‘‘खुशी आपका स्टेट आॅफ माइंड है’’- दिनेश विजन

1 min


‘लव आज कल’, ‘काॅकटेल’, ‘एजेंट विनोद’, ‘लेकर हम दीवाना दिल’, ‘फाइंडिग फैनी’के बाद ‘‘हैप्पी एंडिंग’’ जैसी अलग अलग तरह की फिल्मों का निर्माण ‘‘इलूमीनाटी फिल्मस’ के बैनर तले किया गया है. ‘‘इलूमीनाटी फिल्मस’’ के बैनर में सैफ अली खान और दिनेश विजन भागीदार हैं. जबकि दिनेश विजन ने 2005 में पहली फिल्म अपनी कंपनी के तहत बनायी थी.

Dinesh-Vijan1

2005 में पहली फिल्म ‘‘बीइंग सायरस’’ लेकर 2014 में ‘‘हैप्पी एंडिंग’’ तक की अपनी यात्रा को किस तरह से देखते हैं?

-मैं खुद को लक्की मानता हॅूं. मैं एक पंजाबी बिजनेस फैमिली से हॅूं. मेरे पिता का ट्रांसपोर्ट का बिजनेस है. मेरे दादा जी रावलपिंडी से भारत आए थे और यह बिजनेस शुरू किया था. मैने 2001 से 2003 तक एमबीए की पढ़ाई की. उसके बाद मेरे पिता चाहते थे कि मैं कोई अच्छी नौकरी कर लूं अथवा पारिवारिक बिजनेस को आगे बढ़ाउं अथवा कोई नया बिजनेस शुरू करुं. पर सच यह है कि पारिवारिक बिजनेस में मेरी रूचि नहीं थी. मेरी रूचि सिनेमा में रही है. मैं अमिताभ बच्चन का बहुत बड़ा प्रशंसक रहा ‘लव आज कल’,‘काॅकटेल’, ‘एजेंट विनोद’,‘लेकर हम दीवाना दिल’,‘फाइंडिग फैनी’के बाद ‘‘हैप्पी एंडिंग’’जैसी अलग अलग तरह की फिल्मों का निर्माण‘‘इलूमीनाटी फिल्मस’के बैनर तले किया गया है.‘‘इलूमीनाटी फिल्मस’’के बैनर में सैफ अली खान और दिनेश विजन भागीदार हैं. जबकि दिनेश विजन ने 2005 में पहली फिल्म अपनी कंपनी के तहत बनायी थी.

आपको सिनेमा की समझ कैसे हुई?

-जिंदगी से ही मुझे सिनेमा की जानकारी मिली. क्योंकि मैं सिनेमा देखने का बहुत शौकीन रहा हूं. मैं बहुत फिल्में देखा करता था. मैं तो फिल्मों का कोर्स भी करना चाहता था. पर पिता की मर्जी नहीं थी. इसलिए एमबीए की पढ़ाई की. इसके अलावा मुझे संगीत की बड़ी अच्छी समझ है. एमबीए की पढ़ाई करने के बाद मैं सिनेमा को लेकर एक बाहरी इंसान के रूप में सोच सकता हूं. बहरहाल, सैफ अली के साथ मिलकर कंपनी बनाने के बाद मैंने एक बड़ी फिल्म ‘‘लव आज कल’’शुरू की. यह फिल्म सफल रही. मुझे प्रेम कहानियां बहुत पसंद हैं. तो वहीं मुझे कुछ अलग तरह की विषयों वाली, मसलन ‘बीइंग सायरस’, ‘फाइडिंग फैनी’और 2015 में रिलीज होने वाली ‘बदलापुर’ जैसी फिल्में पसंद हैं. पर मुझे लगता है कि मेरे अंदर से प्रे कहानी बहुत नेच्युरली बाहर आती है. तो मैंने इम्तियाज अली के साथ ‘लव आज कल’ बनायी. फिर होमी अडजानिया के साथ ‘‘काॅकटेल’’ बनायी. उसके बाद राज डी के के साथ‘‘गो गोवा गाॅन’’बनायी. आरिफ अली के साथ‘‘लेकर हम दीवाना दिल’’बनायी. अब एक बार फिर राज डी के के साथ ‘‘हैप्पी एंडिंग’’लेकर आया हूं. मैं अपने आपको बहुत खुश किस्मत समझता हूं कि मैंने जिन निर्देशकों के साथ फिल्में बनायी, वह बहुत अच्छे इंसान हैं. किसी में कोई ‘इगो’ नहीं है. इम्तियाज अली से तो मुझे बहुत कुछ सीखने को भी मिला.

