मैं डायरेक्टर क्यों बना? – फिरोज खान

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मायापुरी अंक 52,1975

फिरोज खान एक एक्टर के रूप में फिल्मों में आये थे तब शायद उन्होंने सोचा भी नहीं था कि एक दिन वह हिंदी फिल्मों के इतने बड़े द्वार बन जायेंगे जिसमें होकर छोटे भाई संजय और अकबर (आज के नौजवान), समीर वगैरह भी फिल्म ‘एक्टर’ बन जायेंगे! यह फिरोज़ खान के लिए गर्व की बात है उन्हेंने फिल्मों के लिए फिल्मों में अपने साथ अपने भाईयों के लिए फिल्मों के उस दरवाजों को खोला जिसे खोलने के लिए कितने ही सुर्ख और गुलाबी जिल्द वाले चेहरों को पीले रंग में बदलते देखा है किंतु फिरोज़ खान एक ऐसे ‘एक्टर’ निकले जो पठानी खून वाले चेहरे के साथ हिंदी फिल्मों में आये और आज भी फिरोज़ के चेहरे पर वह खून चमकता हुआ लगता है। जिसमें आप उनकी सारी ‘पर्सनेलिटी’ का अंदाजा लगा सकते हैं।

हाल ही में इस विशाल व्यक्तित्व वाले अभिनेता से उसके लोटिया पैलेस स्थित एफ.के. इंटरनेशनल के दफ्तर में मिला तो वह बेहद जल्दी में थे। और बाहर जाने के लिए सीढ़िया उतरने लगे थे। मेरे कार्ड का लौटता जवाब फिरोज़ खान ने तीन चार दिन बाद फिल्मिस्तान स्टूडियो में मिलना कहकर दिया था।

और फिर पूरे तीन दिन बाद मैं फिरोज़ खान से फिल्मिस्तान स्टूडियो में मिला जहां वह शंकर शंभू की शूटिंग कर रहे थे।

आपको तो इंटरनेशनल स्टार होना चाहिए था फिरोज खान से मिलते ही मैंने कहा और फिर उन्होंने जवाब दिया।

अभी तो बाज़ी लगी हुई है। मेरी फिल्मों में तो आप इंटरनेशनल चीज़े देखते ही हैं।

मैं समझता हूं उनकी इन इंटरनेशनल चीज़ो में वह कहानी भी शामिल है जो वह अंग्रेजी फिल्मों से चुराते हैं। यूं आप उनसे पूछें कि क्या ‘धर्मात्मा’ उसने ‘गॉडफादर’ से चुरा कर बनाई तो वह साफ इंकार कर देंगे। यही नहीं। वह इतने इंटेलीजेंट आदमी हैं कि अपनी इस बात से वह आपको प्रभावित (कन्विस) भी कर देंगे।

सुना है आपने ‘धर्मात्मा’ में हेमा मालिनी का रोल काट कर बड़ा अधर्म किया है? मैंने पूछा।

फिरोज़ मुझे ‘कन्विंस’ करते हुए बोले मैं अपनी फिल्म में किसी को इसलिए ज्यादा इंपार्टेस नही दे सकता कि वह फिल्म की हीरोइन है या बड़ी स्टार है जो स्क्रिप्ट के हिसाब से ‘करैक्ट’ है, दैट इज राइट मैं फिल्म बनाते समय हीरोइन को नहीं उसकी ‘ऑर्डियेंस’ को देखता हूं जो मेरी फिल्म देखने के लिए टिकट खरीदती है। आई कांट चीट दैम मैं सिर्फ फिल्म की उन्हीं बातों, उन्हीं गुणों को ज्यादा इंपॉर्टेंस देता हूं जो फिल्म को एंटरटेनमेंट के हिसाब से खूबसूरत बनाते हैं।

फिरोज़ खान का बातें करने का अंदाज़ बिल्कुल किसी अमेरिकन एक्टर जैसा है मुझे लगा कि वह बेचारा मजबूरी में हिंदी बोल रहा है। उसका बस चले तो वह डायलॉग भी अंग्रेजी में ही बोले। यूं उनकी फिल्म में आपको वह हर चीज़ मिल जायेगी जो अमेरिकन फिल्मों में होती है।

आप धर्मात्मा के लिए अफगानिस्तान क्यों गए? मैंने पूछा।

कहानी की बैकग्राउंड फिल्माने के लिए मुझे अफगानिस्तान पसंद आ गया। फिर वहां की लोकेशन के अलावा कुछ ऐसी चीज़ें भी थी जो शायद हिंदी फिल्म के ‘ऑडियेंस’ में से किसी ने भी न देखो होंगी। इन्हीं चीजों में से एक बुजकशी भी है जिसे मैंने धर्मात्मा में फिल्माया है। फिल्म को मैं एक ऐसा ग्लोब भी मानता हूं जिसमें फिल्म के साथ आदमी दुनिया को भी देखता है। हमारे देश में ऐसे लोग बहुत कम हैं जो फिल्मो के बाहर दुनिया देख सके। इसलिए ऐसे लोग फिल्मों में दुनिया देख कर तरह की खुशी प्राप्त कर लेते हैं। वे समझते हैं, बल्कि इस तरह की अनुभूति करते हैं जैसे उन्होंने दुनिया देख ली। मैं अपनी फिल्मों से एंटरटेनमेट के साथ ‘जनरल नॉलेज’ भी देना चाहता हूं।

आप निर्देशक क्यों बने, इसकी कोई खास वजह रही या फिर यह आपकी एंबिशन (अभिलाषा) रही?

हां, मेरी एंबिशिंस थी कि मैं खुद एक फिल्म बनाऊं। उसमें खुद काम करूं। कुछ फास्ट मूविंग फिल्में बनाकर मैं हिंदी फिल्मों के लिए एक अलग स्टाइल बनाना चाहता हूं। अब मुसीबत यह है यहां लोग किसी फिल्म का क्रिटीसाइज (आलोचना) इस हद तक करते हैं कि बड़ा कंन्फ्यूजन हो जाता है। कोई ‘धर्मात्मा’ को ‘गॉड फादर’ बताता है तो कोई मटका किंग की कहानी बताता है। तो क्या वास्तव में ऐसा कुछ नही है?

हां, फिरोज़ ने बड़ी दृढ़ता से कहा, यह मेरी अपनी स्क्रिप्ट है। मैं अपनी फिल्म में किसी0 की जातीय जिंदगी को नहीं शामिल होने दूंगा शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि दुनिया के ‘क्राइम वर्ल्ड’ (अपराध संसार) में ऐसे ढेरों क्रिमिनल्स ऐसे हैं जिनके चेहरे एक दूसरे से काफी हद तक मिलते हैं। अब क्या आप इसे चेहरे की चोरी कहेंगे? मेरी कहानी का कोई कैरेक्टर अंगर किसी की जातीय जिंदगी को छू ले तो उसके लिए मैं क्या कर सकता हूं फिल्मों में ढेरों कैरेक्टर ऐसे होते हैं जिनको जिंदगी फिल्म देखने वालों की जिंदगियों से मिलती हैं। उन्हें लगता है कि वे खुद को पर्दे पर महसूस कर रहे हैं। इसके लिए पर फिल्म प्रोड्यूसर पर ऊंगली नही उठा सकते!

और फिरोज़ भाई ने वास्तव में अपनी उंगली उठा दी। इस स्टाइल में जैसे कह रहे हों ‘इंटरव्यू खत्म’ लेकिन मैंने नोट किया जब फिरोज़ मूड में होते हैं तो बातों में होते हैं तो बातों को उंगली लियों से भी सुलझाने की कोशिश करते हैं ऐसी आदत वाले इंसान में एक बहुत बड़ा आर्टिस्ट होता है जो ऊंगलियों से बातों को सुलझाने को कला जानता हो!

एक लेखक-निर्माता-निर्देशक और अभिनेता के सारे बोझ आप क्या जिम्मेदारी आसानी से निभा लेते हैं?

यस, यह सब सेस्टेमैटिक (सही तरीके) से किया जाये तो कोई मुश्किल नहीं होता। सबसे बड़ी बात यही है कि आपको पूरी तरह मालूम होना चाहिए कि आप क्या बना रहे हैं। किसके लिए बना रहे हैं। और क्यों बना रहे है? जो आदमी यह नहीं जानता वह एक अच्छा प्रोड्यूसर नहीं बन सकता।

लंच खत्म हो गया था और ऑफिस ब्वाय कई बार फिरोज़ खान को सैट पर चलने के लिए बुलावा दे गया था। फिरोज़ ने बड़े प्यार से इंटरव्यू खत्म किया और उठ कर सैट की तरफ बढ़ गया।

मुझे लगा एक अमेरिकन एक्टर मेरे सामने जा रहा है लेकिन मुश्किल यह है कि फिरोज़ खान हिंदुस्तान में हैं और हिंदुस्तान में क्राइम फिल्मों की अभी तक विशेष शैली नहीं है। और फिरोज़ खान इस खास शैली को हिंदी फिल्मों में स्थापित करना चाहते हैं। यह बहुत बड़ी बात है। देखें, फिरोज़ खान अपनी आने वाली फिल्मों में इस बात को बड़ी करते हैं या छोटी?


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Mayapuri

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