गुलजार जो गुलजार ना बन सके

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मायापुरी अंक 13.1974

ठीक याद नही आता, तेरह-चौदह वर्ष पहले की घटना होगी। पहाड़गंज में नटराज होटल के रेस्टोरेंट में संध्या को कुछ शायर और लेखक इकट्ठे हो जाते थे। दो नौजवान सिक्ख लेखक इन गोष्टियों में प्राय: रोज आते थे स्वर्ण सिंह और गुलजार सिंह दोनों ने अपने बाल कटा डाले और नाम में भी परिवर्तन कर लिया। उन्होनें अपने नाम रख लिये एस. स्वर्ण और एस. रख लिये एस. स्वर्ण और एस. गुलजार उनका ख्याल था (और काफी नेक ख्याल था) कि सिक्ख बने रहना उनकी साहित्यिक उन्नति में बाधक है। बाल कटा कर दोनों ने अपना-अपना साहित्यिक प्रगति के लिए पूरी तरह Stremline कर लिया।

तब पंजाबी की एक प्रसिद्ध पत्रिका निकलती थी चेतना। सुविख्यात कहानीकार राजेन्द्र सिहं बेदी उस पत्रिका के संरक्षक थे और एस. स्वर्ण संपादक स्वर्ण और गुलजार दोनों पत्रिका की चिन्ता में दुबले हुए जाते थे। उन्हीं दिनों में गुलजार ने एक गोष्ठी में साहित्यिक उन्नति के लिए एक नया फार्मूला निकाला था अगर कोई लेखक बंगला सीख ले तो वह बंगला साहित्य मे से कितनी ही रचनाएं नकल कर (अनुवाद कर) पंजाबी और हिन्दी साहित्य में छपवा सकता है। बंगला का साहित्य कितना विशाल है वहां हरेक तीसरे घर में एक राइटर होता है और हरेक दसवें घर से एक पत्रिका निकलत है (गुलजार आंकड़े देने में सदा से तेज रहे है। आप उनसे बात कीजिए, वे आपको बता देंगे, भारत में सौ फिल्मों के पीछे नब्बे फार्मूला फिल्में बनती है, दस आर्ट फिल्में। नब्बे में से आठ फार्मूला फिल्में फ्लॉप होती है और दस मे से पांच आर्ट फिल्में पिटती है। इसका मतलब है केवल तैंतीस प्रतिशत फार्मूला फिल्में सफल होत है जबकि पचास प्रतिशत आर्ट फिल्में हिट जाती है। वगैरह) की सफलता की सीढ़ी बनी। यह कैसे बनी यह आगे बतायेंगे पहले हम आपको यह बता दें कि जब एक पंजाबी बंगाली से बंगला में बात करता है तो बंगाली बाबू कैसे बरसात में गुड़ की भेली की तरह पिघल जाता है।

हमारे एक पंजाबी दोस्त की दुकान है पंजाब शाल भंडार दोस्त बंगला अच्छी तरह जानते है जब भी उनकी दुकान पर कोई बंगाली महिला शाल खरीदने आती है, दोस्त उससे बंगला में बातें करने लगते है। महिला शाल देखना भूलकर पूछने लगती है, आपने बंगला कहां से सीखी, कैसे सीखी आज तक उनकी दुकान से बंगाली महिला खाली हाथ नही लौटी हम बच्चे होते थे तो बंगाली लड़कियों को केमोन अच्छे कह कर पुकारते थे।

गुलजार बम्बई में मारो-मारो फिर रहे थे। उन्होनें एक-दो बार विमल राय पर बंगला का जादू चलाने की कोशिश की मगर विशेष सफल न हो सका।

उन्ही दिनों महान अभिनेत्री मीना कुमारी बहुत दुखद दिनों में से गुजर रही थी। कमाल अमरोही से अनबन हो जाने के कारण वे एक होटल मे रह रही थी। अपना दुख भुलाने के लिए मीना कुमारी ने मदिरा का सहारा लिया था। वह बहुत अधिक मात्रा में पीने लगी थी। उन्हें अपना दुख बांटने के लिए ‘इंटेलीजेंट कम्पनी की जरूरत थी। मीना कुमारी की यह जरूरत पूरी की गुलजार ने। गुलजार ने मीना का दुख-दर्द बांटा और उनकी नजरों में अपना एक स्थान बना लिया। तब मीना कुमारी की सिफारिश पर बिमल रॉय ने गुलजार से बंदिनि के लिए एक गीत लिखने को कहा यह गुलजार की पहली सफलता थी।

मैं आपको ठीक-ठीक बता नही सकता, इस सफलता पर गुलजार को कितनी प्रसन्नता हुई थी। उनकी प्रसन्नता ठीक-ठीक आंकी नही जा सकती प्रसन्नता के मारे वह कई रात सो नही सके। एस.डी. बर्मन (बंगाली) ने गीत लिखने के लिए जो धुन दी थी, गुलजार बार-बार उस पर गीत लिखते थे और स्वयं तसल्ली न होने पर फाड़ कर फेंक देते थे। गीत का मुखड़ा लिखते ही उन्हें लगता, ऐसा गीत तो शैलेन्द्र ने पहले ही लिख डाला और कभी लगता शकील साहब उनके अनलिखे गीत की वर्षों पहले नकल कर चुके है खैर साहब किसी तरह गीत लिखा गया और खासा ओरिजिनल गीत लिखा गया मोरा गोरा रंग ले ले, मोहे श्याम रंग दे दे, इस ओरिजिनल गीत को लिखने में गुलजार को इतनी मेहनत करनी पड़ी कि उन्होनें भविष्य में कोई भी चीज ओरिजिनल न लिखने की कसम खा ली।

मीना कुमारी तो चली गई मगर वह इस संसार में दो व्यक्तियों का भला करती गई कमाल अमरोही और गुलजार मीना जी के कारण गुलजार फिल्म जगत में पहचानो जाने लगे थे। इसी बीच गुलजार ने दो बंगालियों के दिलों में स्थान बना लिया था राखी और ऋषिकेश मुखर्जी राखी बंगाल में अपने पति को तलाक देकर बम्बई आई थी और फिल्मों में काम पाने की इच्छुक थी। गुलजार ऐसी दुखी स्त्रियों की सहानुभूति जीतने में एक्सपर्ट है ही। बस उन्होनें बंगला का जादू राखी पर चला दिया। राखी इस जादू से कैसा बिंध गई, यह पाठकों को बताने की जरूरत नही।

ऋषिकेश मुखर्जी ने गुलजार को धीरे-धीरे आजमाया। सबसे पहले ऋषि दा ने गुलजार के कंधों पर ‘आशीर्वाद’ के संवाद लिखने का भार सौंपा ‘आशीर्वाद’ का वास्तविक नायक अशोक कुमार (फिल्म में संजीव कुमार नाम मात्र के लिए नायक बना है) शायर है गुलजार भी शायर है। वह बला का मेहनमी है। इसमें दो मत नही हो सकते। ‘आशीर्वाद’ में कवितानुमा डायलाग लिखकर ऋषिदा का मन जीत लिया।

ऋषि दा को फिल्म ‘गुड्डी’ में कहानी, पटकथा, संवाद सब गुलजार के जिम्मे था। अपना यह रोल भी गुलजार बखूबी निभा ले गया इसके पश्चात तो कहना क्या था ‘मेरे अपने में ऋषि दा ने गुलजार निर्देशक बना दिया। गुलजार और ऋषिकेश मुखर्जी ने विदेशी फिल्मों को आधार बना कर एक के बाद एक आर्ट फिल्में देनी शुरू कर दी। गुलजार की फिल्म का आधार किसी विदेशी फिल्मों में खोजा जा सकता है। ‘परिचय’ ‘साउंड ऑफ म्यूजिक’ का रूपांतर है तो ‘नमक हराम’ ‘बेकेट’ का ‘कोशिश’ फिल्म ‘हैप्पीनैस फार अस एलोन’ का भारतीयकरण है। इसपर शर्म की बात यह है कि जब फिल्म की कहानी को पुरस्कृत किया गया तो गुलजार ने उस पुरस्कार को स्वीकार कर लिया। कायदे से उन्हें यह पुरस्कार ओरिजिनल फिल्म के जापानी लेखक को देना चाहिए था।

जो हो, गुलजार एक सफल व्यक्ति है। पिछले दिनों मैं बम्बई गया। ‘फेमस सिने लेबोरेट्री’ में लता और मदन मोहन से भेंट हुई। गुलजार साहब भी वहां मौजूद थे। बहुत प्रेमभाव से मिले। ‘मायपुरी’ के ताजा अंक की प्रशंसा साथ फोटो खिचवाया। मैंने इंटरव्यू लेने की बात कही तो अगले दिन चार बजे का समय दिया।

मैं क्लब बैक रोड पर वाई.एम.सी.ए होटल में ठहरा हुआ था। अगले दिन बहुत तेज वर्षा हो रही थी। मैंने बारह बजे गुलजार को फोन कर कन्फर्म कर लिया कि वह चार बजे घर पर ही मिलेंगे। टैक्सी पर पूरे पच्चीस रुपये खर्च कर मैं चार बजे गुलजार के ऑफिस पहुंचा। गुलजार उस समय अपने सहायक भूषण वन माली (गुलजार का पुराना कवि दोस्त जो कभी ‘नई सदी’ में सहायक संपादक रह चुका था) के साथ बैठे बातें कर रहे थे। गुलजार ने मुझे देखते ही कहा “सॉरी, आज तो मैं बिजी हूं, आप फिर कभी आइएगा

गुलजार के इस व्यवहार से मैं भौचक्का रह गया। विश्वास न होता था कि वह वही गुलजार है जो पहाड़गंज में हमारे साथ बैठकर चाय पीते थे और ‘चेतना’ का वार्षिक ग्राहक फ्रांस लाने पर इतना खुश होते थे मानों उसे स्वर्ग का राज्य मिल गया हो।

मैंने एक कोशिश और की “आपने स्वंय ही मुझे चार बजे का समय दिया थे और इस समय पूरे चार बजे है। गुलजार ने अपनी असमर्थता जाहिर करते हुए कहा “समय तो दिया था मगर मैं बहुत व्यस्त हूं आप कल नौ बजे सुबह आ जाइये।

मगर मैं नौ बजे सुबह नही आ सकता था क्योंकि मुझे रात की फ्लाइट से वापस लौटना था। बाहर उसी तरह तेज पानी बरस रहा था और मैं गुलजार के ऑफिस के बाहर अपने प्यास से सूखे होंठो पर जीभ फिराते हुए सोच रहा था सफलता पा लेना जितना आसान है, सफलता पचा लेना उतना ही कठिन है। और हां, उस दिन गुलजार ने मुझे अपना इंटरव्यू दे दिया होता तो बजाय इस लेख के आप वह इंटरव्यू ही पढ़ रहे होते।


Mayapuri