‘अफवाहें कभी सच नही होती’– रीना रॉय

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मायापुरी अंक 42,1975

नये वर्ष के उपलक्ष्य में सुनील दत्त के यहां एक शानदार पार्टी आयोजित की गयी। इसी पार्टी में सुनील दत्त की अपनी संस्था अजंता आर्टस के बैनर के तले दो फिल्मों के निर्माण की घोषणा की गयी।

इस उपलक्ष्य पर एक पार्टी में कई फिल्मों चेहरें नजर आयें, मगर इनमें सबसे ज्यादा आकर्षित कर रही थी नीले रंग की साड़ी में लिपटी रीना रॉय। मेरी नजर भी उस पर केन्द्रित थी ही। मैंने उनसे बतचीत करनी चाही थी तो उन्होंने कहा था कभी घर तशरीफ ले आइएगा।

बातचीत के लिए एकांत ही अधिक उपयुक्त रहता है। अत मैंने उनकी बात मान ली।

आज इस बात को बीते पांच माह हो गये हैं। उस रात के साथ ही मुलाकात की बात भी गायब हो गयी थी।

लेकिन आज अचानक रीना रॉय की यादें यों ही नही आ गयी। इन दिनों ‘जख्मी’ की काफी रेडियो पब्लिसिटी हो रही है। और फिल्म ‘जख्मी’ की नायिका है रीना रॉय।

उनका इंटरव्यू करने का इशारा करते हुए मैंने उन्हें फोन (537273) घुमाया तो उधर से आवाज आयी,

मैं बरखा बोल रही हूं।

मैंने अपना परिचय दिया और फोन करने का अपना उद्देश्य बताया। रीना शाम को ‘फ्री’ थी इसले बरखा ने शाम को घर पर ही आने का निमंत्रण दे दिया।

अगले दिन मैं शाम को रीना के फ्लैट पर पहुंचा। रीना खार में रहती हैं।

मैं सुदामा – निवास के उनके ग्राउंड फ्लोर पर बसे घर पर पहुंचे। ‘कॉल बेल’ दबा दी।

कुछ पल बाद जब द्वार खुले पहले बरखा के दर्शन हुए, फिर उनके भाई के. रीना कहीं नजर नही आ रहीं

जब तक रीना आयीं, उनके भाइ ने मेरा इंटरव्यू ले डाला।

रीना ने कुछ पल में ही इधर – उधर की काफी बातें कर डाली, जब खामोश हुईं तो मैंने कहा,

अब इंटरव्यू की शुरूआत जाये?

ठीक है पूछिये, क्या पूछ रहे हैं

इंटरव्यू की शुरूआत इस प्रश्न ने की,
कि पिछले दिनों आपके बाएं जो अफवाहें उड़ी हैं। इस विषय आप कुछ कहना चाहेंगी ?

शुरू शुरू में तो मैं समझती कि फिल्म पत्रिकाएं बड़ी जिम्मेदारी के साथ खबरें आदि छापा करतीहैं। लेकिन बाद में हकीकत खुल कर समाने आने लगी। महसूस हुआ कुछ पत्रिकाएं सिर्फ बिक्री बढ़ाने लिये किसी भी कलाकार के बारे में कुछ भी छाप दिया करती हैं। दुख की बात तो यह है कि जिन पत्रिकाओं को ऐसी गैर – जिम्मेदार खबरें नही छापना चाहिये, वे भी मज़े ले लेकर छापती हैं। मैं कई ऐसे पत्रकारों को जानती हूं जो मुझसे रुपये मांगने आये थे। जब मैंने इंकार कर दिया, और रुपये देती भी किस लिए ? तो उन्होंने सपने में भी न सोची जाने वाली ‘चीप बातें’ मेरे साथ जोड़ दों और दिल्ली की पत्रिकाओं में छपवा दी। मैं ऐसे पत्रकारों को भी जानती हूं जिनको पत्रकारिता की ए.बी सी.भी नहीं आती या जिन्होंने किसी एक कलाकार के भी आज तक दर्शन एक नही किये, उनके बारे में ऐसे – ऐसे मनधड़त किस्से लिख मारे, कि पढ़ दांतो तले उंगली दबा लेनी पड़ती है। दिल्ली के ही दो तीन पत्रकार, जिन्होंने कभी मुंबई की झलक तक नही देखी, मुंबई के कलाकारों के प्रेम के किस्से झूठ – झूठ ही इस तरह लिख मारते हैं, जिन्हें पढ़ कर ऐसा लगता है, मानो सब कुछ उन्हीं के आते ही घटित हुआ हो। यह सिवाय है। ऐसा नही होना चाहिए।

मैंने कहा,

आप यह कहना चाहती हैं कि जो कुछ छपता है, वह सब गलत होता है।

जी नही मगर जो बातें गलत हैं, वे तो नही छपनी चाहिए न। और कई बातें ऐसी भी होती हैं कि जिनके छपने पर कलाकार की पारिवारिक जिंदगी में तूफान आ जाता है।

वातावरण गर्म होने लगा तो मैंने अपने इंटरव्यू का रूख दूसरी ओर मोड़ दिया,

क्या आप नायिका की भूमिका अलावा अन्य भूमिकाएं भी स्वीकार करेंगी?जबकि आप के पास नायिका वाली फिल्में काफी हैं।

गंभीरता के साथ रीना रॉय ने उत्तर दिया।

आपका कहना बिल्कुल सही है। इन दिनों में मैं कई फिल्मों में काम कर रही हूं, इसके बावजूद अगर कोई फिल्मकार मेरे पास छोटी या बड़ी मगर अच्छी भूमिका लेकर आयेंगे तो मैं तुरन्त तैयार हो जाउंगी हम जैसो को चाहिए कि वह कभी भी छोटे बड़े रोल के बारे में सोच कर अपना दिमाग खराब नही करें। मुझें तो कहानी पसंद आ जाती है तो मैं तुरंत हामी भर देती हूं। फिर पलट कर यहां नही देखती हूं कि फिल्म का हीरो टॉप का है या कोई नया ? डायरेक्टर हिट है या फ्लॉप सही अर्थो में कलाकार वही है। जो कभी इस विषय में न सोचे। मुझे तरह-तरह की भूमिका निभाने का बहुत शौक है। मैं चाहती हूं कि कभी बांध पर काम करने वाली मजदूरन बनूं तो कभी किसी भिखारिन का अनोखा रोल करूं कभी किसी विधवा बहु की मर्मस्पर्शी भूमिका निभाऊं तो कभी कॉलेजको चंचल बाला का ‘रोल’ करूं। सीधी-सच्ची बात है कि हर रोल में कम से कम एक्टिंग का चांस हो। बस वह ऊट-पटांग रोल न हो।

मैंने अगला सवाल पूछा।

फिल्म जरूरत के बाद अक्सर आपके पास वैसे ही रोल बहुत आये होगें क्या आपको ऐसे रोल करने से अब आपत्ति है?

जी नही, रीना ने उत्तर दिया, मेरा चुनाव सिर्फ सैक्स और नग्नता तक ही सीमित नही है। वैसे सैक्सी फिल्मों में काम करना बुरी बात नही है। बुरा तो वही है, जो गलत है। फिल्में शिक्षा का एक माध्यम है। यह इशारा जी की विशेषता है कि वे समाज की बुराइयों को फिल्म के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं। यदि मैंने उनके महान कार्य में सहयोग दिया तो कोई बुरी बात नही है। बुरा तो तब होता कि जब मैं इस फिल्म में काम नही करती। भई, मन चंगा तो कठौती में गंगा यह तो नजर अपनी अपनी और ख्याल अपना अपना वाली बात है। पहले हमें खुद अपने बारे में सोचना चाहिए, तब औरों के बारे में सोचना चाहिए या कुछ कहना चाहिए।

लेकिन मैंने तो यह पूछा है कि क्या आपको ऐसे रोल्स से एतराज है?

