मूवी रिव्यू: एक ऐसी लव स्टोरी जिसमें प्यार की धधकती आंच नहीं – ‘फितूर’

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रेटिंग**

कई बार देखा गया है कि किताब पर फिल्म बनाना बहुत बड़ा चैलेन्ज हो जाता है क्योंकि कभी किताब पढ़ने में जितनी रोचक होती है सेल्यूलाइड पर उसे उतना दिलचस्प नहीं बनाया जा सकता। अभिषेक कपूर निर्देशित फिल्म ‘फितूर’ के साथ लगभग यही हुआ। करीब डेढ़ सौ साल पुरानी चार्ल्स डिकेन्स की बुक पर बनी ये फिल्म परदे पर इतनी धीमी रफ्तार से चलती है कि दर्शक फिल्म और उसकी रफ्तार को देखते हुये ऊबने लगता है।

कहानी

कश्मीर में एक बच्चा नूर(आदित्य रॉय कपूर) अपनी बहन और बहनोई के पास परवरिश पा रहा है। वो बचपन से ही एक उम्दा आर्टिस्ट है। एक दिन उसे अपने जीजा के साथ बेगम तब्बू के महल और बेगम के बेटी फिरदौस (कैटरिना कैफ) को करीब से देखने का अवसर मिलता है। बेगम उसे वहां कुछ काम भी दे देती है। इस बीच फिरदौस नूर को अपना दोस्त बना लेती है लेकिन फिरदौस तो नूर के जहन में पूरी तरह बस चुकी है। एक दिन उसे पता चलता है कि फिरदौस को पढ़ने के लिये लंदन भेज दिया गया है। वक्त बीतता रहता है नूर इस वक्त एक बहुत बढि़या आर्टिस्ट बन चुका है लेकिन वो फिरदौस को नहीं भूल पाया। बेगम को उसके हुनर का पता चलता है तो वे उसे अपनी आर्ट दिखाने के लिये दिल्ली भेज देती है। वहां लारा दत्ता उसे हैंडल करती है इस बीच उसे वहीं पर अपने सपनों की राजकुमारी फिरदौस भी मिलती है जिसकी सुंदरता वो देखता रह जाता है।

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एक बार फिर दोनों को करीब आने का अवसर मिलता है। नूर वहां अपने आर्ट से सबको चकित कर देता है। उसका आर्ट लाखों में बिकता है। अब उसे लंदन से बुलावा आता है। दिल्ली में ही फिरदौस का कजन आरिफ (कुणाल क्यान सिलोडकर) नूर का दोस्त बन चुका है वो फिरदौस और उसके प्यार से भी वाकिफ है। एक दिन फिरदौस उसे अलविदा कहते हुये चली जाती है तो वो भी सब कुछ छोड़ उसके पीछे कश्मीर पहुंच जाता है लेकिन वहां बेगम उसे बताती है कि फिरदौस की सगाई पाकिस्तान के मिनिस्टर बिलाल (राहल भट्ट) से होने वाली है। लिहाजा वो अब फिरदौस को भूल जाये। नूर देखता हैं कि वहां बिलाल और उसके पिता तलत अजीज आये हुये हैं बाद में नूर किस तरह फिरदौस तक पहुंचता है ये जानने के लिये फिल्म देखनी होगी ।

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निर्देशन

अभिषेक कूपर इससे पहले रॉक ऑन तथा काय पोचे जैसी उत्कृष्ट फिल्म बना चुके हैं लेकिन इस बार उन्होंने ‘फितूर’ के तौर पर कुछ ज्यादा बड़ा चैलेन्ज ले लिया। चार्ल्स डिकेन्स की बुक पर आधारित ये एक ऐसी लव स्टोरी है जिसे अभिषेक उतना दिलचस्प नहीं बना पाये जितनी की वो बुक में है। शुरू से अंत तक कहानी के किरदार उसी के बहाव में धीरे धीरे बहते रहते हैं और दर्शक उन्हें बहते हुये बस देखता रहता है। लिहाजा न तो किरदारों में कोई उन्माद दिखाई देता है और न ही दर्शकों में उन्हें देखने की उत्सुकता। डायरेक्टर भी कहानी को जिस हद तक आज के परिवेश में ला सकता था उसने कोशिश की लेकिन उसे दिलचस्प बनाने में वो पूरी तरह नाकाम रहा। लिहाजा फितूर के नाम पर एक ऐसी लव स्टोरी सामने आती हैं जिसमें धधकती आंच नहीं है। दूसरे निर्देशक कहानी में ही इतना उलझा रहा कि वो कश्मीर की सुंदरता भी पूरी तरह से नहीं उकेर पाया।

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अभिनय

आदित्य रॉय कपूर की बात की जाये तो उनके पास बलिष्ठ शरीर है लेकिन उसमें आकर्षण नहीं, न जाने क्यों वे बीमार से नजर आते हैं। कैटरीना आज भी बेहद खूबसूरत है लेकिन यहां वे भी सिर्फ खूबसूरती बिखेरने के अलावा और कुछ नहीं कर पाती। तब्बू ने अपनी भूमिका और उसके उतार चढ़ावों को पूरी तरह से जीया है। उनकी जवानी की झलक में अदिति राव हैदरी थोड़ी देर के लिये आती है लेकिन उनका आना जाया हो कर रह जाता है। इसी तरह लारा दत्ता ने भी न जाने क्यों एक साधारण सी भूमिका क्यों कर ली। लेकिन अजय देवगन न समझ आने वाली बेग की छोटी सी भूमिका में पूरी तरह असरदार रहे। इसके अलावा कुणाल क्यान, राहुल भट्ट तथा तलत अजीज भी ठीक ठाक काम कर गये।

संगीत

‘फितूर’ में एक ही चीज राहत देने वाली है और वो है अमित त्रिवेदी और कोमल शायल का म्यूजिक। जहां अमित की कंपोजिंग में ये फितूर बहुत ही अच्छा गाना है वहीं कोमल ने पश्मीना तथा होने दो बतियां जैसे गीत बहुत ही मधुरता से कंपोज किये हैं। इसके अलावा हितेन सोनिक का बैकग्राउंड म्यूजिक फिल्म की जान है।

क्यों देखें

कश्मीर की खूबसूरत वादियों में पनपते प्यार के साथ धीमे धीमे बहने का मजा लेना चाहते हैं तो फिल्म देख सकते हैं।

 

 


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Mayapuri

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