आपने और सैफ अली ने जो सोच कर ‘‘इलूमीनाटी फिल्म्स’’ नामक कंपनी की शुरूआत की थी, उसमें कहां तक सफल है?

-पूरी तरह से सफल हैं. हमने इस कंपनी के तहत जितनी भी फिल्में बनायी, उन पर हमें गर्व है. हमने ‘लव आज कल’ बनायी सफल थी. ‘काॅकटेल’ बनाते हुए डर रहे थे, पर हम भाग्यशाली रहे कि यह फिल्म चल गयी. ‘गो गोवा गाॅन’ भी चली. उसके बाद ‘लेकर हम दीवाना दिल’ बनायी, यह फिल्म जरूर नहीं चली. इसके बाद हमने‘फाइडिंग फैनी’ बनायी, यह फिल्म भी हिट रही. अब हमें पूरी उम्मीद है कि ‘हैप्पी एंडिंग’ भी सफलता हासिल करेगी. जब हमारी कोई फिल्म नहीं चलती है, तो हम उससे बहुत कुछ सीखते हैं.

लेकिन आपकी फिल्म ‘‘गो गोवा गाॅन’’ भी तो नहीं चली थी?

-ऐसा नहीं है. यह फिल्म चली थी. इसने अच्छा धंधा किया था. हमने यह फिल्म दस करोड़ में बनायी थी. हमारा सेटेलाइट बिक चुका था. फिल्म ने 25 करोड़ का धंधा किया. तो हम सफल रहे. ‘इरोज इंटरनेशनल’को भी इस फिल्म ने कमा कर दिया. आज तक हमारी एक भी फिल्म ऐसी नहीं रही, जिसने हमारे घर के पैसे को तोड़ा हो. हमें नुकसान नहीं हुआ. ‘इरोज इंटरनेशनल’को भी नुकसान नहीं हुआ. जब हमारी फिल्म चलती है, तभी हम पैसा कमाते हैं. मेरा मानना है कि मेरी सफलता तभी है, जब हमारी फिल्म के डिस्ट्रीब्यूटर सब पैसा कमाए. कमायी में से कमाएं तो ही सही राह है. यही वजह है कि एक फिल्म‘फाइंडिंग फैनी’ को छोड़कर हम सभी फिल्में‘इरोज इंटरनेषनल’ के साथ कर रहे हैं. अब तो‘इरोज इंटरनेशनल’के सुनील लुल्ला मेरे अच्छे दोस्त बन गए हैं.

किसी कहानी पर फिल्म निर्माण करने का निर्णय किस तरह लेते हैं?

-सबसे पहले हमें कहानी पसंद आनी चाहिए. कहानी पसंद आने के बाद हम यह विचार करते हैं कि इस फिल्म को किस बजट में बनाया जाना चाहिए. उस बजट और कहानी के किरदारों में फिट बैठने वाले कलाकार पर हम विचार करते हैं. जिस बजट में हमने ‘हैप्पी एंडिंग’ बनायी है, उसी बजट में यदि हम‘‘गो गोवा गाॅन’’बनाते तो फ्लाप होती.

पर क्या आप मानते हैं कि ‘‘गो गोवा गाॅन’’में आपने जाॅम्बी की जो कथा दिखायी थी,उससे दर्शक ने रिलेट किया?

-जी हाॅ! तभी तो फिल्म ने 25 करोड़ रूपए कमाए. मैं वह फिल्में बनाना चाहता हूं, जहां मैं सिनेमा को आगे ले जा सकूं. मैंने ‘फाइंडिंग फैनी’को 12 करोड़ में बनाया. फिल्म ने 32 करोड़ का बिजनेस किया. विदेशों में 45 करोड़ का बिजनेस हुआ. पर हम इस फिल्म को 12 करोड़ में इसलिए बना पाए थे, क्योंकि कलाकारों ने कम पैसे लिए थे. अन्यथा जिस फिल्म में दीपिका पादुकोण, नसिरूद्दीन शाह, डिंपल कापडि़या जैसे कलाकार हों, उसका बजट ज्यादा होना चाहिए और उसे कम से कम 90 करोड़ का बिजनेस करना चाहिए. पर कलाकारों ने कम पैसे लेकर काम किया. इसलिए हम कम बजट में फिल्म बना सकें. और हम सिनेमा को आगे ले जा रहे हैं. हर कलाकार को चाहिए कि वह यदि एक कमर्शियल फिल्म करता है, तो एक ऐसीफिल्म भी करे, जिसमें कम पैसे ले. जिससे सिनेमा को आगे ले जाने का काम चलता रहे.अब कम बजट में ही बनने वाली फिल्म‘बदलापुर’आ रही है.

आपने‘‘हैप्पी एंडिंग’’बनाने का निर्णय किस आधार पर लिया?

-‘‘गो गोवा गाॅन’’की षूटिंग खत्म होने के दूसरे तीसरे दिन की बात है.निर्देषकद्वय राज डी के ने मुझे इस फिल्म की कहानी सुनायी थी.उस वक्त सैफ अली मौजूद नहीं थे.मुझे इस फिल्म की इस बात ने प्रभावित किया कि यह फिल्म लव स्टोरी का मजाक उड़ाती हैं,पर बनते बनते लव स्टोरी बन जाती है.मुझे लगा कि यह तो बहुत रोचक फिल्म बनेंगी.क्योंकि अब तक हमने जो पे्रम कहानी वाली फिल्म बनायी हैं,उसका यह मजाक उड़ाती है.इस फिल्म के सारे पात्र मनोरंजक हैं.फिर फिल्म में गोविंदा, ईलियाना डिक्रूजा,रणवीर सोरी,कलकी कोचलीन,सैफ अली जैसे बेहतरीन कलाकार हैं.प्रीती जिंटा और करीना कपूर ने तो गेस्ट अपियरेंस किया है.इसके अलावा योगी के किरदार में सैफ बहुत अलग नजर आएंगे.इसमें कुछ अलग तरह की बात है.मैंने पहले ही कहा कि जब मुझे कहानी पसंद आती है,तभी मैं फिल्म निर्माण करता हूं.मैंने पहले ही कहा कि यदि मैंने ‘गो गोवा गाॅन’को सैफ अली के साथ ही‘हैप्पी एंडिंग’के बजट में बनाया होता,तो मैं मर जाता.अतः मैं कहानी पसंद आने के बाद पहले बजट तय करता हूं, उसके बाद मैं उन कलाकारों को लेता हूं,जो कि किरदारों में फिट होने के साथ साथ मेरे बजट में काम करने को तैयार हो जाएं.मेरा मानना है कि हर कलाकार को कम पैसे में कुछ अच्छी फिल्में या आफ बीट काम करना चाहिए.पर यह कलाकारों पर निर्भर करता है कि वह आॅफ बीट फिल्में करना चाहते हैं या सिर्फ कमर्षियल फिल्में करना चाहते हैं.

‘‘हैप्पी एंडिंग’’खत्म होने पर दर्शक अपने साथ क्या ले जाएगा?

