INTERVIEW: मैं एक महिला निर्देशक के साथ एक्शन फिल्म करना चाहता हूँ – शाहरुख खान

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फिल्म रिलीज़ से पहले की बातचीत-

लिपिका वर्मा :

शाहरुख खान की फिल्म ‘रईस’ राकेश रोशन की फिल्म ‘काबिल’ के साथ रिलीज हुई इस 25 जनवरी को, जैसा की अनुमान था कि- शाह रुख की फैन फोल्लोविंग बहुत होने की वजह से रईस फिल्म को काबिल से कई बेहतर ओपनिंग मिलेगी। और ठीक वैसा ही हुआ भी है बुधवार – 20.42 करोड़, गुरुवार 26.30 करोड़, शुक्रवार 13.11 कुल मिला कर राज की तीन दिन की कलैक्शन त्र 59.83 करोड़ है। जबकि काबिल की तीन दिन की कुल कलैक्शन 38.87 करोड़ कर पायी है। जैसा की शाह रुख और राकेश रोशन एवं रितिक ने भी यही  कहा है की दोनों फिल्में बॉक्स ऑफिस पर अच्छा करें। किन्तु अमूमन ऐसा हो नहीं पाता है। स्टार पावर जो शाह रुख खान का है सो हर एक फैन उनकी फिल्म देखना पसन्द जरूर करेगी। रितिक की फिल्म माऊथ ऑफ गुड वर्ड द्वारा धीरे धीरे बहुत अच्छा कर पायेगी ऐसा ट्रेड पंडितों का मानना है।

जहां शाह रुख ने प्रोमोशन्स के अलग अलग फंडे आजमाए है अपनी फिल्म ‘रईस’ के लिए। यह हम सब को मालूम है। मुम्बई से दिल्ली की यात्रा तो यादगार बन गयी है। इस यात्रा के दौरान शाह रुख के एक फैन की भागदौड़ में मृत्यु भी हो गयी। शाह रुख ने इस पर अफसोस भी जताया था। वही रितिक रोशन जो की काबिल फिल्म के हीरो है प्रोमोशन्स में उन्होंने भी कोई भी कोर कसर नहीं छोड़ी है। दरअसल में आज के हीरोज बड़े दिल वाले हो गए हैं। सब  अपने अपने काम में ही मशुगूल रहते है और यही कहते हैं कि सब की फिल्म बॉक्स ऑफिस में अपना झंडा गाड़े। खैर ऐसा होना मुमकिन नहीं है – एक फिल्म आगे और एक पीछे रह ही जाएगी – शाह रुख खान की फिल्म ‘रईस’ अपनी हैसियत इन दो दिनों में तो जमा पाई है। वीकेंड के बाद सोमवार और मंगलवार भी बॉक्स ऑफिस के लिए महत्वपूर्ण होते है। अब देखना यह है की रितिक रोशन की फिल्म ‘काबिल’ अपनी काबिलियत दिखाती है बॉक्स ऑफिस पर या नहीं?? यह समय ही बतायेगा?? हालांकि रितिक की फिल्म को समीक्षकों ने ढेर सारे स्टार्स दिए है। अब देखना यह होगा कि धीरे-धीरे क्या काबिल फिल्म ‘रईस’ को पटकनी दे पाती है या नहीं –

चलिए फिल्म रिलीज से पहले शाह रुख खान से जब हमने रात 12 बजे भेंट की तब भी वो हमसे बहुत अच्छी तरह से मिले – सवाल के जवाब भी उन्होंने सटीक दिए –

पेश है शाह रुख खान के साथ लिपिका वर्मा की बातचीत के कुछ प्रमुख अंश

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इस फिल्म में जहाँ मेरे बचपन से जवानी और फिर 40/42 वर्ष के अधेड़ के उम्र में भी नजर आएगा, यह फिल्म का किरदार मेरी अन्य फिल्मों से बहुत अलग है। यही इस चरित्र में प्रमुखता दिखलाया गया है कि-यह आदमी किस तरह सफलता पाने के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार है। इस में जो फाइट के दृश्य है वह निर्देशक राहुल ढोलकिया ने बहुत ही रियल तरह पेश किया है। ऐसा नहीं है कि कुछ लड़ाई के सीन करने के उपरान्त हीरो तुरंत नाच और गाने के सीन में नजर आये। फिल्म ‘राईस’ का बैकग्राउंड भी अत्यन्त क्रिएटिव है। जैसा शाह रुख ने हमसे कहा था वैसा ही उनका किरदार है रईस फिल्म में।

इस किरदार को मैंने केवल इस लिए चुना क्योंकि जो कहानी है बहुत ही सच्चाई से लिखी गयी है और पेश भी वैसे ही की गयी है। हो सकता है फिल्म में भूख लगने पर यह किरदार चोरी भी करता है। स्मगलिंग करने में भी यह किरदार पीछे नहीं हटता हो किन्तु यह भी सच है यदि बुराई न हो तो अच्छाई को टक्कर देने के लिए कुछ नहीं होगा। किन्तु यह चरित्र बेधड़क जो कुछ भी बुराई करता है उसे नकारता भी नहीं है। हर किरदार को बहुत ही इज्जत से पेश किया गया है। यदि मेरा किरदार कुछ बुराई कर भी रहा है तो वह-अपने दोस्त, परिवार या अपने नजदीकियों की भलाई हेतू कर रहा होगा। सीधी सी बात है बुराई करते हुए भी उसकी अच्छाई आपको नजर आएगी सो वो नेगेटिव नहीं लगेगा।

