जेल जीवन का सच बयान करती फिल्में

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नई रिलीज फिल्म ‘लखनऊ सेंट्रल’ जेल-जीवन पर आधारित फिल्मों की कड़ी में नई फिल्म है। इस फिल्म में जेल के जीवन को एक नये नजरिये से दिखाया गया है। एक कैदी किशन मोहन गिरहोत्रा, जिसे सजा ए मौत मिली है। उसे कैसे एक म्यूजिक बैंड के रास्ते जीवन की किरणें दिखती हैं… इस नजरिये से जेल की परिस्थितियों का आंकलन है। निर्माता-निखिल अडवाणी और निर्देशक-रंजीत तिवारी की यह फिल्म परंपरागत जेल की विभिषिका से अलग थलग दर्शकों को मनोरंजन के साथ तत्कालिक जेल-जीवन का परिचय कराती है।

‘जेल’ शब्द हमेशा दर्शकों के सामने कठोरतम चित्रांकन पेश करता है। सिनेमा ने इस चार दीवारी के अन्दर के अंधेरे सच को कई बार दर्शकों के सामने पहुंचाया है। सबसे पहले जेल जीवन को चित्रांकित करती फिल्म आई थी 1947 में ‘जेल यात्रा’। गजानन जागिरदार निर्देशित इस फिल्म में राजकपूर और कामिनी कौशल की मुख्य भूमिका थी। बाद में राजकपूर ने इस फिल्म के अपने अनुभव को कई फिल्मों में बदली हुई स्थितियों के साथ दिखाया था। वैसे ‘जेल यात्रा’ नाम की 1981 में भी एक फिल्म बनी थी जो व्यावसायिक रूप से सफल नहीं हुई। मधुर भंडारकर ने ‘जेल’ नाम से ही फिल्म बनाकर जेल को बेपर्दा किया था। नितिन मुकेश और मुग्धा गोडसे की अभिनय वाली यह फिल्म एक यथार्थपूरक फिल्म मानी गई है। प्रियदर्शन के निर्देशन में बनी हिन्दी फिल्म ‘कालापानी’। देव आनंद, मधुबाला, नलिनी जयवंत की भूमिका वाली इस फिल्म में देव आनंद एक ऐसी लड़ाई लड़ते हैं जिसमें एक निरअपराध पिता को जेल के सीखचों से निकालने के लिए एक बेटा लड़ाई लड़ता है कानून से। फिल्म को फिल्मफेयर सम्मान मिला था। (1996) तेलुगू में बनी कालापानी के मुकाबले कमजोर फिल्म थी, बावजूद इसके इस फिल्म ने आजादी के दौरान फ्रीडम-फाइटर्स का जीवन दिखाया था कि वे कितनी सख्त यातनाएं पाते थे। बेशक जेल को केन्द्र में रखकर हिन्दी सिनेमाकारों ने कुछ क्लासिक-फिल्में भी दी है। ‘बंदिनी’ (1963 में) बिमल राय की अनमोल धरोहर है। इस फिल्म में नूतन और धर्मेन्द्र की भूमिका थी। जेल का एक डॉक्टर एक मुजरिमा के प्यार में पड़ जाता है और कहानी फ्लैशबैक के टुकड़ों में कैसे आगे बढ़ती है। इसी तरह की एक अलग फिल्म थी व्ही शांताराम की ‘दो आंखें बारह हाथ’ जो 1957 में आयी थी। इस फिल्म के गीत ‘ऐ मालिक तेरे बंदे हम’ और ‘सइयां झूठों का सरताज निकला’ बेहद लोकप्रिय हुए थे। तात्पर्य यह कि ‘जेल’ हमेशा फिल्मवालों के लिए एक रोचक विषय रहा है और दर्शकों के लिए रहस्यमय सच।

इस बार निखिल अडवाणी की टीम फरहान अख्तर, डायना पेंटी, गिप्पी गरेवाल, दीपक डोबरियाल जैसे सधे कलाकारों के साथ जेल की पृष्ठभूमि में म्यूजिक-बैंड को लेकर उस माहौल को नये नजरिए से दिखाने की कोशिश की गई है। देखने वाली बात यह है कि क्राइम से लवरेज आज के समाज को जेल दर्शन ‘लखनऊ सेंट्रल’ कितना करा पाती है।

संपादक


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