जी नही, बशर्ते कहानी वैसे ही बोल्ड हों। और ऐसी फिल्में सिर्फ इशारा जी ही खूबसूरती के साथ बना सकते हैं, क्योंकि वे बॉक्स ऑफिस की दृष्टि से कभी फिल्में नही बनाते।

रीना रॉय के इस उत्तर के बाद मैंने पुन: इंटरव्यू का रूख बदला,

फिल्मों में लाने का श्रेय आप किसे देती हैं?

सबसे पहली अपनी मां को। रीना ने बताया।

मैंने चौंकते हुए पूछा,

वह कैसे? आपकी खोज तो इशारा जी ने की है न?

जी, नही, रीना ने उत्तर दिया,

मैं आपको शुरू से बताती हूं। मुझे बचपन से ही फिल्मों का शौक रहा है। मैं अपनी मां की शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने कभी मेरे किसी भी शौक का विरोध नही किया। शुरू में जब फिल्में देखने की जिद करती तो कभी नाराज नही होती। रोजाना फिल्में देखती फिर चाहे टिकट ब्लैक में ही क्यों न मिल? मीना कुमारी और तनुजा को फिल्मों के पीछे तो मैं जान देती थी। धीरे-धीरे यह शौक बढ़ते-बढ़ते अभिनय का रूप धारण कर सामने आ गया। इस पर भी मां ने कभी बुरा नही माना। मैंने नृत्य की तालीम लेनी चाही तो मां ने कथक नृत्य की शिक्षा के लिए मास्टर मदन से कहा। मैं उनसे नृत्य सीखने लगी। साथ ही स्टैज पर नाटक आदि में भाग लेने लगी। निर्देशक जगदेव भाम्बरी, इस वक्त जो हेमा मालिनी को अपनी फिल्म ‘शराफत छोड़ दी मैंने’ का निर्देशन कर रहे हैं, हमारे पारिवारिक मेंबर की तरह हैं। मैंने उन्हें अपने दिल की बात बतायी। एक दिन सचमुच वे बी.आर इशारा को हमारे घर ले आयें। मुझेंविश्वास नही हुआ वे हमेशा नयी अभिनेत्रियों की तलाश में रहते हैं। मुझमें उन्हें जाने क्या बात नजर आयी, उन्होंने मुझें अपनी फिल्म ‘नयी दुनिया नये लोग’ के लिए अनुबंधित कर लिया, अभी यह फिल्म रिलीज

नही हुई। इसके बाद में इशारा जी ने मुझे ‘जरूरत’ में पेश किया और इसके बाद तो मुझे धड़ाधड़ फिल्में मिलने लगी। इस तरह फिल्मों मे लाने का श्रेय जगदेव भांबरी को जाता है। साथ ही मां को भी, जिसके आशीर्वाद के बिना मैं कभी सफल नही हो सकती थी।

रीना रॉय का जन्म मुंबई में हुआ। और वही कांवेट मैं मैट्रिक तक शिक्षा पायी। वह पंजाबी हैं, लेकिन नाम से बंगाली होने का आभास होता है। रीना का असली नाम रूपा है। रीना फिल्मी नाम है, लेकिन इशाराजी का यूनिट के किसी सदस्य की गलती से रीना के साथ राय शब्द लग गया, बस उसी दिन से वह रीना राय कहलाने लगीं। उनकी सबसे बड़ी इच्छा यह है कि वह अपने मन में छुपी अभिनय प्रतिभा का सदुपयोग कर लें। अपने प्रशंसको को वह स्वयं पत्र लिखती हैं। वह कहती हैं, सेकेट्री भी पत्रोत्तर दे सकता है लेकिन जो बात मैं लिखना चाहती हूं वह भला सेकेट्री कैसे लिख सकता है ?


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Mayapuri

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