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ऐसा नहीं है कि हमारे यहां की हीरोइन्स इस किरदार में सक्ष्म नहीं लगती। जब शाह रुख खान होता है किसी फिल्म में तो सीधी सी बात है एक स्टारडम साथ ले आता है। यदि कोई नए कलाकार मेरे अपोजिट हो तो उसकी फ्रेशनेस मुझे सपोर्ट करेगी। स्टारडम कुछ विपरितार्थक चीज भी ले आता है सिनेमा में। इस में जो फीमेल किरदार है वह 95 के दशक से है। चेहरे से भोली लगने वाली आसिया अंदर से काफी मजबूत भी है। इस किरदार में उसकी बहुत ही मूकदर्शक टाइप मजबूती दिखाई गयी है। इस फिल्म में सब अछूते चेहरे हैं और जितने भी अन्य फाइटर्स हैं सब नए लिए गए है। इससे मुझे कुछ अलग करने और दिखने में आसानी होती। मेरी कलाकारी पर एक नयापन नजर आएगा। सो सब नवीनतम चेहरे होंगे इस फिल्म में जो रियल भी लगेंगे। यहाँ जो कुछ जवाब दिए शाह रुख ने उसके ठीक विपरीत- लोगों के दिल में माहिरा जगह नहीं बना पायी। फिल्म देखने के बाद लोगों ने उसकी तारीफ नहीं की है।

अभिनेता की हैसियत से हम लोग हमेशा ही असन्तुष्ट रहते। और भी अच्छा है जिस दिन सन्तुष्टि आ जाएगी हममें उस दिन समझो हमें काम करने में मजा नहीं आ रहा है। मैं सफल अभिनेता बनने के लिए नहीं आया था, क्योंकि यह बात हमें मालूम भी नहीं होती है। न ही मैं पैसे कमाने की मंशा से यहाँ आया था। बस कुछ अच्छा काम कर लूँ यह सोच कर फिल्मों में प्रवेश किया। पर अब इतना कुछ मिल गया है तो हमेशा यही सोचता हूँ मेहनत कर कुछ ऐसा कर गुजरूं जो कम से कम मील का पत्थर साबित हो।

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अवॉर्ड्स मिलना, बॉक्स ऑफिस सफलता मिलना यह एक अभिनेता के लिए अंत नहीं होता है। बल्कि इन सब को पाने के बाद बेहतर काम करना और मेहनत करना यही महत्वपूर्ण हो जाता है उसके लिए। फ्राइडे को जो मेरी फिल्म रिलीज हो जाती है उसके बाद मेरा उससे कोई जुड़ाव नहीं होता है। वह जनता की हो जाती है। बस हर फ्राइडे के बाद मैं अपनी आगे की फिल्मों से जुड़ जाता हूँ। हर प्रातः कल जब मैं उठता हूँ तो मुझ में एक नई ऊर्जा होती है आगे की फिल्म को लेकर। बस यही जेहन में रहता है हमेशा कि क्या फ्रेश और नया करूं अपने अभिनय से ताकि मेरे फैंस और दर्शकों को मैं और लुभा पाऊँ। असंतुष्टि ही मुझे आगे लेकर जा रही है, उम्र के इस पड़ाव पर भी। फिल्म में शाह रुख की मेहनत दिख पड़ रही है। उन्होंने अपने को अलग पेश करने की भरसक कोशिश की है। और वह एक एंग्री-मैन लगते हैं इस किरदार में।

जी हाँ, यह मेरी खुशकिस्मिती है कि मैं फराह खान एवं गौरी शिंदे के साथ जुड़ पाया। मुझे स्त्री निर्देशकों के साथ काम करने में बहुत अच्छा लगता है। क्योंकि एक पुरुष होने के नाते यदि कोई हो तो मैं अलग तरह से उसे देखती हूँ। किन्तु फराह उसे अलग तरह से देखती है। जब पर्दे पर फराह के हिसाब से किया गया जोक देखता हूँ तो एहसास होता है कि वो अच्छा लग रहा है। तो एक स्त्री के सोचने के ढंग अलग होते हैं और पर्दे पर लोगों को भी अच्छे लगते हैं। गौरी शिंदे ने भी मुझे ‘डियर जिन्दगी’ में अलग तरह से पेश किया। शायद लिंग अलग होने की वजह से हमारे विचार मेल नहीं खाते हैं। किन्तु स्त्री निर्देशक के साथ काम किया और लगा कि वो अच्छा काम करती है। यह नहीं कह रहा हूँ कि कोई पुरुष निर्देशक अच्छा नहीं है, उनके पास भी अलग तरह की सोच होती है और कोई भी यदि मेरे पास बेहतरीन काम लाये तो उनके साथ भी काम करना है मुझे।

कुछ हंस कर शाह रुख बोले, ‘‘मेरी इच्छा है कि – मैं एक महिला निर्देशक के साथ एक्शन फिल्म करूं। देखना होगा वह एक्शन किस तरह से निर्देशित करती है।’’


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Mayapuri

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