पड़ा। शायद इसलिए भी हो सकता है क्योंकि मेरे पिताजी भी कुछ कश्मीरी लिरिक्स लिखा करते थे – कश्मीरी फोक सांग्स भी बहुत लिखे और गाए भी है मेरे पिताजी ने। खैर पहली बार मैंने ज़िन्दगी में निर्देशक अब्बास मुस्तान की फिल्म, ‘बाजीगर’ जम्मू में देखी थी। तब मैं लगभग 18 वर्ष का ही था। बस यही कह सकते है कि इनकी हर फिल्म जो ड्रामा/थ्रिल/सस्पेंस से पूर्ण होती है मैंने सारी फ़िल्में देखी है। और बस तब ही से मेरे अन्दर यह भावना थी कि इनके साथ ही फ़िल्में भी बनाना चाहूंगा ?sanjeev-kaul_inteview_writer

 मुम्बई पहुंच कर सबसे पहले आपने क्या किया?

मुम्बई पहुंच कर मुझे कश्मीरी शोज बनाने का मन हुआ। बस इसी मेरे कश्मीरी दोस्त यहाँ थे उनको सबको जमा करके मैंने ढेर सारे कश्मीरी शोज बनाये। मेरी यह भी इच्छा रही कि कश्मीरी भाषा कुछ लोग सीख लें। खैर कुछ दिनों बाद मेरे सारे दोस्तों को नौकरी मिल गयी और फिर धीरे से मैंने बालाजी टेलीफिल्म्स ज्वाइन कर लिया। जाने माने शो, ‘सास भी कभी बहु थी’ इत्यादि का बतौर निर्देशक हूँ पर वह कहते हैं न जहाँ दिल है वहीं चाह भी हमें वहीं ले ही जाती है यहाँ टेलीविज़न शोज बतौर निर्देशक कुछ किचन चलाने के लिए पैसे मिल जाया करते थे। लेकिन मैंने हर साल एक एक स्क्रिप्ट लिख कर अब्बास मुस्तान के ऑफिस पहुंचाई है। हर बार मैं उन्हें यही कहता -सर वह स्क्रिप्ट का पता नहीं लेकिन यह दूसरी स्क्रिट भी आपके लिए ही लिखी है। इनके इलावा मैंने और किसी भी प्रोडक्शन हाउस में स्क्रिप्ट कभी नहीं दी है। बस आज मुझे फिल्म, ‘मशीन’ की स्क्रॉलिंग में अपना नाम बतौर राइटर देख कर बहुत ही खुशी मिलती है।

चलिए यह बताइये दस साल के बाद इस स्क्रिप्ट में अब्बास मुस्तान ने ऐसा क्या देख लिया जो आपकी एंट्री इनके बैनर में हो गयी ?

 उन्होंने मेरे पेशेंस को भी सराहा लेकिन यदि कहानी अच्छी न लगती तो शायद फिर से मुझे स्ट्रगल करना पड़ता। पर ऐसा नहीं है। मैं एक और स्क्रिप्ट भी लिख रहा हूँ। दरअसल में विवेकानन्द की किताब में एक लाइन, ‘हमेशा अपने मन की सुनो’ जिस दिन से मैंने पढ़ी तो मुझे भी ऐसा ही लगा की शायद यह मेरे साथ भी घटा है। मैं भी मन की सुनकर अपना बसा बसाया बड़ा सा कश्मीर का बंगला छोड़ कर यहाँ स्ट्रगल करने पहुँच गया। मैंने जब सचिन तेंदुलकर के बारे में भी सोचा और लता मंगेशकर की जीवनी के बारे में भी पढा तो यही लगा कि-जितने भी बड़े लोग हुए है उन सभी ने मेहनत कर यह मुकाम पाया है। जैसे ही अब्बास मुस्तान सर ने यह एक लाइन सुनी तो फिर पूरी स्क्रिप्ट भी पढ़ी तो वह भी मेरी इस बात से सहमत हुए और अपने किस्से जो उन्होंने मन की सुन कर किये थे मुझे सुना डाले। अक्सर ऐसा ही होता है कि दिमाग जब मन पर हावी होता है तो बहुत नपा तुला सोचता है। दिल से सुनकर जब हम आगे पहुुंचते है तो उसमें कोई भी नाप तोल वाली बात नहीं रहती है। दिल एक बहुत ही स्वच्छ सोच लेकर आगे बढ़ता है मेहनत करनी होती है पर सफलता जरूर कदम चूमती है ऐसा हम सबने अनेको नेक बार देखा भी है। फिल्म मशीन भी यही विचार लेकर आगे बढ़ती है। बाकि आपको फिल्म देखना होगा।sanjeev-kaul

मुस्तफा इस फिल्म के हीरो है आपने उसे बचपन से देखा क्या कहना चाहेंगे आप?

बचपन में कभी-कभी मिल लिए करते थे लेकिन मुस्तफा बतौर सह निर्देशक तीन फिल्मों -प्लेयर्स, रेस एवमं ‘किस किस को प्यार करूं’ में काम कर चुके हैं और यहाँ उनसे अक्सर मुलाकात भी हुई है। बस मुस्तफा एक बहुत ही मेहनती एवमं होनहार बच्चा है। बहुत ही फोकस्ड भी है। मुझे याद है हम एक फॉरेन लोकेशन में शूट कर रहे थे और सुबह 9 बजे की शिफ्ट के लिए मैं लगभग  5. 30 बजे सवेरे उठ जाया करता था। किन्तु जब बालकनी पर टहलने निकलता तो मुस्तफा को रनिंग करते देख ताज्जुब हो जाता था। इतनी लेट सोने के बाद भी मुस्तफा जल्दी उठ कर अपनी बॉडी को तैयार करने हेतु इतनी मेहनत किया करता यह देख ख़ुशी होती किन्तु इस से उसकी इच्छाशक्ति का भी आभास होता है।

बतौर हीरो लांच किये गए है मुस्तफा, क्या कहना चाहेंगे आप?

मुस्तफा को एक्टिंग का शोक अभी आया है। बतौर सह निर्देशक उनको पूरी स्क्रिप्ट याद हो जाया करती और वह हर अभिनेता को अभिनय कर के डायलॉग्स एंजॉय करते थे। आज जब अब्बास-मुस्तान सर एक न्यू-कमर  की तलाश में थे तो उन्होंने मुझसे भी यही कहा – कि न्यू कमर कोई बैगेज ले कर नहीं आएगा। अपनी फिल्म मशीन के लिए न्यू कमर ही लेना होगा। जब उन्हें यह पता चला कि मुस्तफा भी अभिनय में अपना हाथ आजमाना चाहते है तो उसे ऑफिस में बुलाकर पूरी कहानी नरेट करने और साथ अभिनय करते हुए सुनाने का आदेश दिया। और हम सब भी वहां मौजूद थे। सबने बाद में मुस्तफा की तारीफ ही की। इसलिए नहीं क्योंकि वह इनके सुपुत्र है? लेकिन उनके टैलेंट को देख कर हम सब दंग रह गए। पूरी कहानी मुंह जुबानी याद होना और अभिनय कर दिखाना कोई आसान  काम नहीं है न ?sanjeev-kaul_interview

 आप निर्देशक किस फिल्म को करेंगे आगे?

अभी तक तो फिल्म निर्देशन का कोई भी मौका नहीं मिला है। किन्तु यदि मुझे कभी अब्बास मुस्तान सर की छत्र छाया में स्वतन्त्र निर्देशन करने का मौका इनके बैनर तले मिल जाये तो मेरे लिए, ‘सोने पे सुहागा होगा। ड्रीम पूरे हो जायेगे मेरे।’


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Mayapuri

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