सफलता की सीढ़ी नीचे भी जाती है परवीन बॉबी

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मायापुरी अंक 18.1975

हमें परवीन का इंटरव्यू लेना था। सुबह दस बजे हम उस स्टूडियो में जा पहुंचे जहां परवीन की फिल्म की शूटिंग चल रही थी। एक भव्य सेट लगा हुआ था। ड्राइंग रूम का दृश्य था। ड्राईंग-रूम से एक गोल सीढ़ी ऊपर की ओर चली गई थी। यूं हमें ऐसा सचमुच का एक भी बंगला दिखाई नही पढ़ा जहां ड्राईंग –रूम से ऊपरी मंजिल की ओर सीढ़ियां जाती हों। बहरहाल यह फिल्मी सेट था बैकग्राउंड में पर्दे लटकाए जा चुके थे। लाइटमैन लाइटें ठीक करवा चुका था। ग्यारह बजते बजते फिल्म का हीरो भी आ पहुंचा।

फिल्म के निर्देशक, जो अपना नाम गुप्त ही रखना चाहते हैं, बेचैनी से इधर-उधर चहलकदमी कर रहे थे घर पर फोन किया। वहां से उन्हें क्या पता चला, यह तो हमें मालूम नही लगा मगर निर्देशक का चेहरा बता रहा था कि मिस बॉबी स्टूडियो के लिए चल चुकी हैं।

बारह बज गये, एक बज गया फिर भी परवीन का कोई आसार दिखाई न दिया तो निर्देशक लंच के लिए ‘पैक अप’ हो गये।

सचमुच आज परवीन बॉबी सेट पर लेट जाने के लिए बड़े-बड़े हीरो को मात कर रही हैं। आज तक सेट पर लेट आना हीरो लोगों की बपौती समझा जाता था। हीरोइन, बहुत हुआ, तो एक-दो घंटे लेट आ गई। राजेश खन्ना और संजीव कुमार की तरह नही कि आठ बजे की शूटिंग के लिए सावां चार बजे पहुंच रहे हैं, मगर लगता है, नये नये ट्रेंड सेट करने वाली परवीन अब लेट आने में भी एक नया ट्रेंड सेट करने जा रही हैं।

कुछ वर्ष पहले परवीन का नाम भी कोई नही जानता था। और अचानक ही एक दिन चारों ओर ‘परवीन- परवीन’ होने लगी। परवीन के लिए यह सब कुछ एक परी-कथा की तरह था। एक दिन वह सोकर उठीं और लक्ष्मी, प्रसिद्धि तथा निर्माता सब उनके दरवाजे पर लाइन लगाए खड़े थे। परवीन स्वयं हैरान थी कि ऐसा क्यों हो रहा है।

वास्तव में जिस समय परवीन बॉबी ने फिल्मों में प्रवेश किया, इंडस्ट्री में कोई ढंग की हीरोइन मौजूद नही थी। डिम्पल एक फिल्म में काम करके सन्यास ले चुकीं थी। नीतू सिंह के पास उभार तो थे मगर उनका दिमाग एक दम बचकाना था। रेखा अपनी साहसिक विचार धारा से वितरकों को दिखाई गईं, तो वितरक फिल्म की बजाय फिल्म की हीरोइन में अधिक रूचि दिखा रहे थे। परवीन ने ऐसी कच्ची गोलियां नही खेली थी जो इस अवसर को चूक जाती। उन्होंने प्रत्येक वितरक को ‘खुश’ किया। और बदले में उन्हें धड़ाधड़ फिल्में मिलती गईं। परवीन रातों रात स्टार बन चुकी थी विधाता ने परवीन को आकर्षक चेहरा, सुन्दर शरीर और ध्यान खींचने वाले अन्य हथियारों से पूरी तरह लैस करके भेजा और परवीन ने रोल पाने के लिए अपने इन हथियारों का पूरी तरह इस्तेमाल किया। वह अपनी हरकतें छिपा कर नही रखतीं इसीलिए उन्हें‘बेशर्मी’ की हद तक ईमानदार कहा जा सकता है परवीन का वातावरण जितना स्पष्ट है। भूतकाल उतना ही धूंधला है। उनके भूत के विषय में इतना ही पता चलता है कि वह एक दिन अहमदाबाद से मुंबई में टपक पड़ी बस ! हमारे एक जानकार सूत्र का कहना है कि अहमदाबाद में परवीन का परिवार कोई खाता पीता भी नही था। अक्सर वे लोग अपने दोस्त रिश्तेदारों के घर भोजन के समय जापहुंचते थे। परवीन उस समय भी जबरदस्त फ्लर्ट थी। नवल नाम के लड़के से उनकी गहरी छनती थी। दोनों ने चांदनी रातों में जन्म –जन्म एक साथ रहने की कसमें खाई थी। फिर परवीन ने अहमदाबाद में किसी से शादी भी कर ली और तलाक़ भी ले लिया। इन बातों में कितना झूठ है, कितना सच, यह पता लगाने वाला थर्मामीटर अभी नही बना। स्वयं परवीन इन बातों को ‘डनहिल’ के धुएं के साथ हंसी में उड़ा देती हैं। वह अपने बीते दिनों के बारे में कोई बात नही करती, हां, वर्तमान के विषय में धड़ल्ले से कहती हैं मैं अविवाहित हूं पर विरजिन नही चौदह साल से ऊपर भारत में कोई लड़की विरजिन नही होती।

ऐसी बात नही है कि परवीन ने भारत के शहर- शहर में घूम कर चौदह साल से ऊपर की लड़कियों के इंटरव्यू लिए, सूचनाओं को एकत्रित किया और उनके आधार पर उपरोक्त स्टेटमेंट दी। वास्तव में यह स्टेटमेंट निर्माताओं के लिए इंडिकेशन है कि यदि उन्होनें परवीन बॉबी को साइन किया तो उन्हें क्या-क्या ‘अतिरिक्त लाभ’ मिल सकते हैं।

परवीन को ‘न्यूज’ मे बने रहने का शौक है। वह जया की तरह नही, रेखा की तरह सफलता पाना चाहती हैं। इसीलिए वह खुलेआम एक के बाद एक सिगरेट पीती हैं, डैनी के साथ रहती हैं और ऐसी हालत में पीने का तो जिक्र ही क्या ? परवीन कहती हैं“मैं पहली हीरोइन हूं जो चुपके चुपके नही, खुले आम यह सब करती है। और तो और, मैंने डैनी के साथ रहने के लिए अपनी मम्मी से अनुमति ले रखी है।“ अब आप स्वयं सोचते रहिये कि क्या कोई मां अपनी बेटी को दूसरे के साथ रहने की अनुमति दे सकती है ? और क्या परवीन को ऐसी अनुमति लेने की जरूरत भी है ?

यदि परवीन का फिल्मी रिकॉर्ड देखा जाए तो एक सिरे से गोल हैं, उनकी पहली फिल्म ‘चरित्र’ बुरी तरह फेल हुई। दूसरी फिल्म ‘धुएं की लकीर’ ने निर्माता को धुंए में मिला दिया। तीसरी फिल्म ‘छत्तीस घंटे’ में बेचारे निर्माता के घंटे बज गये। अब सवाल उठता है कि परवीन के पास ऐसा क्या है जो वह पंद्रह फिल्मों में काम कर रही हैं।

परवीन के पास सुंदर शरीर है, मान लिया उनमें अभिनय-क्षमता है, कुछ हद तक यह भी मान लिया मगर इस क्षमता के उपयोग के बारे में मिस बॉबी का कहना है” भारतीय हीरोइन को अभिनय करने की जरूरत नही होती। फिल्म में हीरोइन अपना सुंदर चेहरा दिखा दे, शरीर की गोलाइयां दिखा दे, बस इसी के लिए उन्हें ढेर सारा पैसा मिल जाता है.. अभिनय की बात आती ही कहां हैं?

जब तक परवीन बॉबी अपनी विचार –धारा नही बदलती, उनकी सफलता संदिग्ध है। उन्हें मालूम होना चाहिए कि सफलता की जो सीढ़ी पर खड़े व्यक्ति (भले ही वह हीरोइन हो) को यह भी नही मालूम होता कि वह ऊपर चढ़ रहा है या नीचे उतर रहा है।


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Mayapuri

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