चार दोस्तों का संघर्ष आखिर रंग लाया!

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051-25 gulzar

मायापुरी अंक 51,1975

मुंबई के एक मकान में चार दोस्त रहते थे। चारों फिल्म लाइन में संघर्ष कर रहे थे। कोई गीतकार बनने आया था, कोई निर्देशक और कोई कहानीकार। कभी इनकी हालत इतनी खराब होती कि घर में चाय बनाने तक को पैसे न होते थे। उस समय कलमकार अपने दिमाग के चमत्कार दिखाते। अपने नौकर को किसी पड़ोसी के यहां भेज कर चाय की पत्ती मंगवाने और कभी घर से ही चिल्लाते कि इतने सारे लोग बसे हुए हैं, क्या कोई पड़ोसी को चाय के लिए शक्कर न देगा?

गरज कि मानमती के कुन्बे की तरह चाय का सामान प्राप्त होता। और चाय बनती। कभी कभार तो बेचारे सारा सारा दिन सिर्फ चाय पर ही गुजार देते। और ऐसा भी होता कि अनाज खाए दो-दो तीन-तीन हो जाते, लेकिन मायूस न होते थे।

खुदा की जात और अपनी हिम्मत व मेहनत पर यकीन था कि उनका संघर्ष बेकार नहीं जायेगा और आज वह रंग ऐसा लाया है कि इंडस्ट्री इन का लोहा मानती हैं। चारों अपने मकसद में कामयाब हो गए हैं।

वह चार दोस्त आज के कामयाब रचनाकार हैं ब्रिज, रतन भट्टाचार्य एस.एम. अब्बास और गुलजार।


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Mayapuri

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