‘टाइटल किसी भी फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष होता है’

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निर्माता, निर्देशक, लेखक, गायक और अभिनेता फरहान अख़्तर अपनी सारी खूबियों के तहत दूसरों से अलग हैं। उनकी सबसे बड़ी खूबी ये है कि वे कुछ भी करते है पूरी तन्मन्यता, मेहनत और ईमानदारी से करते हैं। इस बात का प्रमाण उनकी रिलीज फिल्में हैं। फिल्म ‘ लखनऊ सैंट्रल’  में एक ऐसे कैदी की भूमिका निभा रहे हैं जो अपने आर्ट विशेष से अपने कुछ साथी कैदियों की भी जिन्दगी बदल देते हैं। फिल्म को लेकर उनसे एक बातचीत।

मायापुरी फिल्म पत्रिका के बारे में कितना कुछ जानते हैं ?

मैं इतना जानता हूं कि ये करीब पेंतालिस साल पुरानी पारिवारिक फिल्म पत्रिका है । सुना है कि एक वक्त ये स्टार्स और पाठकों के बीच समान रूप से लोकप्रिय फिल्म पत्रिका हुआ करती थी। इसी पत्रिका से पाठक अपने मन पंसद स्टार का एड्रेस ले, उनसे पत्र व्यवहार किया करते थे। मैने देखा है कि डिजिटल के दौर में आज भी मायापुरी अपनी नई साज सज्जा के साथ ऑल इंडिया उपलब्ध है।

इस बार का एडिशन फिल्म लखनऊ सेंट्रल पर आधारित है । इस आइडिये से आप कितने सहमत हैं ?

बेशक ये एक यूनिक आइडिया है। क्योंकि इस बार का एडिशन एक फिल्म और उसमें काम कर रहे कलाकारां पर आधारित है लिहाजा अपने नये क्लेवर और आइडिये के तौर पर डैफिनेटली पाठकों को ये इशू पंसद आने वाला है। साथ ही ऐसे में फिल्म का प्रमोशन भी बढ़िया ढंग से होने जा रहा है।

फिल्म की कथा वस्तु के बारे में क्या कहना है ?

फिल्म ऐसे पांच कैदियों पर आधारित है जो पेशेवर अपराधी न हो अंजाने में कैदी बनने पर मजबूर हैं। लेकिन जब उन्हें अपनी कला दिखाने का अवसर मिलता है तो वे बताते देते हैं कि वे औरों से कितने अलग हैं। वे जेल में ही अपना एक बैंड बनाते हैं। जो देखते देखते इतना लोगप्रिय हो जाता है कि बाद में इस बैंड को जेल के बाहर भी  अपना अगर्दषन करने की इजाजत मिलने लगती है। लेकिन क्या इस बैंड से जुड़े कैदी जेल से आजाद हो पाते हैं। ये आपको फिल्म के बाद पता चलेगा।

क्या वजह है कि आपकी फिल्मों के टाइटल थोडे़ डिफ्रेंट होते है ?

 टाइटल फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष होता है क्योंकि यही फिल्म को रिप्रेजेन्ट भी करता है, शीर्षक से ही पता चलता है कि फिल्म कहना क्या चाहती है। में हमेशा ध्यान रखता हूं कि मेरी फिल्म का टाइटल  पढ़ने में दिलचस्प लगे और उसमें अलग सा रोमांच हो। इसीलिये मैं अपनी फिल्मों के टाइटल  डिसाइट करते वक्त दख्लअंदाज होने की कोशिश करता रहता हूं। हां बाहरी फिल्मों में मैं सिर्फ एक्टिंग करता हूं, वहां सब कुछ डायरेक्टर या प्रोड्यूसर डिसाइट करता है।

क्या इस फिल्म की कहानी पर काफी रिसर्च की गई थी ?

मेरे हिसाब से फिल्म के राइटर डायरेक्टर रंजीत अरोड़ा और राइटर असीम तिवारी ने एक अरसा रिसर्च की, वह कितनी ही जेलों में गये, वहां जाकर उन्होंने वहां का माहोल, वातावरण जांचा परखा। इसके अलावा उन्होंने वहां बंद ढेर सारे कैदियों से बातचीत की। अगर फिल्म की फिल्म में मैं मेरे अलावा पांच कैदी हैं जो मेरी तरह जानबूझकर अपराधी नहीं बने। यह उनकी रिसर्च ही थी कि उनकी बदौलत हमारी भूमिकायें काफी वास्तविक बन गई।

क्या कभी किसी फिल्म के दौरान जरूरत से ज्यादा डिस्कशन रही है ?

हां,हां बिलकुल। मुझे याद है कि फिल्म ‘ जिन्दगी ना मिलेगी दौबारा’ के दौरान ऐसा हुआ था। दरअसल उस फिल्म की शुरूआत से ही टाइटल को लेकर कशमश चल रही थी इसीलिये शूटिंग के वक्त उसके एक के बाद एक ढेर सारे वर्किंग टाइटल रखे गये थे। जब फिल्म का म्युजिक बन रहा था, उस समय मेरे दिमाग में  जो टाइटल आया था, इस बार वो हर किसी को पंसद आया। दरअसल वो टाइटल मुझे मेरी फिल्म ‘ रॉक ऑन’के एक गाने से याद आया था।

अलग तरीके की फिल्में आप लाइन ब्रेक करने के लिये करते हैं ?

ऐसा कुछ नहीं हैं और न ही मैने कभी यह सब सोच समझ कर किया है या करता हूं। मैने कभी कोई ट्रेंड ब्रेक करने की कोशिश नहीं की। मेरा शुरू से एक ही स्टाइल रहा कि मुझे जब भी कोई चीज अच्छी लगती है मैं वही करने की कोशिश करता हूं। दरअसल जैसे आप मुझे देखते हैं, मैं अपने आपको वैसे कतई नहीं देखता क्योंकि मैं एक तरह की कहानियों से बहुत बौर होता हूं। जैसे रोमांटिक फिल्मां को देख मैं दूर भागता हूं क्योंकि वे इतनी ज्यादा तादद में बन चुकी हैं कि मेरी तरह उन्हें कोई देखना पंसद नहीं करता।

वेब सीरीज या डिजिटल को लेकर आपका क्या कहना है ?

डिजिटल आज,एक अलग प्लेटफार्म बन चुका है क्योंकि यहां आप अलग अलग तरह की कहानीयां कह सकते हैं। यहां एक अलग कॉन्ट्रेक्ट बन सकता है और विस्तारित कॉन्ट्रेक्ट बन सकता है। आप वहां दस बारह घंटे की फिल्म बनाकर उसे टुकड़ों में दिखा सकते हैं। अभी तो इसकी शुरूआत हो रही है लेकिन अगले दस सालों के दौरान यह अपनी पुख्ता जगह बना सकता हैं, जहां फिल्मों को परेशानी होने के पूरे चांसिसं हैं। उसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि इस विधा के जरिये आप उन फिल्मों को, घर पर, मोबाईल पर, आई पैड या कंप्यूटर पर भी देख सकते हैं लेकिन फिल्म देखने के लिये आपको थियेटर तक जाना पड़ता है। इसके अलावा थियेटर में एक फिल्म देखते हुये पांच सो रूपये तक खर्च हो जाते हैं लेकिन उतने ही पैसे में आप महिने भर तक डिजिटल फिल्में देख सकते हैं।

आज हमारी फिल्मों का माहौल पूरी तरह अंग्रेजीमय होकर गया है। इस बारे में आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी?

 मैं कह सकता हूं कि आपके सवाल का जवाब इसी फिल्म में कहीं छिपा हुआ है। क्योंकि हिन्दी भाषा कहानी का एक मजबूत पक्ष है। दरअसल फिल्म में मेरी भूमिको बहुत रूटिड है, जो मुरादाबाद से संबधित है यानि मैं मुरादाबाद का रहने वाला हूं। मेरी भाषा और कल्चर पूरी तरह से भारतीय है। हाल ही में एक दो फिल्में आई हैं जिनमें हिन्दी को लेकर बात की गई है। मैं समझता हूं ये एक अच्छी शुरूआत है कि  इन फिल्मां में अपने कल्चर अपनी भाषा की बात हो रही है। दूसरी तरफ मुझे ऐसा भी लगता है कि अब लोग बाग फेंटेसी की दुनिया से निकल कर कुछ दूसरी चीजें देखना चाहते हैं। वैसे मेरा मानना है कि फिल्में भी एक चक्र की तरह होती हैं जो हमेशा घूमती रहती हैं लिहाजा जो फिल्में कल थी वह आज नहीं है न ही वे दर्शकों टेस्ट है यह एक ऐसा सिलसिला है जो ऐसे ही चलता रहता है।


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Mayapuri

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