स्व.गुरूदत्त एक निष्ठावान फिल्मकार

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मायापुरी अंक 52,1975

उर्दू फिल्म बनाने के संबंध में गुरूदत्त की ‘चौदहवीं का चांद’ की कथा दिलचस्प है। गुरूदत्त और जॉनी वाकर में बड़ी दोस्ती थी। एक दिन जॉनी वाकर (जिनका असली नाम बद्रद्दीन काज़ी है) दिग्गदर्शक सादिक बाबू की एक कहानी लेकर गुरूदत्त के पास आया। और गुरूदत्त से बोला आजकल सादिक बाबू की आर्थिक हालत अच्छी नहीं है। इसलिए आपको उनकी सहायता करनी है। आप यह कहानी पढ़ लीजिए इसमें आपको हीरो की भूमिका करनी है। इसके लिए आप क्या लेंगे और कितना कॉऑपरेशन देंगे। यह सादिक बाबू के साथ बैठ कर तय कर लें। और इस बात को ध्यान में रखें कि सादिक बाबू की सहायता करनी है।

गुरूदत्त बड़े प्रेमी स्वभाव के इंसान थे। उन्होंने जॉनी वॉकर की बात का मान रखने के लिए कहा, मुझे कहनी सुना दो।

जॉनी वाकर ने जैसे-तैसे पूरी कहानी सुना दी।

गुरूदत्त ने कहानी सुनकर कहा, सादिक बाबू यह फिल्म हमारे साथ क्यों नहीं बनाते?

आप साथ बनाने का क्या मतलब है? जॉनी वॉकर ने पूछा।

मतलब यह कि बैनर गुरूदत्त, प्रोडक्शन हो, दिग्दर्शक, सादिक बाबू, हीरो गुरूदत्त हीरोइन वहीदा रहमान गुरूदत्त ने कहा।

सादिक बाबू ने गुरूदत्त की पेशकश स्वीकार कर ली। ‘चौदहवी का चांद’ बनी और सिल्वर जुबिली हिट साबित हुई। और उसकी सफलता से एक बार पुन: मुस्लिम सामाजिक फिल्मों का दौर शुरू हो गया।


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Mayapuri

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