जिन्दगी गुलजार है – चच्चा फिल्मी

1 min


10922555_942775735733309_8247163858319329970_n
किसी खूबसूरत की बगिया में हजारों फूल अपनी खुशबू बिखेरते हैं। पर कोई एक फूल ऐसा होता है जो हर मौसम में खिला भी रहता है और अपनी खुशबू व मौजूदगी के एहसास से सबको महकाता रहता है। ऐसा ही एक शख्स है… गुलजार साहिब।
‘‘भतीजे, जिन्दगी गुलजार है तभी तो फिल्मी दुनिया में वो बरसों से छाये हुए हैं। आज भी मेरी दोस्ती नहीं भूले हैं वो’’ चच्चा फिल्मी कलफ लगा सफेद झक्क कुर्ता पहने व कांधे पर झोला लटकाए खुश्बू फिल्म के जितेन्द्र जैसे पिनपिनाते हुए नज़र आये।
‘‘अरे चच्चा, खुदा का खौफ खाओ, गुलजार साहिब फिल्मों की रूह हैं। आत्मा हैं। अच्छे गीतों, अच्छी कहानियों व बेहतरीन संवादों के मसीहा हैं वो, भला आप की दोस्ती उनसे कब हो गई?’’ मैंने हमेशा की तरह उनकी गप्प को टोकते हुए कहा।
‘‘राइटर बनता है तू’’ और इतना नहीं जानता अरे मास्टर राजू मेरे मौहल्ले में पैदा हुआ था। तब गुलजार जी ‘परिचय’ फिल्म बना रहे थे। उन्हें नन्हा-सा तोतला बच्चा नहीं मिल रहा था। मैंने जया भादुड़ी को कहा कि आप मेरे बेटे को ले लो फिल्म में, वो बोली उन्हें बेहद छोटा बच्चा चाहिए.. सो मैंने मास्टर राजू को गोदी में उठाया और गुलजार साहब की गोदी में सरका दिया। बस वो दिन है और आज का दिन है, गुलजार साहब मेरी इतनी कद्र करते हैं कि क्या बताऊ।’’ चच्चा फिल्मी पान की पिचकारी दनदनाते हुए कुलबुलाए।
‘‘क्या बात करते हो चच्चा, मैंने तो सुना है गुलजार साहब ने राखी के कहने पर मास्टर राजू को लिया था?’’ मैंने भी एक हवा में छोड़ते हुए कहा।
‘‘ओहे होये, नामाकूल, किसकी याद दिला दी। राखी जैसी खूबसूरत हीरोइन आज तक नहीं आई। वो मेरे को अपना दोस्त कहती थी। शूटिंग पर मेरे हाथ से बिरयानी खाती थी। भतीजे। मेरी बिरयानी को एक ही प्लेट में खाते खाते ही गुलजार साहब और राखी को त्यार हो गया था। फिर मैंने उनकी शादी भी करवाई।’’ चच्चा फिल्मी छोड़ने का वर्ड रिकॉर्ड बनाते हुए दनदनाए।
‘‘चच्चा, आप महान हो, पूरी फिल्मी दुनिया में जो कुछ भी होता है वो आप ही करवाते हो, आप के बिना तो बॉलीवुड का पता भी नहीं हिल सकता।’’ मैंने चच्चा से अपनी जान छुड़ाते हुए कहा।
‘‘शुक्र है तुझे अक्ल तो आई। मैं तो चला गुलजार साहब से मोटू पतलू के टाइटल सांग जैसा नया सांग लिखवाने जा रहा हूं। आकर मिलता हूं।’’ चच्चा फिल्मी झोले को झुलाते फुदकते हुए निकल गये।
चच्चा कुछ भी कहें, गुलजार साहब के सामने हर शख्स बौना है। उनकी काबिलियत ओर लेखनी का कोई सानी नहीं है। एक शेर जो मैंने एक सम्मान समारोह में गुलजार साहब के सामने कहा था, वो आपकी नजर करता हूं।
‘‘हैरान हूं जब गीतों का बाजार देखता हूं।
जाहिल और बेअक्ल से खरीददार देखता हूं
बेखुदी में खुद को समझ बैठा था मैं शायर ।
सर झुक जाता है, जब सामने ‘गुलजार’ देखता हूं
(लेखक हरविन्द्र मांकड़)


Like it? Share with your friends!

Mayapuri

अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिये