“मुझे हीरो बनने का शौक नही है” – राकेश रोशन

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मायापुरी अंक 18.1975

जूहू पर मैं राकेश रोशन का पता पूछ रहा था कि एक इमारत के टेरेस पर आंखे चली गई। एक नौजवान वहां खड़ा अजीब अजीब हरकतें कर रहे थे और यह राकेश रोशन थे।

“यह आप सुबह टेरेस पर क्या कसरत कर रहे थे ?” मैनें राकेश से मिलते ही पहले सवाल पूछा।

“नही, मैं वहां अभिनय का अभ्यास कर रहा था।“ राकेश ने बिल्कुल सादगी से कहा।

सादगी की राकेश के व्यक्तित्व में कुछ ऐसी मिलावट है कि मैंने पहली बार जब राकेश को ‘मदहोश’ के सेट पर देखा तो महसूस हुआ कि वह एक सीधे सादे से कॉलेज स्टूडेंट हैं जो भूल से कॉलेज जाने की बजाय फिल्म के सेट पर चले आये हैं।

बातों ही बातो में राकेश ने अपनी फिल्म ‘आक्रमण’ के बारे में बताया। “हाल ही में मैं आक्रमण की शूटिंग करके कश्मीर से लौटा हूं। इस फिल्म को ओम जी (जे. ओमप्रकाश) बड़े पैमाने पर बनाना चाहते हैं। अभी अभी डेढ़ लाख रुपया लड़ाई के फौजी सामान के लिए दिया है। कुछ ‘वार सीन्स’ फिल्माने हैं। उन्हीं के लिए। ‘वार सीन्स’‘आक्रमण’ में ऐसे फिल्माए जाएं कि आज तक किसी भी हिंदी फिल्म न आए हों।

“आप इस फिल्म में किस तरह की भूमिका कर रहे हैं?

“एक ऐसे फौजी की जो छुट्टियों में घर मिलने आता है तो दूसरे फौजी की पत्नी से प्रेम करने लगता है। किंतु मैं ‘रेखा’ से, जो कि दूसरे फौजी की बीवी का रोल कर रही हैं, मिल नही पाता ! हम एक दूसरे के लिए काफी बेचैन हो उठते हैं। इसी बीच युद्ध शुरू हो जाता है। हमें सीमा पर जाने का हुक्म मिलता है। मेरे दिमाग में शैतान जागता है, “अगर मैं अपनी प्रेमिका के पति की सीमा पर हो हत्या कर दूं तो कितना अच्छा रहेगा। लोग समझेगें वह सीमा पर दुश्मन के हाथों मारा गया।“ दरअसल ‘आक्रमण’ में मेरा रोल एकदम अलग और ‘ऑफ बीट’ (लीक से हटकर) है। मैं अब ऑफ बीट रोल ही करना चाहता हूं।‘जख्मी’ खेल खेल में फिल्मों में भी मैं ऐसी ही भूमिकाओं को कर रहा हूं मुझे हीरो बनने का कोई शौक नही है।

‘घर घर की कहानी’ राकेश की पहली फिल्म थी जिसके बारे में कहा जाता है कि इस फिल्म में दर्शक उन्हें छोटी सी भूमिका के बाद भी पूछते नज़र आते थे, यह नया लड़का कौन है ?

“और मदहोश’ के बाद अब मुझे अच्छे- अच्छे रोल मिलते जा रहे हैं” राकेश बताते हैं, ‘जख्मी’ में भी मैं हीरो नही हूं। उसमें मैं साइड रोल कर रहा हूं। यह फिल्म करीब करीब पूरी हो गई। और जल्दी ही रिलीज होने वाली है। मुझे खुशी है कि इस फिल्म में भी दर्शक मुझे ‘मदहोश’ की तरह एकदम अलग पायेंगे।“

अच्छा राकेश जी यह बताइये कि फिल्म के पात्र को एक एक्टर कहां तक उभार सकता है? मैनें पूछा !

“जहां तक एक्टिंग का सवाल है वह तो हर एक्टर अपनी तरफ से पूरी कोशिश करता है कि उसका रोल ज्यादा से ज्यादा उभर जाए।

लेकिन कुछ एक्टर रोल को निखार कर फिल्म के पात्र को एक खास जामा (मार्क) पहनाकर सच्चाई के पास ले आते हैं। जैसे ‘मदहोश’ में मैनें डायरेक्टर को बताया कि अगर मैं अपने एक गाल पर जख्म का निशान लगा लूं तो मेरा केरेक्टर अच्छे ढंग से एस्टिवबिलिश हो जायेगा। और डायरेक्टर ने इसे पसंद किया। बाद में दर्शकों ने भी इसे पसंद किया। दरअसल किसी भी किरदार को पर्दे पर सही बनाने के लिए, उसकी शख्सियत को पूरे ढंग से उभारने के लिए बेहद जरूरी है कि उसके गैटअप को कुछ ‘मार्केबिल’ चीजें पहना दी जाएं। कभी कभी कुछ खास हरकतें भी किरदार की शख्सियत को उभारने में सहायक होती हैं।“

राकेश ने एक सिगरेट बुझा कर दूसरी जला ली। देखते देखते राकेश ने पांच सिगरेटें पी डालीं ! लगता है वह ‘चेन स्मोकर’ हैं।

“चोली दामन’ में आपकी क्या क्या भूमिका है ?” मैनें पूछा।

“चोली दामन” में मैं एक काफी उलझी हुई भूमिका में आ रहा हूं। एक ऐसे आदमी का रोल कर रहा हूं जिसकी शादी हो चुकी है, लेकिन उसकी बीबी की विधवा सहेली के बीच में आ जाने की वजहसे गलतफहमियांजिंदगी में आग लगा देती है। ‘चोली दामन’ दरअसल वाइफ हसंबैंड की अन्डर स्टेडिंग, मेरा मतलब है एक दूसरे के विश्वास की कहानी है मेरी बीबी के रोल में इस फिल्म में योगिता बाली हैं”

“और विधवा सहेली के रोल में ?

“रेखा।“

“रेखा के बारे में कुछ बताइये क्य रेखा वास्तव में ऐसी लड़की है जैसा कि सुना जाता है ?

“नही, वह बुरी लड़की नही है। मैंने तो उन्हें हमेशा वक्त पर आते देखा है। उन्हें हमेशा वक्त पर आते देखा है। सभी को कॉऑपरेट भी करती है। यूं रेखा जरा मुंह-फट हैं। गुस्सा भी आयेगा तो आपके मुंह पर फट पड़ेगीं इसलिए भी रेखा के हिस्से में आधी बदनामी आ गई है।

“और योगिता बाली.. ?

वह जरा चुलचुबी हैं। कभी सीरियस नही होती। पिंकी (योगिता बाली) को कभी कोई सीरियस सीन देना होगा तो आप देखेगें कि कैमरे के सामने जाने से पहले वह खूब ठूंस ठूंस कर खा रही हैं और कैमरे के सामने सीन देने के बाद फिर वही खाने का प्रोग्राम।

“और मोटापे मैं ?

बीच में वह टुन टुन बनने की तैयारी में लग रहीं थी लेकिन उन्होंने डाइटिंग करके खुद को अब काफी स्लिम कर लिया है।“

कमरे के दरवाजे पर किसी निर्माता का आदमी राकेश को बुलाने आ गया था। उसे देखते ही राकेश उठे और बोले बाकी फिर कभी अब मैं स्नानघर जाऊंगा ! और जब स्नानघर में एक्टर चला जाता है तो बाहर बैठ कर इंतजार करने वाला सर्दी में बर्फ से और गर्मी में पसीने से स्नान कर लेता है। यह मैं जानता था।

इसीलिए एक सभ्य आदमी की तरह बिना किसी को कोई असभ्य शब्द कहे बाह चला आया राकेश को दो चार घंटे स्नान करने देने के लिए।


Mayapuri

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