‘मैं अपने पिता की तरह बेजोड़ निर्देशक बनना चाहता हूं’- रणधीर कपूर

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015-2 film nikammaa randhir kapoor

मायापुरी अंक 15.1974
सुन्दर-सलौना नीली आंखों वाला, प्यारा-प्यारा गुड्डा वल्लाह क्या बात है इसकी, पल भर के लिए भी चैन नही, जब देखो तब बिजली की तरह चप्पल। बातें करेगा तो बातें करता ही चला जायेगा। नाचने लगेगा तो नाचता ही रहेगा।
यह गोल-मटोल गुड्डा जब गांव का भोला-भाला छोकरा बनता है तो उसकी मासूमियत दिल को छू लेती है। कभी कोट-पैंट टाई पहन कर शहर का बाबू बन कर तरह-तरह की भाव भगिमाएं बनाता है, कभी पाजामा चोला और गले में दुपट्टा और ताबीज पहन कर सामने आता है। कभी वह नारियल जैसी अपनी मुंडी हिलाता है तो उस करतब के साथ वह पूरा जोकर लगता है। आश्यर्च की बात है वह जितना गोल-मटोल है उतना ही तेज और फुर्तीला भी
राजकपूर और कृष्णा कपूर के यहां जब सपनों के इस राजकुमार का जन्म हुआ तो खुशियों के झूले झूलने लगे। उस दिन राजकपूर से भी ज्यादा उनके स्व. पिता पृथ्वी राज कपूर को और पृथ्वी राज कपूर से भी ज्यादा उनके पिता जी को खुशी हुई कि कपूर वंश का नया चिराग जल उठा है।
जब यह गुड्डा पैदा हुआ तो वह अपने पिता की तरह ही दुबला पतला था। पर समय गुजरने के साथ वह गुब्बारे की तरह फूलता चला गया और घर वाले उसे डब्बू कहने लगे। दीवार का चूना चाटने वाले डब्बू भी जब पैरों पर खड़े होकर चलने लायक हुए तो वे अपने पिता राजसाहब के जूतों में अपने पैर डाल कर चलने की कोशिश करने लगे राज साहब की आंखों में आशा की ज्योति चमक उठी होनहार डब्बू उन्ही के कदमों का अनुसरण कर रहा है।
और आदतें भी ठीक राजसाहब जैसी। खूब खाना-पीना और अपने लोगों से छेड़छाड़ करना। घर वाले परेशान, स्कूल वाले तंग और आस पड़ोस के लोगों के नाक में दम। लड़कियों को चिढ़ाना और परेशान करना और फिर छुप जाना। पिता के पास शिकायत लगी तो मां के पास और मां के पास शिकायत लगी तो पिता के पास। राजकपूर ने खूब अच्छी तरह समझ लिया वह उनके अधूरे सपनों को पूरा करेगा। राजकपूर की छत्रछाया में पलकर डब्बू जी जवान हुए और उन्होनें अपने पिता जी से जो कुछ सीखा और पाया उसे उजागर करने लगे 21 वर्ष पूरे होने के साथ ही वे अपने पिता की तरह कुशल निर्देशक बने और उन्ही की तरह अपनी खास स्टाइल के साथ अभिनेता (हीरो) भी बने।
रणधीर कपूर के निर्देशन में बनी पहली फिल्म थी ‘कल आज और कल’ वे इस फिल्म के हीरो भी थे। नायिका थी उनकी प्रेयसी बबीता। इस फिल्म में उनके पिता और दादा ने भी काम किया था पर बॉक्स ऑफिस खिड़की पर यह फिल्म कामयाब नही हुई। रणधीर कपूर को गहरी चोट इसलिए भी लगी कि जिन निर्माताओं ने उनकी प्रशंसा सुन कर अपनी फिल्मों का हीरो बनाने का फैसला कर लिया था वे अब इस फिल्म की असफलता के बाद डगमगाने लगे। दो चार निर्माताओं ने तो वाकई उन्हें हीरो बनाकर फिल्म बनाने के प्रपोजल बनाये थे, रद्द कर दिये,
अपमान की गहरी चोट से तिलमिलाकर भी रणधीर कपूर अपनी जिंदगी से हतोत्साह नही हुए। जीवन के उदास क्षणों में भी उन्होनें भीतर से प्रेरणा ली। वे कल को भूल कर आगे की सुध लेने लगे। कुछ ही दिनों में जब उनकी दूसरी फिल्म ‘जवानी दीवानी’ जिसमें’ जया हीरोइन थी, कामयाब हो गई तो उनका सिक्का फिर खनखनाने लगा। उनकी तीसरी फिल्म ‘रामपुर का लक्ष्मण’ ने तो एक दम उन्हें गगन चुम्बी शिखर पर चढ़ा दिया। बस फिर क्या था, फिल्मी अंचलों मे चर्चा चल पड़ी कि बहुत अर्से के बाद हिन्दी फिल्मों में ऐसा क्लाउन आया है।
राजकपूर के अभिनय आकाश की जिन सीमाओं तक पहुंच गये थे वहां तक वे पहुंच पायेंगे हम नही कह सकते। पर हां इतना अवश्य है कि उनके अभिनय में राजकपूर को छाया रहते हुए भी उनकी अपनी मौलिकता है और यदि उस मौलिकता का समुचित विकास हुआ तो निश्चित ही वे अपने ढंग के अकेले कलाकार होंगे। इस संबंध में स्वयं रणधीर कपूर पूरे आशावादी है। एक बातचीत में उन्होंने अपनी उंगलियों पर गिनाते हुए मुझे बताया “अशोक” राय के निर्देशन में नीतू सिंह के साथ ‘ढोंगी’ बना हूं तो उसी के साथ प्रयाग राज के निर्देशन में ‘पोंगा पंडित’ भी और यही पंडित उसके साथ ‘निकम्मा’ बन गया है, यह कह कर रणधीर कपूर ने अपनी उंगलियों से अपने आप ही अपने बालों को सहलाते हुए कहा रेखा के लिए मैं ‘अवारा राजू’ हूं, और कुन्दन कुमार के निर्देशन में बन रही फिल्म ‘आज का महात्मा’ में महात्मा भी। वह मेरे साथ ‘दफा 302’ में हैं जिसके महात्मा भी। निर्देशक चांद है, आनन्द सागर के निर्देशन में बन रही फिल्म ‘राम भरोसे’ और हरमेश मल्होत्रा की फिल्म ‘खजाना’ की वही नायिका है। जम्बू के निर्देशन में भी हम दोनों ‘कच्चा चोर’ में काम कर रहे है। निर्देशक बप्पी सोनी ने परवीन बॉबी के साथ मुझे ‘भंवर’ बना दिया है। प्रकाश मेहरा के निर्देशन में ‘हाथ की सफाई’ में काम करने के बाद उनकी अन्य फिल्म‘आखिरी डाकू’ में भी काम कर रहा हूं। और उन्ही का ‘खलीफा’ भी हूं जिसकी नायिका रेखा है। सुलक्षणा पंडित के साथ‘करिश्मा दिखा रहा हूं तो मौसमी चटर्जी के साथ बना हूं ‘चलता पुर्जा’ मुमताज के साथ मेरी फिल्म ‘लफंगा’ शीघ्र ही प्रदर्शित होने वाली है। कहिए फिल्मों के ये नाम कैसे लगे?
“क्यों इसमें भी आपकी कारिश्तानी है क्या” मैंने उत्सुकता से पूछा। “क्यों नही क्यों नही जैसे नाम वैसे दाम जैसे दाम वैसे काम ह ह ह“ कहते हुए डब्बू साहब कुर्सी से उछल कर नाचने लगे।
“इतनी सारी फिल्मों का बोझ उठा कर आप निर्देशन की ओर कैसे ध्यान दे सकेगें” मेरे इस सवाल पर रणधीर कपूर ने कुछ गम्भीर होकर कहा मेरी ‘धरम करम’ आने दीजिए फिर आपका इस तरह पूछना ठीक रहेगा। सच बात तो यह है कि मैं अपने पिता की तरह बेजोड़ निर्देशक बनना चाहता हूं।
डब्बू जी धीरे-धीरे फॉर्म में आ रहे है। धीरे-धीरे उनका अभिनय मजता जा रहा है। धीरे-धीरे वे भीतर से निखरते जा रहे है। पर उनके छोटे भाई ऋषि कपूर उर्फ (चिंटू तो अपनी पहली फिल्म “बॉबी” के साथ ही लोकप्रियता के सातवें आसमान पर पहुंच गये। इस पर लोगों को लगा कि राज साहब की मेहरबानी अपने छोटे बेटे पर ज्यादा हुई है। कुछ लोगों ने यह भी कहना शुरू कर दिया कि डब्बू के मन में चिंटू के लिए गहरी जलन हो गयी है। जब इस तरह की बातों का गुब्बार भर गया तो उन्होनें स्पष्ट रूप से कहा। चिंटू मेरा भाई है, छोटा भाई है उसके लिये प्यार है जलन नही। उसकी सफलता पर मैं जितना खुश हुआ उतना शायद ही कोई हम दोनों का कोई मुकाबला नही है। मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि मुझे मेरे पिता ने नही बनाया। मैं खुद बना हूं और जिस तरह की एक्टिंग कर रहा हूं वह सबसे अलग है। मैं जानता हूं मेरा भविष्य सुरक्षित है।
इसी विषय पर राज साहब ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा “दोनों मेरी बांहे है” एक को बड़े की मैं ऊंचे दर्जे का निर्देशक बनाना चाहता हूं और छोटे-छोटे को ऊंचे दर्जे का कलाकार। फिर भी राज साहब ने अपनी अगली फिल्म ‘हीना का नायक रणधीर को बनाया है, ऋषि को नही। शायद वे किसी ‘खाई’ को पीटना चाहते है। डब्बू जी को अपने परिवार पर पूरा गर्व है। जब भी मिलते है “आई एम फ्राम आर.के. स्टूडियोज” इसी तरह यूनिट के लोगों के साथ बैठे बातों ही बातों में अक्सर कहा करते है मैं फिल्मों के बादशाह राजा साहब का लड़का हूं, शम्मी कपूर और शशि कपूर मेरे अंकल है और प्रेमनाथ जी मेरे मामा है। मैं कपूर परिवार का मेम्बर हूं।
अन्त में वे यह कहना भी नही भूलते कि वे भी अपना एक परिवार बनाने वाले है। अभी तो बेटी हुई है अब जरूर बेटा होगा ठीक मेरी ही तरह गोलमटोल।


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Mayapuri

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