सिर की चोटी से लेकर निर्माता निर्देशक की चोटी तक – मोहन चोटी

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मायापुरी अंक 41,1975

हाल ही की बात है। नटराज स्टूडियो में हास्य अभिनेता मोहन चोटी को सामने आते देखते ही वहां खड़े कुछ लोगों ने तालियां बजाकर गाना शुरू कर दिया

मोहन चोटी का असली नाम धोती लोटा और चौपाटी इस पर मोहन चोटी ने मुस्कुराते हुए, कहा, “यार इस तुकबंदी में चोटी के साथ रोटी मिल जाती तो चौपाटी का भी मजा आ जाता।“

रोटी तो पक गयी है न एक व्यक्ति के मुंह से यह सुन कर मोहन चोटी ने मेरे कंधों पर हाथ रखते हुए मुस्कुरा कर कहा, “रोटी तो पक पका गयी अब देखना यह है कि चोटी को चाहने वाले इस रोटी को पसंद करते हैं या नही।

मोहन चोटी का इशारा उनके निर्देशन में तैयार हुई ’धोती लौटा’ और चौपाटी की ओर था जिसकी शूटिंग पूरी हो चुकी है, मैंने कहा, “क्यों नही? जब आपने असली घी धर्मेन्द्र, धनिया संजीवकुमार, मिर्च प्रेमनाथ, नमक महमूद, खटाई बिन्दू जीरा राजेन्द्र नाथ, पुदीना ओम प्रकाश, गर्म मसाला जीवन आदि को आंटे मिला कर मिस्सी रोटी बनाई है तो वह भला स्वादिष्ट क्यों नही होगी? वह धोती लोटा और चौपाटी नही, परांठा है परांठा।

परांठे का नाम लेते ही मोहन चोटी ने नाक के नथुनों को फुला कर सूंघने जैसी क्रिया की। गोया दूर से परांठे की खुश्बू उसे भी मिल गयी हो।

सच बात तो यह है कि हास्य अभिनेता महमूद की तरह ही मोहन चोटी ने जब ‘धोती लोटा’ और चौपाटी फिल्म की घोषणा की तो विश्वास नही हुआ कि उनकी यह फिल्म कभी पूरी होगी पर 28 मार्च 1975 को अपने जीवन की इस पहली आकांक्षापूर्ण फिल्म को पूर्ण करते हुए उन्होंने कहा, सेवा का फल मीठा होता है।

चोटी की इस फिल्म में चोटी के आठ कलाकार मेहमान के रूप में कार्य कर रहे हैं और साथ में हैं फरीदा जलाल, रमेश अरोड़ा, जोगेन्द्र शर्मा हेलन रहमान और रणजीत तथा वह खुद।

सेवा का फल मीठा होता है यह वाक्य मैंने पहली बार उनके मुंह से नही सुना। आज से सात साल पहले भी उन्हेंने मुझें एक इंटरव्यू के दौरान बड़ी गम्भीरता से यही कहा था कि दूसरों की सेवा करना मेरा बचपन से ही स्वभाव रहा है। स्टूडियो में जब कोई मुझें काम बताता मैं दौड़ कर उसे पूरा करता। हालांकि इस पर कई लोग मुझें मूर्ख समझने लगे थे। कुछ लोग दिल खोल कर मेरी मजाक भी उड़ाते थे, पर मैं कभी बुरा ही मानता था, बल्कि मुझें खुशी होती थी कि मैं दूसरों को खुश तो कर रहा हूं। किसी से कुछ ले तो नही रहा, दे ही रहा हूं। “सेवा का फल मीठा होता है।“

मैंने कहा, आपको लोग हर वक्त चिढ़ाते रहते हैं पर मैंने हमेशा आपको मुस्कुराते देखा क्यों चिढ़ाने पर गुस्सा नही आता ?”

चोटी ने दोनों हाथों से अपने कान पकड़ लिये और कहा, ना बाबा ना। मैं कभी किसी का बुरा नही मानता। जब मैं घर से फिल्मों में कार्य करने के लिए आया तो मेरे सिर पर एक लम्बी चोटी थी। इस पर कुछ लोग ‘चोटी चोटी’ कह कर चिढ़ाने लगें। मैंने सोचा, ओह ये लोग मेरा कितना प्यारा नाम रख रहे हैं। इन्हें जरूर खुश करना चाहिए। बस मैंने अपना नाम मोहन के आगे चोटी भी जोड़ लिया और तब से मैं मोहनमैं मोहन चोटी कहलाने लंगा हूं। अब तो वह चोटी भी नही रही पर मोहन चोटी जरूर बचा हुआ है।“

