मैं अपनी यूनिट के मेम्बरों को फैमिली की तरह मानता हूं मनोज कुमार

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मायापुरी अंक 42,1975

मनोज कुमार महबूब स्टूडियो में ‘सन्यासी’ की शूटिंग कर रहे थे। हम भी वहां पहुंच गए। लंच में टाइम मिला तो हमने मनोज से कहा। आपके बारे में लोगों का ख्याल है कि आप दोहरा व्यक्तित्व रखते हैं। यह आपका अहसासें बताती हैं या लोगों के गलत अंदाज़?

कहने वालों को कौन रोक सकता है ? आप इतने अर्से से जानते हैं। मैं क्या हूं और क्या नही हूं। यह तो आप खुद भी जानते होंगे मुझसे क्या पूछते हैं? मनोज ने हम पर ही बात खत्म कर दी। लेकिन प्राय: देखा गया है कि आप अपनी हीरोइनों के साथ मिक्सअप नही होते। इससे क्या इस बात की पुष्टी नही होती। हमने कहा।

अगर मिक्सअप होने का अर्थ यह है कि मैं अपनी हीरोइनों के साथ फ्लर्ट करूं रोमांटिक स्कैन्डल फैला दूं जिससे गपशप लिखने वालों को अपने कॉलमों के लिए मसाला मिले। तो जनाब यह काम वाकई अपने बस का नही है। मैं अपने यूनिट के तमाम मेम्बर्स को अपनी फैमिली मेम्बर की तरह मानता हूं हीरो या निर्देशक होने के नाते हीरो इनके इतने करीब हो जाऊं कि लोग उंगलियां उठाएं और अखबार वाले अपने पन्ने काले करें। मैंने इस प्रकार न पहले कभी पब्लिसिटी ली है और न लेने का अभिलाषी हूं। मनोज कुमार ने स्पष्ट कहा।

क्या यह सही है कि आप कम फिल्में इसलिए करते हैं कि आप बॉक्स ऑफिस की परीक्षा से डरते है? हमने पूछा।

यह आज की बात नही है मैं तो शुरू से ही फिल्मों की संख्या बढ़ाने की बजाए अच्छी कहानियों और अच्छे पात्रों की खोज में रहा हूं। लड़की के इर्द-गिर्द दौड़ने भागने और गाने वाले पात्रों से मुझे सदा चिढ़ सी रही है। यह बात इसलिए भी ठीक नही है कि दस बारह फिल्मों में से दो-तीन तो निकल भी जाती हैं किंतु दो-तीन फिल्मों में ही काम करना हो तो जोखिम बढ़ जाता है। क्या मैं गलत कह रहा हूं ? मनोज कमार ने हमसे पूछा।

लेकिन जब इतनी कम फिल्में आप इतने आत्म विश्वास के साथ करते हैं तो आपको इतना तो पता होगा ही कि जनता कैसी फिल्में पसंद करती हैं? हमने पूछा।

यह बात तो कोई भी दावे के साथ नही कह सकता कि वह जनता की नब्ज या पसंद को जानता है। तो मैं कैसे मान लू कि मैं सब कुछ जानता हूं। मनोज ने कहा।

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Mayapuri