-वह यह सोचने पर मजबूर हो जाएगा कि हर इंसान की जिंदगी में ‘हैप्पी एंडिंग’होती है. पर यह आप पर निर्भर करता है कि आपके लिए खुशी क्या है. खुशी आपका स्टेट आॅफ माइंड है. तो यह आपके स्टेट आॅफ माइंड पर निर्भर करता है कि आप किस तरह की खुशी में खुशी महसूस कर सकते हैं. हमारी इस फिल्म में काॅंसेप्ट है कि प्रेम कहानी का मजाक उड़ाते हुए भी फिल्म प्रेम कहानी बन जाती है.

‘‘बदलापुर’’ किस तरह की फिल्म है?

-एक अलग तरह की फिल्म है. इसके निर्देशक श्रीराम राघवन हैं. यह उन्ही की तरह की फिल्म है. फिल्म में वरूण धवन और नवाजुद्दीन सिद्दकी के किरदार हैं. दोनों इस फिल्म में एकदम अलग रूप में नजर आएंगे. हुमा खान भी है. विनय पाठक भी हैं. यह एक ट्विस्टेड इंटरटेनमेंट वाली फिल्म है.

फिल्म निर्माता का काम पैसे बचाना होता है. जबकि कलाकार हमेशा पैसा बचाने की बजाए रचनात्मक दृष्टिकोण से सोचता है. ऐसे में आप और सैफ कहां जाकर कम्प्रोमाइस करते हैं?

-हम कम्प्रोमाइस नहीं करते. हम दोनों आधे आधे पूरे हो जाते हैं. जब हम दोनों को कहानी पसंद आती है, तो हम दोनों उस पर आगे जाने के बारे में सोचते हैं. सैफ कमर्शियल पार्ट मुझ पर छोड़ देते हैं. वह क्रिएटीविटी पर ध्यान रखते हैं. फिल्म के बजट पर मोटी मोटी दृष्टि रखते हैं. हर कहानी का अपना बजट है. वह उसके आगे नहीं जाना चाहते. इसके अलावा हम दोनों का स्वभाव यह है कि हम दोनों अपनी फिल्म को सस्ती दिखने वाली नहीं बनाते. अच्छा लुक वाली ही बनाते हैं. हम पहले नाम कमाना चाहते हैं. नाम कमाते कमाते पैसा कमाना चाहते हैं. क्योंकि मैं और सैफ दोनों इस बात में यकीन रखते हैं कि पैसा कमाते कमाते नाम नहीं बनता. हमारे लिए पैसे की बजाए अच्छा काम महत्व रखता है.

फेसबुक व ट्वीटर पर फिल्म के पोस्टर व फोटोग्राफ डालने से क्या बाॅक्स आफिस का कलेक्शन बढ़ता है?

-जी हां! हम ऐसा फिल्म के टार्गेट माॅर्केट को कैप्चर करने के लिए करते हैं. अब वाॅट्स अप और फेसबुक तो छोटे छोटे सेंटर तक पहुंच चुका है. यह कॅम्यूनीकेशन का नया माध्यम हो चुका है. वाॅट्स अप या ट्वीटर या फेसबुक पर मौजूद लोग जिस तरह की फिल्में देखते हैं, हम उसी तरह की फिल्में बनाते हैं. देखिए आज की तारीख में जरूरत इस बात की है कि हम फिल्म के निर्माण व प्रचार में बेवजह का खर्च ना करें. दक्षिण भारत की फिल्म इंडस्ट्री में बहुत सोच समझ कर खर्च किया जाता है.

मल्टीप्लैक्स के आने के बाद हाॅलीवुड व अन्य देशोंकी फिल्में हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं में डब होकर रिलीज हो रही हैं. तो इससे एक नयी चुनौती नहीं खड़ी हो गयी?

-चुनौती है. मगर हम उन्हें आने से रोक नहीं सकते. फिर भारतीय फिल्में भी विदेशों में जा रही हैं. पर हमारा सिनेमा भी धीरे धीरे सुधर रहा है. गुणवत्ता वाला सिनेमा बनने लगा है. स्वस्थ प्रतिस्पर्धा हो रही है.

 


Like it? Share with your friends!

Mayapuri

अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिये