कल का एक्स्ट्रा आज का एक्टर – संजीव कुमार

1 min


046-10 Sanjeev Kumar

 

मायापुरी अंक 46,1975

एक बहुत ही साधारण हीरो मगर अभिनय की दृष्टि में किसी हद तक सर्वात्तम!

मुंबई में एक जगह है भूलेखर! जहां संजीव कुमार का अपना मकान है। एक मकान शांताक्रुज में भी है। यह उन दिनों की बात है जब संजीव ने अपना फ्लैट नही लिया था

आपको शायद ही विश्वास हो, जब संजीव के पास पंद्रह-बीस फिल्में थीं तब वह भूलेश्वर के अपने इकलौते कमरे में अपनी मां, दो भाई और एक बहन के साथ रहा करते थे।

संजीव कुमार से मेरी पहली मुलाकात उनके भूलेश्वर वाले मकान में हुई थी। घर के बाहर एक तख्त पर तहमद लपेटे वह ऊपर से बंडी पहने थे। बड़े प्यार से अपने घर के अंदर ले गये। एक कमरा जिसमें बाथरूम भी बना हुआ था और रसोई रूम भी। खाना भी यही होता था और नहाना भी यहीं। हजारों रूपये कमाने के बाद भी उन्हें इस घर से प्यार है। कार लेने की कभी उन्हें आवश्यकता महसूस ही नहीं की रेलवे को अपना दोस्त समझकर लोकल ट्रेन में बड़ी शान से साथ सफर करने में उन्हें बड़ा आनंद मिलता था यह सब देखकर आश्चर्य व्यक्त करने पर वह बताते हैं, क्या जरूरत है दिखावट की? अगर मुझसे अभिनय प्रतिभा होगी तो सब मुझे इस रूप में भी प्यार करेंगे। शान शौकत के साथ रहने में कोई खास लाभ मुझे दिखायी नहीं देता।

और शायद उनके इन्हीं सदविचारों ने उन्हें सफलता की उन बुलंदियों पर पहुंचा दिया है। जहां आज तक दिलीप कुमार के अलावा कोई अन्य कलाकार नहीं पहुंच पाया बावजूद संजीव कुमार आज भी वही हैं भूलेश्वर वाले एक मामूली इंसान।

उन्हेंने अब नयी कार और नया फ्लैट लिया था तो मैंनै पूछा था, कि अब इस दिखावट की क्या जरूरत? तो उन्होंने मुझे समझाया।

क्या करें, यह सब दूसरों के लिए करना पड़ता है। अपने लिए कुछ नहीं बहुत बिजी रहता हूं न, इसलिए व्यस्तता को कम करने के लिए कार का सहारा लेना पड़ा ताकि कहीं आसानी से बहुत जल्दी पहुंचा जा सके। और फ्लैट इसलिए कि एक साथ कई लोग यहां बैठ सके।

श्री साउंड स्टूडियो में संजीव से मुलाकात हुई तो वह हाथों में सिगरेट दबाये किसी से बात कर रहे थे मजे की बात यह है कि वह गुजराती में में बोल रहे थे। (गुजराती संजीव की मातृभाषा है। और उनका पूरा नाम हरी जरीवाला है।

मैंने देखा कि संजीव को पल भर में ही काफी लोगों ने घेर लिया है। यह उनकी मिलन सारिता का परिचायक है कि वह हर छोटे-बड़े व्यक्ति से खुलकर बातें कर रहे थे। कोई नखरा नहीं और न ही एक्टर वाली कोई बात उनमें नजर आ रही थी।

हम साथ थे मुझे देख इशारा करते हुए संजीव मेकअप रूम की ओर बढ़ गये मैं भी चुपचाप मेकअप रूम की ओर बढ़ गया।

यहां संजीव ने बताया,

जितने लोगों की भीड़ आपने बाहर देखी न, इनमें से अधिक से अधिक मेरे संघर्ष के दिनों के परिचित हैं। इनमें से कई ऐसे हैं। जो मुझसे कभी सीधे मुंह बात नहीं करते थे। लेकिन मैं हमेशा ऐसे लोगों का भी आदर करता हूं जैसे के साथ वैसी बात मुझे बिल्कुल पंसद नहीं। मनुष्य को बदले की आग में जलने की बजाय, गांधीवादी होना चाहिए ताकि शांति की ठंडक से उसका मन शीतल रहे, पावन रहे, पवित्र रहे।

गांधी मार्ग पर चलने वाले इस फिल्मी गांधी से मैंने पूछा,

संजीव भाई, आपकी सफलता का राज क्या है?

अपने खास अंदाज में हंसते हुए संजीव ने कहा,

‘यार, यह भी कोई सवाल हुआ जिंदगी में धैर्य रखो, विश्वास रखो, बस सफलता अवश्य मिलेगी। और यही उपदेश मुझे मां ने दिया है। उन्हीं की बदौलत आज में संजीव कुमार बन पाया हूं। कई असफलताओं का सामना करते करते में थक सा गया था, ऐसे में मां ने हर पल, हर क्षण आश्वासन और हिम्मत बढ़ाकर मुझे काफी उत्साहित किया। इसलिए अपनी सफलता का सारा श्रेय मैं मां को ही देता हूं। और सच भी है कि मां ना हो तो दुनिया में कुछ भी न हो। जो इंसान मां को खुश नही रख सकता, वह व्यक्ति जीवन में कभी सुखी नही रह सकता और ना ही कभी सफलता उसके कदम चूम सकती है, इसके ठीक विपरीत यदि मां का साया और आशीर्वाद साथ है तो उसे हर कदम पर सफलताऐं मिलेंगी।

संजीव को चुप होते देख मैंने तुरंत पूछा,

तो फिर मोहब्बत के मामले में ये असफलताऐं…

प्रश्न पूरा होने से पूर्व ही संजीव ने उत्तर दिया,

मोहब्बत के मामले में मां के आशीर्वाद क्या करेंगे इश्क-विश्क के चक्कर में मां के आशीर्वाद कभी नहीं बीच में घसीटने चाहिए। हां, शादी-वादी की कोई बात है तो और बात है। फिर असफलता सफलता हो जीवन के दो पहलू हैं।

कभी असफलता, तो कभी असफलता,

संजीव कुमार ने जवाब गोल करते हुए कहा। मैंने भी चुपचाप दूसरा प्रश्न पूछा,

प्रेम की ये असफलतायें आपके मस्तिष्क पर किसी हद तक तो काफी प्रभावशाली..

पुन: प्रश्न पूरा होने से पूर्व संजीव ने उत्तर दिया,

नहीं, इश्क-मोहब्बत जुए की तरह हैं। और फिर यह तो दिल का सौदा है, जाने कब किस पर आ जाये। अब यह जरूरी नही कि आग दोनों तरफ से एक ही साथ लगे। ऐसा भी होता है कि इधर आग लगी है तो उधर कुछ नहीं और उधर आग लगी हैं तो इधर कुछ नहीं। और तभी तो इश्क असफल हो जाता है, जब दोनों तरफ आग बराबर लगे तो सफलता मिलती है।

अब तक संजीव काफी गंभीर हो गये थे, अत: मैंने विषय बदलते हुए पूछा,

अपने जीवन की कोई मजेदार घटना सुनाईये..

यह सुनकर संजीव कुछ सोचने लगे, फिर एकाएक हंसते हुए बोले,

उन दिनों मैं नाटकों में काम किया करता था। एक गुजराती नाटक ‘दादी’ में मुझे साइड रोल दिया गया था। इस नाटक में नायिका की भूमिका लीला चिटनीस ने निभाई और मजे की बात है कि उनके पिता की भूमिका मैंने निभायी। जबकि व्यक्तिगत रूप में मैं उनके बैटे की उम्र का हूं। लेकिन आपको आश्चर्य लगा कि इस रोल के लिए मुझे महाराष्ट्र राज्य नाटक स्पर्धा में बेस्ट एक्टर का अवार्ड मिला।

यह कह कर संजीव खूब हंसते रहे, फिर एकाएक कहने लगे,

एक और दिलचस्प किस्सा है। ‘संघर्ष’ के दौरान की बात है। फिल्म के नायक दिलीप कुमार थे। दिलीप कुमार पहली ही नजर में एक्टर लगते हैं और में पहली नज़रों में बहुत ही ठंडा आदमी। मुहूर्त शॉट के अवसर पर अब दिलीप साहब ने मुझे देखा तो कोई खास रिसपांस नहीं दिया। शायद उन्होनें सोचा होगा कि पहले ही शॉट में मैदान छोड़कर भाग खड़ा होगा लेकिन जब हमारा पहला शॉट पहली ही बार में ओ.के. हो गया तो उन्होनें तुरंत मुझे गले लगा लिया और कहा, मै तो तुम्हारे बारे में कुछ और ही सोच रहा था।

संजीव भाई, सुना है कि हिंदी फिल्मों में काम पाने के लिये आपने काफी संघर्ष किया है, कुछ संक्षेप में बतायेंगे?

यह कहानी वैसे तो बहुत लम्बी है, लेकिन इतना बता दूं कि मैंने दस वर्ष की उम्र से ही एक्टर बनने के सपने देखने आरम्भ कर दिये थे। लेकिन सफलता काफी वर्षों बाद मिली। ‘दादी’ गुजराती नाटक में काम करने से मुझे एक गुजराती फिल्म ‘रमता रमाडे राम’ में साइड रोल मिला। इस फिल्म में काम करने पर ही मुझे हिन्दी फिल्म के निर्माता अस्पी इरानी ने अपनी फिल्म ‘निशान’ में दोहरी भूमिका को निभाने के ऑफर दिया था। ‘निशान’ के बाद मुझे छोटी-छोटी भूमिकायें मिलने लगी… फिर धीरे-धीरे लोग मुझे हीरो के रोल में भी लेने लगे…. और अब तो आप जानते ही हैं..

संजीव भाई एक प्रश्न पूछना चाहता हूं…

जरूरू पूछिए.. एक हल्की-सी मुस्कुराहट के साथ संजीव ने कहा।

आप बताएंगे कि बचपन के नन्हें से संजीव और अब नौजवान संजीव में क्या खास अंतर है?

मेरा प्रश्न सुनकर तपाक से संजीव ने कहा,

वाह! यह हुई न कोई बात! सवाल हो तो ऐसा। सच मैं तो इश्क मोहब्बत से लबालब सवालों के जवाब देकर थक गया हूं… जाने दीजिए.. सुनिये बचपन में यह संजीव बहुत शैतान हुआ करता था। स्टूडियो दर स्टूडियो चक्कर लगाया करता था.. बहुत छोटा था तब और बहुत ज्यादा शरारती… न शरमाता था और ना ही लड़कियों के नाम से घबराता था। खाने पीने का खूब शौक.. रोजाना फिल्म देखने का शौक.. दिन भर किताबे हाथ में लेकर स्टूडियो के गेट पर इस मतलब से खड़ा रहता कि कोई प्रोड्यूसर तो देखेगा। फिर शाम को घर पहुंचता मां समझती कि बेटा स्कूल से पढ़कर आ रहा हूं। खाना वाना खिलाती लाड-दुलार भी करती। तब बढ़िया मौका देखकर पांच आने मांग बैठता। फिल्म देखने के लिए कभी-कभी तो दे देती। कभी इंकार कर देती। तो घर की ऐसी-तैसी हो जाती, खिड़की के कांच तोड़ दिये जाते घर भर का सामान इधऱ से उधर और आखिरकार पांच आने जरूर ले लेता। और सीधे सिनेमा हाल पहुंचता और अब.. सब कुछ कितना बदल गया है। सारी शोखी, शरारतें चंचलता बचपन के साथ गायब हो गयी हैं। अब तो बस संजीव कुमार एक एक्टर हैं। एक ऐसा एक्टर जिसके कोई अरमान नहीं, कोई सपना नहीं। सब कुछ कितना बदल गया है…

संजीव मनोवैज्ञानिक बातें करने लगे तो मैंने तुरंत पुन: विषय बदला

संजीव भाई, आप भी तो फिल्म बनाने वाले हैं, सुना था कि जनवरी तक आप सैट पर जाने वाले थे, फिर यह देर कैसी?

एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ संजीव ने कहा,

इन दिनों मैं कुछ ज्यादा ही बिजी हो गया हूं। फिर भी बहुत जल्द मेरी अपनी फिल्म सेट पर चली जाएगी।

क्या आपको विश्वास है कि आपकी फिल्म हिट होगी? मैंने पूछ ही लिया। संजीव ने बताया।

यह तो कोई भविष्यवक्ता ही बता सकता है हां, हमारी तो सिर्फ कोशिश रहती है कि हम सफल फिल्म बनाएं। लेकिन असफल भी हो जाए तो इसमें दोष किसी का नहीं।

अच्छा संजीव भाई, आखिर में प्रश्न और.. मैंने संजीव के चेहरे पर बोरियत के क्षणिक चिन्हों को भांपते हुए कहा।

यह सुनकर संजीव ने कहा,

जानता हूं कि क्या पूछोगे.. फिर भी पूछिए..

मैनें कहा,

शादी-वादी का क्या प्रोग्राम है…?

वही प्रोग्राम है जो होना चाहिए, मतलब जरूर करेंगे शादी… आपको भी बुलाएंगे..

संजीव साफ टाल गये, लेकिन मैंने कुछ जोर नहीं दिया और तुरंत विदा होकर उठ खड़ा हुआ। संजीव भी साथ ही मेकअप रूम से बाहर आये, और सेट की ओर बढ़ गये।


Like it? Share with your friends!

Mayapuri

अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिये