डर तो अपना दोस्त है…. आरती मिश्रा

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Aarti Mishra

डर.. जिसने महाभारत जैसे पुराण की रचना की. हां… अर्जुन जब युद्ध के लिए युद्धभूमि पर खड़े थे तब अपने परिवार और सखा बंधू को अपने सामने देख डर गए थे. उन्हें इस डर ने जकड लिया था की यह उनके खिलाफ कैसे युद्ध लड़ सकते हैं? उनको कैसे मार सकते हैं? उस युद्धभूमि पर खड़े रहकर जब वो इस दुविधा से जूझ रहे थे, इस डर से जूझ रहे थे तब उन्होंने श्री कृष्णा से सवाल किये और उन्होंने अर्जुन को उस डर से सामना करने के लिए कहा.

अर्जुन बहुत बड़े धनुर्धारी थे और बहुत ही मंझे हुए योद्धा फिर भी एक छोटी सी चीज़ ‘डर’ ने उन्हें हिला दिया. तो हम तो फिर भी आम लोग हैं जो रोज़ अपने छोटे छोटे डरों का शिकार बन जाते है. डर है क्या?
हम सब डर से डरते हैं. क्यों? क्यों डरते हैं हम डर से? क्यूंकि हमारे बचपन से ही हमें सिखाया जाता है की डरना नहीं. डर को बुरा दिखाया गया है. इसलिए हम डरने से डरते हैं. मगर राज़ की बात तो यह है की डर का दूसरा चेहरा भी है.

डर अच्छा है. डर सिर्फ सड़क पे खड़े लाल रंग के सिग्नल की तरह है जो हमें सावधान करता है कि , “रुक जाओ, आगे खतरा है”. बस इस से ज़्यादा डर और कुछ नहीं है. हम एक खाई के किनारे पर खड़े हैं और नीचे देख कर हमें डर लग रहा है तो हमें समझना चाहिए कि वो हमें सावधान कर रहा है की नीचे नहीं गिरना है.

डर को अगर काबू में नहीं किया तो ये हमसे बहुत कुछ करवा सकती है. अक्सर आशिक़ अपने प्यार को खोने के डर से क्या कुछ कर लेते हैं. यह क्या है जो इनसे डर करवा देता है. एक दुसरे को खो देने का डर इतना हो जाता है की अपने रिश्ते को खुल कर  जी भी नहीं पाते वो.  एक दुसरे को खोने का डर है तो ये सोचना चाहिए कि डर अच्छा है. कल को साथ रहे ना रहे इसलिए आज का वक़्त एक साथ बिठा लें, एक दुसरे को समझ लें. रिश्तों में डर होना अक्सर इंसानो से ग़लत काम करवा देता है. मगर डर की दूसरी शकल को पहचान न हमारे हाथ में है.

जब हमें डर लगता है तो हम चार में से एक रास्ता अपनाते हैं.
1. हम चिंता करते हैं और दिमाग उथल पुथल हो जाता है
2. हम सुन्न पद जाते हैं और दिमाग जैसे वहीँ जम जाता है.
3. हम उस डर से दूर भागते हैं.
4. हम डर को दफनाने की कोशिश करते हैं.

मगर हम जानते हैं कि इन चारों तरीकों से हमारा दर ख़तम नहीं होता.
डर को ख़तम करने का एक ही रास्ता होता है.. उसका सामना करना. डर कुछ नहीं है बस एक भाव है. बौद्ध धरम के सन्यासी जिन्हे ‘मोंक’ कहा जाता है वो डर का अच्छे से सामना करते हैं. उनका सबसे बड़ा तरीका है डर की असली वजह जानना. एक बार एक आदमी ‘मोंक’ के पास गया. वहाँ उससे कहा गया कि आँख बंद करके अपने दिमाग में सबसे बड़ा डर सोचो और उसे महसूस करो. उसने आँखें बंद कि और अपना सबसे बड़ा डर सोचा. उसका सबसे बड़ा डर था बचपन में इम्तिहान का डर. जब वो गहराई में गया तो उसने यह पाया कि उसके डर kकि वजह इम्तिहान नहीं थी बल्कि असली वजह यह थी की इम्तिहान में उसके कम
अंक आये तो उसके माँ बाप क्या सोचेंगे और आस पास के लोग क्या सोचेंगे. यह कुछ नया नहीं है. हमारे ज़्यादातर डरने की असली वजह यही होती है.

डर का एक और कारण भी  वो है अनासक़्ति. हम अपनी आस पास की चीज़ों से और लोगों से इतना लगाव रखते हैं  कि अक्सर उन्हें खोने का डर हमें लगा रहता है. अपना परिवार खोने का डर, अपना घर खोने का डर, पैसे ना होने का डर वगैरह वगैरह. मगर इसका एक इलाज है अनासक़्ति का बिलकुल विरुद्ध अनासक़्ति . जिस दिन हम इस बात को अपने दिमाग में उतार लेंगे कि यह शरीर , ये आस पास के लोग, यह मूल्यवान चीज़ें सभ उधार की हैं उसी दिन हम डर से मुक्ति पा लेंगे. जिस दिन हम यह समझ जाएंगे उस दिन हम अपने परिवार और दोस्तों की अहमियत जान जाएंगे. हम छोटे छोटे पलों में भी खुश रहने लगेंगे.

तो डर ज़रूरी है. ज़िन्दगी में डर होना ही चाहिए मगर उसको सिर्फ एक ‘सिग्नल’ की तरह देखना चाहिए. वो कोई दुश्मन नहीं है हमारा. हमारा दोस्त है जो हमें रास्ता दिखा रहा है.

डर अच्छा है

Arti Mishra

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