फिल्म समीक्षाः‘शहजादा अलीः कमजोर फिल्म…’

1 min


Film Review: 'Shahzada Ali: Weak Film ...'

स्टारः दो स्टार

निर्माता, लेखक व निर्देशकः अकबर और आजम कादरी

कैमरामैनः नासिर जमाल

कलाकारः निधि बिस्ट,जीषान कादरी,इजहार खान,षाहबाज,

अवधिः एक घंटा सोलह मिनट

ओटीटी प्लेटफार्मः एमएक्स प्लेअर

तीन सौ कहानियां लिखने के बाद जुड़वा भाई अकबर और आजम कादरी एक बाल फिल्म ‘‘शहजादा अली’’ लेकर आए हैं, यह एक अलग बात है कि वह इसे बाल फिल्म नही मानते। मगर फिल्म की कहानी के केंद्र में उस बालक अली का दर्द है, जिसके दिल में सुराख है और वह घर से बाहर निकल कर दूसरे बच्चों के साथ उन्ही की तरह क्रिकेट से लेकर हर तरह के खेल खेलना चाहता है।

Film Review: 'Shahzada Ali: Weak Film ...'

कहानीः

कहानी दिल्ली के मुस्लिम परिवार से शुरू होती है। जहीर (जीषान कादरी) एक प्रिंटिंग प्रेस में नौकरी करते हैं। पर वह अपनी खुद की प्रिंटिंग प्रेस खोलने की जुगाड़ में भी लगे हुए हैं। उनका आठ वर्ष का बेटा अली है,जिसके दिल में सुराख है। पर वह उसके दिल का आपरेशन कराने में सक्षम नही है। उनकी पत्नी शाहिदा (निधि बिस्ट) घर के काम व बेटे अली (इजहार खान) को संभालने के साथ साथ कढ़ाई का काम भी करती हैं। यह परिवार अपने बाप दादा के पुष्तैनी मकान में रह रहा है, जिस पर एक बिल्डर की नजर है। जहीर का चचेरा भाई भी चाहता है कि इसे बेच दिया जाए, मगर जहीर बेचने के लिए तैयार नहीं है। अली जिंदगी को खुलकर जीना और महसूस करना चाहता हैं। उसे क्रिकेट से मोहब्बत है और वह अपने अब्बा से एक क्रिकेट बैट खरीदने की जिद करता है। लेकिन किसी भी तरह की षारीरिक गतिविधि/मेहनत उसके स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचा सकती है। इसलिए उसकी माँ/अम्मी एक कहानी गढ़कर उसे सुनाती हैं कि वह बच्चे, जो बहुत ज्यादा घर के बाहर खेलते हैं, और अपने अम्मी अब्बू की बात नहीं मानते है, उन पर उनके दिल में रहने वाला एक राक्षस हमला करता है और वह पूरी जिंदगी तकलीफ में रहते हैं। इसके उलट वह बच्चे जो अपने अम्मी अब्बू की बात मानते हैं, उन्हें अल्लाह दुआएँ देता है।

अली अपनी माँ की कहानी को सच मान लेता है। उधर उसका एक दोस्त करीम (शहबाज) है, जो अक्सर उसके साथ सांप सीढ़ी व अन्य खेल खेलने के उसके मकान की छत पर आता रहता है। एक दिन करीम के पिता साईकल लेकर आते हैं। करीम उसे यह बात बताता है। मां से पूछ कर अली, करीम की साईकल देखने जाता है। एक युवक उसकी साईकल को खुद चलाने लगता है, जिसके पीछे करीम और करीम के पीछे अली भागता है। अचानक अली रास्ते में गिर जाता है और अस्पताल पहुँच जाता है। जहाँ उसके दिल का ऑपरेशन करना अनिवार्य हो जाता है। जहीर अपना मकान बेच कर प्रिंटिंग प्रेस के मालिक की छतरपुर वाली कोठी में नौकरो के कमरे में रहने चला जाता है। पांच माह बाद अली एकदम स्वस्थ हो जाता है। फिर कुछ बच्चों के साथ वह होली भी खेलता है।

समीक्षाः

कम बजट में बनायी गई फिल्म उस बच्चे के दर्द को बयां करती है, जो कि खेलने के लिए घर से बाहर नहीं जा पा रहा है। लेखक व निर्देशक द्वय ने बच्चों के मनोभाव को समझते हुए उसमें झांकने का सतही प्रयास किया है। यह अधपकी फिल्म है। लेखक व निर्देशक ने इस बात को जानने का प्रयास नहीं किया कि जब बच्चे के दिल में सुराख होता है, तो उसे किन समस्याओं से जूझना पड़ता है। उसके नाखून कब नीले पड़ जाते हैं। लेखक व निर्देशक का पूरा ध्यान अली के पिता जहीर की परेशानियों पर ही ज्यादा रहा। फिल्म की गति काफी धीमी होने के साथ साथ कहानी व सीन का दोहराव भी है। इसे एडीटिंग टेबल पर कसे जाने की जरुरत थी। इतना ही नही पटकथा के स्तर पर भी मेहनत करने की जरुरत थी।

अभिनयः

अली के किरदार में बाल कलाकार इजहार खान ने एकदम स्वाभाविक अभिनय किया है। मां के किरदार को निधि बिस्ट ने गहराई से निभाया है। जहीर के किरदार में जीशान कादरी ने शानदार अभिनय किया है।


Like it? Share with your friends!

Mayapuri

अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिये