फिल्मों के नये चटखारे

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052-24 Jeetendra

मायापुरी अंक 52,1975

डिस्ट्रीब्यूटर ने फिल्म की सात रीलें देखने के बाद कहा यार फिल्म तो धांसू है पर उसमें कोई धांसू आर्टिस्ट नहीं है। गुलाबी और मसालेदार चाय का जायका कुछ और ही होता है।

निर्माता ने आश्वासन देते हुए कहा फिक्र न करें, मेरे पास एक चाबी है जिसे घूमाते ही धर्मेन्द्र, जितेन्द्र, संजीव कुमार या शशि कपूर कोई न कोई गैस्ट रोल करने के लिए तैयार हो जायेंगे

डिस्ट्रीब्यूटर ने कहा फिर तो कहना ही क्या। घर बैठे गंगा आयेगी और तुम्हारी फिल्म वजनदार बन जायेगी। यानि बड़े आर्टिस्टों को गैस्ट रोल्स में लेने से नये आर्टिस्टों को लेकर बनायी गयी मिनी बजट की फिल्म भी वजनदार बन जाती है।

पिछले दिनों एक पंजाबी फिल्म निर्माता धर्मेन्द्र के पास जाकर गिड़ गिड़ाया कि वे किसी भी तरह उसकी पंजाबी फिल्म में केवल दो घंटे भर के लिए गैस्ट रोल कर दे वह तर जायेगा। धर्मेन्द्र के मुंह से ना न निकल सकी और कुछ ही दिनों बाद उन्होंने उस पंजाबी फिल्म में रोल करने के लिए दो घंटे निकाल ही लिये। उन दो घंटो में उन्होंने क्या किया केवल मारधाड़ और हाथापाई लेकिन उससे क्या, निर्माता को अपने पोस्टरों में धर्मेन्द्र का नाम देने की छूट मिल गयी और उस नाम को उन्होंने अपनी फिल्म के लिए सिक्का बना लिया। ठीक है, चढ़ते सूरज को सभी प्रणाम करते हैं। यही वजह है कि आज हर छोटा निर्माता अपनी हर छोटी फिल्म में बड़े आर्टिस्टों को गैस्ट रोल्स में लाने की कोशिश ही नहीं करता बल्कि उनके रिश्तेदारों दोस्तों और चमचों से मिलकर कुछ ‘साजिश़’ भी करता है। यही वजह है कि छोटों के साथ बड़ो को मिलाने वाली तथाकथित रिश्तेदारों, चारों ओर चमचों की एक नयी जमात भी पैदा ही गयी है।

गैस्ट रोल्स की खूबियां एक नहीं, अनेक हैं। पहले तो यह कि वे प्रोड्यूसरों को मंहगे नहीं पड़ते और न शूटिंग डेट्स के घपले को लेकर सिरदर्द बनते हैं। गैस्ट रोल्स के लिए कुछ आर्टिस्ट एक दिन के हिसाब से मिल जाते हैं और कभी-कभी घंटो के हिसाब से भी। इतना ही नहीं, यदि यारी गहरी है तो फोकट में भी काम पट जाता है और बिना नमक फिटकरी लगे फिल्म जायकेदार और वजनदार बन जाती है।

पर याद रखें ताली एक हाथ से नहीं बजती। कभी-कभी बड़े आर्टिस्ट गैस्ट रोल्स करके इंकमटैक्स वालों को अंगूठा बता देते हैं कहते हैं फोकट में काम किया जबकि सारा माल चुपचाप अपनी जेब में रख लेते हैं। इस तरह ‘गैस्ट रोल्स’ फ्रेंडली अपिरियंश स्पेशल अपिरिशं इन विभिन्न नामों के पीछे बाजारू प्रवृति भी छुपी होती है।

गैस्ट रोल्स हमेशा फिल्म की सजावट के लिये ही नहीं होते और न वे मुलम्मा ही होते हैं। कई फिल्मों में वे मूल धातु की तरह होते हैं। फिर कब मिलोगी में दिलीप कुमार का गैस्ट रोल दर्शकों को लुभाने के लिये नहीं था बल्कि वह कहानी के जिस्म के साथ जुड़ा हुआ था वह अपने आप में महत्व रखने वाला था एक कैरेक्टर था। इसी तरह ‘पूरब पश्चिम’ में ओमप्रकाश ने जो गैस्ट रोल किया वह केवल पर्दे पर सूरत दिखाकर हा हा ही ही करने वाला नहीं था बल्कि वह जिंदगी को छूने वाला कैरेक्टर था। राजेश खन्ना ने ‘अनुराग’ में माली और ‘आक्रमण’ ‘फौजी गया जब गांव’ में लाने वाले पंगु फौजी के जो गैस्ट रोल किये वे सरे राह चलते रोल्स नहीं थे। उन दोनों में अपनी अपनी चारित्रिक विशेषताएं थीं। ‘अनुराग’ में की गयी खास तरह की भूमिका के लिये तो उन्हें फिल्म फेयर अवार्ड भी मिला था। धर्मेन्द्र ने अब तक सबसे अधिक गैस्ट रोल किये हैं जिनमें कुछ चलाऊ हैं, कुछ आलतू फालतू तो कुछ महत्वपूर्ण भी। ‘गोल्ड मेडल’ में उन्होंने मजदूर नेता का फिल्म की कहानी के साथ गहरा ताल्लुक रखने वाले गैस्ट रोल किया है पर मोहन चोटी ने उन्हें अपनी फिल्म ‘धोती लोटा’ और चौपाटी में पागल का गैस्ट रोल देकर अपनी फिल्म की कीमत तो बढ़ा ली पर रोल के नाम पर राम-राम महमूद की ‘कुंवार बाप’ में भी वे अन्य बड़े कलाकारों के साथ केवल नाम के लिए आये हैं।

एक फिल्म में गैस्ट रोल कितने हो सकते हैं इसकी भला कोई सीमा है? ताजी फिल्म ‘रानी और लालपरी’ में सात बड़े आर्टिस्टों राजेन्द्र कुमार, आशा पारेख, फिरोज खान, जितेन्द्र, नीतू सिंह, दारा सिंह और रीना रॉय, ने गैस्ट रोल्स करके बड़े-बड़े कैरेक्टर आर्टिस्टों के लिए भी नया खतरा पैदा कर दिया है। गैस्ट रोल्स के नाम पर बड़े-बड़े आर्टिस्ट कैरेक्टर रोल्स करने लगेंगे तब कैरेक्टर आर्टिस्ट क्या बैठे-बैठे मक्खियां मारेंगे? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है कि दो-दो, तीन-तीन हीरो और तीन-तीन हीरोइनें, दो-दो हीरो और दो-दो हीरोइनें, चार-चार हीरो और तीन तीन हीरोइनों को लेकर बनायी जाने वाली बड़ी फिल्मों के इस नये दौर में सारे अहम कैरेक्टर बड़े आर्टिस्टों के पास ही जाने लगे हैं। बड़े आर्टिस्टों का कैरेक्टर आर्टिस्टों पर किया गया यह हमला कोई हल्की-फुल्की बात नहीं है कि जिसे नजर-अंदाज कर दिया जाये,

गैस्ट रोल्स के शारीरिक रूप का सबसे बड़ा लाभ उठाया है हास्य अभिनेता महमूद और मोहन चोटी ने। महमूद ने ‘साधू और शैतान’ में अन्य कलाकारों के साथ दिलीप कुमार और मुमताज जैसे चोटी के कलाकारों को गैस्ट में लेकर कमाल का बिजनैस किया। फिल्मी दुनिया में कई सालों में उसने यारी के नाम पर जो कुछ हासिल किया उसका ब्याज वसूल किया पहले तो ‘साधू और शैतान’ में और बाद में ‘कुंवार बाप’ में। इस दूसरी फिल्म में तो वह धर्मेन्द्र और हेमा को भी घसीट लाया। भला मोहन चोटी पीछे क्यों रहते? धोती लोटा और चोपाटी में धर्मेन्द्र महमूद, प्रेमनाथ, ओम प्रकाश, बिंदू आदि को गैस्ट बनाकर दर्शकों पर अपना रो गांठ दिया। हालंकि निर्देशन और कहानी की कमजोरी की वजह से यह फिल्म सोने का पिटारा न बन सकी पर गैस्ट रोल्स का मुनाफा उन्हें हाथों हाथ मिल गया। यदि महमूद की तरह मोहन चोटी गैस्ट रोल्स का सही उपयोग करते तो फिर कहना ही क्या था।

दिलीप कुमार से लेकर उन तक पहुंचने का सपना देखने वाले राकेश पाण्डे तक ने मेहमान भूमिकाएं की हैं, फिल्मों के इस नये चटखारे का बड़ा गहरा और चटखता रंग रहा है। पर हाल ही में गैस्ट रोल्स में के नाम हर फिल्मों को केवल शारीरिक रूप से वजनदार बनाने की जो चेष्टा हो रही है उससे तो इस चटखारे की चटक ही ठंडी पड़ रही है। पहले केवल फुललैंथ रोल न होने पर किंतु उतने ही महत्वपूर्ण वाले रोल को गैस्ट रोल की शक्ल दी जाती थी पर अब दर्शकों को केवल नाम से बहलाने भर के लिए और उन्हें मूर्ख बनाने के लिए गैस्ट रोल्स रखे जा रहे हैं। मान मान मैं तेरा मेहमान यही स्थिति ही इनकी। कुछ दिन तक तो नाम का चमत्कार चल गया और जय जय कार होती रही पर अब दर्शक देखते ही नहीं, तौलते भी हैं।

अब तो गैस्ट रोल्स का वही चटखारा कामयाब होगा जिसमें केवल मेहमानवाजी नहीं बल्कि, उनकी गुणनवाजी होगी यानि गैस्ट रोल्स खास किस्म के कैरेक्टर्स हुए तो चलेंगे वर्ना… सब ठन ठन गोपाल


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Mayapuri

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