जितेन्द्र और शोभा की शादी में मेरा हाथ नही हैं – संजीव कुमार

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मायापुरी अंक 18.1975

कुछ ही दिनों पहले ‘नटराज स्टूडियोज’ में संजीव कुमार से मुलाकात हुई। मैनें उनसे घर पर मिलने का समय ले लिया और ठीक समय पर जा पहुंचा। यह मिलनें का समय अक्सर सुबह 8 बजे से लेकर 9-30 बजे तक रहता है, जब वे दाढ़ी बनाते हैं, नाखून काटते हैं, फोन पर लोगों से बात करते हैं, और आने वाले निर्माताओं तथा उनके एजेन्टों से एकांत में (जिसके लिए मुख्य हाल के पास ही एक छोटा सा अपार्टमेंट बना हुआ है और जहां गद्दे-तकिये लगे हुए है) बैठ कर बातें करते हैं। जब मैं पहुंचा तो वे अपनी शेव कर रहे थे और पहले से ही पांच छ: व्यक्ति उनके पास बैठे हुए थे।

मैं पेशोपेश में पड़ गया। बात कहूं या न कहूं। उन्होनें खुद ही बात चला कर पूछा, “आप इंटरव्यू लेना चाहते हैं?”

मैनें कहा, “इंटरव्यू तो फिर कभी तैयारी के साथ लूंगा, इस वक्त तो केवल एक सवाल खास रूप से पूछना है।“

“पूछिये”

जीतू और शोभा की शादी में आपने क्या खास रोल अदा किया?” मेरे इस सवाल पर संजीव कुमार चौंक उठे। थोड़ी देर वे खामोश रहे। वह पल भर की खामोशी भी रहस्यमय लग रही थी। फिर कुछ सोच कर बोले “जीतू मेरे दोस्त हैं, दोस्त ही नही यार हैं और इसलिए उनकी खुशी में मैं खुल कर हाथ बंटाना चाहता था। शोभा सिप्पी से भी मेरा गहरा परिचय है। मैं कई दिनों से चाह रहा था कि दोनों की शादी हो जाए तो अच्छा है।“


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Mayapuri

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