जब से मोहन मोहन चोटी हुआ तब से उन्हें फिल्मों मैं धड़ाधड़ काम मिलने लगा यदि उनके सिर की वह चुटालिया (चोटी) उनके नाम से नही घुल मिल जाती तो शायद मोहन आज भी कोई एक्स्ट्रा ही होते। नाम के आगे चोटी लगते ही मोहन चोटी का हौसला बढ़ गया और वह सोचने लगे, अपने नाम को सार्थक करने के लिए जरूर कोई चोटी का काम करना चाहिए। पहले वह हास्य अभिनेता बने और अब उस चोटी से भी अगली चोटी पर पहुंच कर वह निर्माता निर्देशक भी बने। उनकी आकांक्षाओं का अंत यही नहीं है। वह कहते हैं मोहन चोटी जरूर एक दिन निर्माता निर्देशक भी चोटी का होगा।“

‘चोटी’ शब्द जैसे उसके लिये कोई झण्डा हो गया है जिसे लेकर वह सफलता की अनेक चोटियों पर चढ़ना चाहते हैं, वस्तुत: मोहन चोटी ने ‘चोटी’ नाम को सार्थक करने की बड़ी कोशिश की है, जब वह फिल्मों में आये तब वे क्या एक साधारण बेसहारा युवक थे?

उनकी अपनी एक दर्द भरी कहानी है। उनका जन्म मध्य प्रदेश के एक छोटे से कस्बे अमराती में हुआ। उनके मां बाप उन्हें बहुत पढ़ा लिखा आदमी बनाना चाहते थे। और शायद इसलिये उनके सिर पर एक लम्बी चोटी रखी। जिसके होती है लम्बी चोटी वह होता है ‘ज्ञानी’इस कथन में विश्वास करते हुये (उनके पिताजी ने जो कॉन्स्टेबल होने के साथ साथ पुरातनवादी थे) उनके चोटी रखी। पर ज्ञानी जी महाराज इतने ज्ञानी हुए कि चौथी जमात से आगे नहीं पढ़ सके। मोहन चोटी स्कूल वालों के वास्ते मुसीबत थे और मोहन चोटी के लिए स्कूलवाले। इस मुसीबत को हमेशा के लिये रफा-दफा करने के लिए उन्होंने पहले स्कूल छोड़ा और फिर हिसाब करके घरवालों को भी साष्टांग प्रणाम कर लिया।

मोहन चोटी को उन दिनों नाटक देखने का बड़ा शौक था। वह नाटक देखते-देखते उसमें भर्ती होने के ख्वाब देखने लगे। और एक दिन सचमुच नाटक कम्पनी

में भर्ती हो गये।

उन्होंने बताया कि उसी नाटक कम्पनी की ओर से हमारे यहां से कुछ ही दूरी पर ‘रामायण’ तथा एक और नाटक खेला जा रहा था, मैं ‘रामायण’ में सीता का पार्ट करने के लिये चुना गया। रामलीला तक तो मैं अच्छी तरह काम करता रहा पर जब दूसरे नाटक की बारी आई तो मेरे होश उड़ गये। जानते हो क्यों, सामने दर्शकों के बीच मैंने अपने पिताजी को देख लिया। अब क्या हो किसी तरह काम समाप्त हुआ। मैं कहीं भाग जाने की सोच रहा था कि पिताजी गुस्से में लाल पीले हुए भीतर आये और निर्देशक से कहा मैं अपने लड़के को वापस ले जा रहा हूं। निर्देशक के होश उड़ गये उसने कहा, हम उसे नही जाने देंगे। वह चला गया तो उसकी भूमिकाओं का क्या होगा ?” बस उसका यह कहना था कि पिताजी के क्रोध का पारा एकदम आसमान पर चढ़ गया। उन्होनें धमकी भरी आवाज में कहा “जानते हो मैं पुलिस वाला हूं। मैं तुम पर आरोप लगाऊंगा कि तुम मेरे लड़के को बहका कर यहां ले आये हो। और जानते हो इसकी सजा क्या होगी ?” पुलिस के उस रौब के सामने निर्देशक की कुछ न चली। वे ठण्डे पड़ गए। पिताजी मुझें वापस घर ले आये।

पर क्या भ्रम जैसा पंछी पिंजरे में बंद हो सकता था। घर लौट कर मेरा दम घुटने लगा। और फिर एक दिन मौका पाकर मै चुपचाप अमरावली को अलविदा कर इधर उधर भटकता-फिरता, आखिर मुंबई पहुंच गया।

इस तरह मोहन चोटी स्कूल से भागे, घर से भागे, नाटक कम्पनी से भागे और जब वह सब मुसीबतों से भाग कर मुंबई आये तो यहां की भागम-भाग देख कर उन्हें लगा कि उसे जिंदगी में भागना है, पर पीछे नही आगे और शायद उसी दिन से बड़ी से बड़ी मुसीबत में भी उन्होंने पीछे मुड़ कर कभी नही देखा।

मुंबई के फुटपाथ पर

मुंबई में मोहन चोटी को खुले आकाश के नीचे फुटपाथ पर ही रहना पड़ा। वहीं घर, वहीं रहना, वहीं सोना। जो काम मिला वही कर लिया। काम नही मिला तो भूखे पेट सो गये। न जाने कितने दिन भूखे पेट काटने पड़े न जान कितने दिन पांच पैसे के चने खाकर गुजारने पड़े।

मोहन चोटी का अपना प्रिय घर यानि उनका फुटपाथ दादर में ही था। दादर में ही कई फिल्मी स्टूडियोज थे। जब उन्हें फिल्मों का पता चला तो उछल पड़े एक्टर लोगों को देखने की उनकी इच्छा हुई क्योंकि वह खुद एक एक्टर थे और देखना चाहते थे कि दोनों के बीच दूरी कितनी है। और दोनों की जिंदगी में फर्क कितना है।

मोहन चोटी दादर के फिल्म स्टूडियोज के चक्कर काटने लगे। एक दिन अचानक उन्होंने देखा रणजीत स्टूडियो से दिलीप कुमार कार से बाहर निकल रहे हैं। मोहन चोटी खुशी से उछल पड़े क्योंकि वह उनका फैन था। अचानक दिलीप साहब की कार बिगड़ गयी। मोहन चोटी की चोटी वाली बुद्धि काम कर गयी और उन्होंने झट से मोटर को धक्का लगा दिया। दिलीप कुमार ने खुश हो कर उसे एक रुपये का नोट दिया। पर हाय री किस्मत, मोहन चोटी को इतनी खुशी हुई कि वह नोट ही उनसे कही गिर गया। उनके एक रुपये के सारे सपने बिखर गये।

एक्स्ट्राओं की जिंदगी

दादर स्टूडियोज के चक्कर काटते काटते एक दिन मोहन चोटी की मुलाकात एक एक्स्ट्रा सप्लायर से हो गयी। यह मुलाकात दोस्ती में बदल गयी और मोहन चोटी एक्स्ट्राओं की टोली में शामिल हो गये। वह कभी भीड़ में खड़े हते तो कभी होटलों के दृश्य में उनका चेहरा दिखायी पड़ता उन्हें खुशी थी कि उनका मेकअप होने लगा था और उन्होंने चने, मूंगफली और पापड़ भुजिया खाने के लिए कुछ पैसे मिलने लगे थे।

मोहन चोटी को पहली सीढ़ी मिल गयी थी। फिर क्या था, वह एक्स्ट्राओं की संगत में बैठ कर चुटकुलों से स्टूडियो के लोगों का मन बहलाने लगे। वे हंसते-हंसाते और लोगों के दिल में गुदगुदी पैदा करते। उनकी बातें सुन-सुन कर लोग हंसते-हंसते लोटपोट हो जाया करते थे। लोग उनकी हास्य मुद्राएं देख कर खुश होते थे। धीरे-धीरे उनके हंसोड़पन की चर्चा, इस कान से उस कान तक पहुंची और अनेक निर्माता-निर्देशको का ध्यान उनकी ओर गया। सबसे पहले सत्येन बोस ने उसे ‘जाग्रति’ में एक छोटा किंतु महत्वपूर्ण रोल दिया। उसके बाद वह ‘देवदास’ में आये। ‘हम पंछी एक डाल के’‘बरखा’‘चलती का नाम गाड़ी’‘लहरें’‘धूल का फूल’ आदि अनेक महत्वपूर्ण फिल्मों में चटपटी भूमिकाएं कर, वह एक्स्ट्रा से ऊपर उठ कर हास्य अभिनेता बन गये। हास्य अभिनेता के रूप में वह 60 से अधिक फिल्मों में कार्य कर चुके हैं। कई फिल्मों में खूब जमे, कईयों में वह कुछ नाटकीय हो गये। पर हां, वह अपने से और अपनी परिस्थितियों से कभी नही उखड़े न कभी उन्होंने निराशा में पीछे मुड़ कर ही देखा वह मुंबई की भागम-भाग में शामिल हो गये और तेजी से सीधा सामने को भागने लगे, अपनी मंजिल की ओर।

वह मंजिल थी निर्माता-निर्देशक बनने की, जो वह ‘धोती लोटा’ और ‘चौपाटी’ के साथ बन बैठे हैं। उनका कहना है कि फिल्मों में अपना स्थान बनाने के लिए सबसे बड़ी पूंजी है मेल-मिलाप और धैर्य। जिसके पास यह पूंजी नही वह लाखों की धनराशि खर्च करके भी फिल्म बनाने में सफलता प्राप्त नही कर सकता। मेरे पास न धोती थी, न लोटा, यानि पूंजी के नाम पर ठन ठन गोपाल। पर मैंने सब कलाकारों और तकनीशियनों तथा अपने यारों की मदद से, उनके सहयोग से यह फिल्म पूरी कर ली है। अब तो भाग्य गंगा मैया के हाथ में है मैं चौपाटी के सागर को नारियल भेंट कर आया हूं। कहते हैं मुंबई का सागर जब प्रेम भाव से आपका चढ़ाया हुआ नारियल स्वीकार कर लेता है तो आपको मुंबई नगरी में बड़ी कामयाबी मिलती है। मेरा अनुमान है कि सागर देवता ने मेरा नारियल स्वीकार कर लिया है।


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Mayapuri

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