सारी फिल्मीं दुनिया बंडलबाज हैं शम्मी कपूर

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litpySjghjjsi

 

मायापुरी अंक 15.1974

महबूब स्टडियोज में ‘बंडल बाज’ की शूटिंग होने वाली थी। जब मैं सैट पर पहुंचा तो शॉट के लिए लाइटिंग की व्यवस्था हो रही थी। फिल्म के डायरेक्टर शम्मी कपूर अपनी कुर्सी पर बैठे सिगरेट का कश खींचते हुए अपने मूड मे खोये हुए थे, शायद वे कैमरा एंगल के बारे में कुछ सोच रहे थे। उनते एक सहायक ने बताया कि आज राजेश खन्ना पर कुछ नाटकीय सीन फिल्मायें जाने वाले है। वह बेकारी से पीड़ित युवक है जो नौकरी की तलाश में दादाओं के गिरोह में पड़ जाता है और स्वयं भी दादा की तरह बर्ताव करने लगता है। राजेश खन्ना अपने मेकअप रूम में थे। जूनियर आर्टिस्ट और फाइटरसैट पर टहल रहे थे। सैट को देख कर लग रहा था जैसे हम किसी अन्डरवर्ल्ड के तहखाने में पहुंच गये है।

हीरो से बातचीत करने की बजाय, मैनें सोचा, आज फिल्म के निर्देशक शम्मी कपूर से ही कुछ बातें करें वे अपने जमाने के रिबैल एक्टर रहे है और हमारी फिल्मों में ‘याहू’ कल्चर लाने वाले पहले आर्टिस्ट है। शम्मी साहब आंखे मूंदे साधू महात्मा की तरह ध्यान मे खोये हुए थे। ढीली-ढीली पैंट और बंगाली स्टायल के कुर्ते में वे पूरे बंगाली बाबू या ‘दादा’ लग रहे थे। इस वक्त उन्हें छेड़ना जलते हुए अंगारे को हाथ लगाना था।

मैंनें आखिर छेड़ ही दिया और पूछा कितने दिन की शूटिंग का प्रोग्राम है?

सिगरेट को झड़कर उन्होनें मुझे घूरकर देखा और कुर्सी के भीतर जरा और खिसक कर बोले जबतक हो जाए। वैसे सात आठ दिन को शूटिंग रखी है पर शूटिंग रखने से क्या होगा, शूटिंग होने से काम बनेगा। मेरा बस चले तो दो तीन महीने मे ही फिल्म पूरी कर दूं पर आजकल बड़े-बड़े कलाकार इतने व्यस्त है कि उनसे शूटिंग की डेट्स लेना किसी वर्ग पहेली का हल ढूंढने के बराबर है।

मैनें फिर पूछा यदि आप खुद ही इस फिल्म के हीरो और निर्देशक दोनों होते तो मेरे इस सवाल पर उन्होनें मुस्कुरा कर कहा मुझे डबल होकर काम करना पड़ता। मैं समझता हूं एक काम करना ही बेहतर है। हीरो बनने पर उसका ध्यान हीरो के इमेज की ओर रहता है और निर्देशक बनने पर उसे पूरी फिल्म पर ध्यान देना पड़ता है। और फिर दोनों कामों में इडीव्हीज्युएलिटी अलग-अलग रहती है जो क्लेश में भी आ सकती है। इसलिए एक ही काम में ध्यान लगाना बेहतर है। जबसे मैंने ‘मनोरंजन’ का निर्देशन किया है तब से अब उसी कार्य को अपना लक्ष्य बनाया है। बस एक ही निशाना है।

“पर आपने ‘मनोरंजन’ में भी रोल किया है बंडलबाज तथा बी.आर. चौपड़ा को ‘जमीर’ में भी आप महत्वपूर्ण भूमिकाएं तो कर ही रहे है न वह क्यों मेरे इस सवाल पर शम्मी कपूर साहब ने सिगरेट का जोरों से कश खींच कर कहा “जनाबआली” फिल्म में हीरो बनना और उसमें करैक्टर रोल करना दोनों अलग अलग चीजें है। दोनों की सीमाएं भी अलग-अलग चीजें है। दोनों की सीमाएं भी अलग-अलग चीजें है। दोनों की सीमाएं भी अलग अलग है। फिल्म में प्रमुख कलाकार हीरो या हीरोइन के सबसे ज्यादा सीन होते है। उन्हें अपनी भूमिका पर ज्यादा ध्यान देना होता है।

“आप जुबली स्टार रहे है। आपकी फिल्में ‘जंगली’‘प्रोफेसर’‘ब्रह्मचारी’‘तुम सा नही देखा’‘अंदाज’ आदि सभी फिल्में हिट हुई और आप सभी फिल्मों में नये अन्दाज के हीरो बन कर आये। आज जबकि, आपकी उम्र से भी बड़े कलाकार दिलीप कुमार और देव आनन्द लगातार हीरो बनते रहे है हो तो आपने हीरो बनना क्यों छोड़ दिया?

इस सवाल पर शम्मी साहब ने तपाक से कहा इस सवाल का जवाब तो मेरा शरीर ही दे रहा है। और फिर तरह-तरह की भूमिकाएं कर रहा था उसके लिए एकदम फुर्तीले और लचीले शरीर की जरूरत है। शायद आपको पता होगा कि ‘अंदाज’ की शूटिंग के दौरान अचानक फिसल जाने से मेरे टखने कुछ खराब हो गये है, मैं अब पहले की तरह उछल कूद नही कर सकता। ऐसी स्थिति में जबरदस्ती अपने आपको हीरो के रूप में थोपे रखना कहां तक ठीक होता। कोई भी हीरो दर्शकों के साथ जोर जबरदस्ती नही कर सकता। अंतिम फैसला दर्शकों के हाथ में ही रहता है। मेरी यह मुकम्मिल राग है कि उम्र के तकाज़े के साथ बड़े-बड़े हीरो को अलविदा ले लेनी चाहिए।

शम्मी कपूर से मैंने एक दिलचस्प सवाल किया आप ‘जगली’ में सायराबानो के प्रेमी थे और अब ‘जमीर’ में आप उसके ससुर का रोल कर रहे है आपको कैसा लग रहा है?

शम्मी सहाब जोर से हंस पड़े। फिर बोले लड़कियों पर भगवान क कृप्या ज्यादा रहती है। आदमी जल्दी प्रौढ़ और बूढ़े लगने लगते है और औरतें खास कर फिल्मों की हीरोइने हमेशा तरोताज़ा रहती है। फिल्म के बाहर भी सायरा के सामने मैं खड़ा होऊं तो उसका रोमांटिक लवर नजर नही आऊंगा। इतना ही नही ससुर के गेटअप में ससुर ही लगूंगा और उसी टोन में रोल करूंगा फिर भी जब कभी सायरा सामने आती है तो उस जमाने की कई मीठी बातें फिल्म की तरह आंखों के सामने घूम जाती है। पर रोल करते समय उन बातों को गुब्त कर लेता हूं। भूमिकाएं-भूमिकाएं ही होती है।

बातचीत का सिलसिला समाप्त नही हो रहा था पर तभी शॉट की तैयारी हो गयी। लाइटिंग की व्यवस्था होने के साथ ही राजेश खन्ना भी आ गये। उनके आते ही इस फिल्म के बारे में उनकी कही हुई एक बात याद आ गयी कि जब भी मैं ‘बंडलबाज’ की शूटिंग में काम करता हूं मुझे शम्मी कपूर की ‘जंगली’ याद आ जाती है। शायद उसकी प्रेरणा से मैं अभिनय जिंदगी की सबसे मजेदार और चुलबुली भूमिका करने जा रहा हूं


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Mayapuri

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