Happy birthday लक्ष्मीकांत: हम तो केवल उनकी जरूरत पूरी करते हैं (पूर्व इंटरव्यू)

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लक्ष्मीकांत प्यारे लाल

यह लेख दिनांक 21-8-1983 मायापुरी के पुराने अंक 465 से लिया गया है!

संगीतकारों की जोड़ी के रूप में सर्वप्रथम हुस्न लालभगतराम को अपार लोकप्रियता मिलती थी, उनके बाद शंकरजय किशन ऐसे छाये कि लगता था, कि इनका बदल नहीं हो सकता! मगर लक्ष्मीकांत प्यारे लाल ने शंकर जयकिशन को केवल बहुत पीछे छोड़ दिया बल्कि शंकर जयकिशन के जन्मदाता राजकपूर के कैम्प में भी अपने झंडे गाड़ दिए, किन्तु इधर कुछ अर्से से लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के संगीत का जादू टूटता सा नजर रहा है, राजकपूर, मनोज कुमार, मनमोहन देसाई आदि कैम्पों में उनकी जगह नए संगीतकारों ने ले ली है, पिछले दिनों लक्ष्मीकांतप्यारे लाल के म्यूजिक हॉल में हमारी मुलाकात हुई तो हमने उनसे पूछा…..

लक्ष्मीकांत प्यारे लाल

मनोज कुमार आदि आपके स्थाई कैम्प थे, किन्तु उनके यहाँ भी अब नये संगीकार गए हैं. क्या मनोज कुमार से आपका कुछ झगड़ा हो गया है ?’

पेन्टर बाबू एक नई प्रतिभाओं की फिल्म थी, इसलिए उसका सारा सैटअप उसी हिसाब से बनाया गया था, मनोज कुमार जी ने हम से बात की थी, हमें कोई आपत्ति नहीं थी, हमनेसंतोष के लिए मनोज जी का लिखा गाना रिकाॅर्ड किया है, अगर झगड़ा होता तो ऐसा कभी होता, हम भविष्य में भी साथ काम करेंगे, लक्ष्मीकांत ने बताया

राजकपूर ने भी अब की बार आपको रिपीट नहीं किया. इसका क्या कारण है?

वह तीन फिल्में बना रहे हैं. तीनों फिल्मों में हम अकेले संगीत नहीं दे सकते थे, इसलिए एक फिल्राम तेरी गंगा मैली के लिए उन्होंने रविन्द्र जैन को लिया है, बाकी की प्लानिंग चल रही है. प्यारेलाल ने बताया.

लक्ष्मीकांत प्यारे लाल

हमें ऐसा लगता है, कि इधर कुछ अर्से से आपकी फिल्मों के संगीत को आशातीत लोकप्रियता नहीं मिल पाई, इसी कारण साउथ के निर्माता और मुंबई के निर्माता कुछ घबरा गए हैं, ‘बगावत, ‘अपना बना लो, ‘सम्राटजानवर आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं. क्या आप इससे सहमत हैं हमने पूछा ?’

हम आपसे पुरी तरह सहमत नहीं है, यह सहीं है कि इनमें से कुछ संगीत लोकप्रिय नहीं हो सका, जिनका संगीत लोकप्रिय नहीं हो सका, उनसे हम खुद संतुष्ट नहीं थे, किन्तु हम तो इतना जानते हैं कि हमें तो केवल फिल्मकारों की जरूरत पूरी करनी होती है, वह जैसी चीज मांगते हैं दे देते हैं. साउथ की फिल्मों में गानों की सिचुएशन इतनी पाॅवर फुल नहीं होती.

लक्ष्मीकांत प्यारे लाल

प्रायः सब में एक सी ही सिचुएशन होती है. साउथ में एल.वी.प्रसाद और के.बालचन्दर कुछ अलग हटकर फिल्में बनाते हैं, उनकी फिल्मों में आपको हमारे संगीत से कभी निराशा नहीं मिली होगी. वहएक दूजे के लिए हो याजरा सी जिंदगी, इसलिए संगीतकार के साथ फिल्मकार भी अच्छे संगीत में बराबर का भागीदार होता है. फिल्मकार के योगदान नजर अंदाज नहीं किया जा संकता,

बीच में आपको किशोर कुमार से झगड़ा हो गया था, आपने उसके मुकाबले में बाला सुब्रामनियम को ला खड़ा किया, किन्तु वह भी यसुदास की तरह स्थाई जगह बना सका. इसका क्या कारण है?

हमारा किशोर कुमार से कोई झगड़ा नहीं हुआ था. बस जरा सी गलतफहमी हो गई थी. वह दूर हो गई. किशोर कुमार एक महान और बेजोड़ गायक है, जिस प्रकार रफी साहब का जवाब नहीं था. वही हाल किशोर कुमार का है. और अमित कुमार भी आहिस्ताआहिस्ता उस जगह तक पहुँचता जा रहा है.”लक्ष्मीकांत ने कहा

लक्ष्मीकांत प्यारे लाल

तो क्या किशोर से सुलह हो जाने के कारण आप लोगों ने बाला सुब्रामनियम को रास्ता दिखाकर बीच में ही छोड़ दिया ?

नहीं ऐसा नहीं है. साउथ के सिगर्स के साथ भाषा की बड़ी समस्या होती है. जहाँ तक बाला सुब्रामनियम की गायिकी का प्रश्न है उसमें तो वह एक्सपर्ट हैं, किन्तु उसके हिन्दी उर्दू के शब्दों के उच्चारण और आवाज में मद्रासी टच जाता है, अगर वह इस कमी को दूर कर ले तो वह बम्बई में सफल हो सकता है. प्यारेलाल ने कहा.

लक्ष्मीकांत प्यारे लाल

किशोर कुमार का बदल चाहे हो किन्तु मुहम्मद रफी के बदल के रूप में आपने अनवर कोजनता हबलदार में रफी साहब की जिंदगी में ही चाँस दिया था. किन्तु रफी साहब के बाद आपने उसे अधिक अवसर नहीं दिया और शब्बीर कुमार को ले आये. इसका क्या कारण है?

हम प्रायः नई आवाजों को ब्रेक देते रहे हैं. जैसेबॉबी में चंचल और शैलेन्द्र सिह को ब्रेक दिया था. किन्तु उन दोनों के साथ कुछ लिमिटेशन हैं. नरेन्द्र चंचल स्टेज पर जागरण के अवसर पर गाया करता है, वह गानाबॉबी में उस पर ही फिलमाया गया था, इसलिए हिट हुआ. किन्तु हीरो के लिए उसकी आवाज सूट नहीं करती, वह फकीरों के गाने अच्छे गा सकता है, शैलेन्द्र सिह भी कुछ खास प्रकार के गानों के लिए ही उचित है, उसकी आवाज में वह उतार चढ़ाव जोर आदि की कमी है, शब्बीर कुमार हालाकि बाकायदा गायक नहीं है, वह रफी साहब की कॉपी करके, सामने आया है. मगर इसके बावजूद वह अनवर से बेहतर सिंगर है, अनवर की तरह वह भी रफी की कॉपी करता है, किन्तु उसकी आवाज में रफी साहब का टच ज्यादा है. और आप तो जानते हैं कि हमारी फिल्मों में 75 गीत रफी साहब के होते थे, इसलिए उनके देहान्त से हमें बहुत बड़ा धक्का लगा था, हमने जब शब्बीर कुमार को सुना तो हमें लगा कि वह रफी साहब का चाहेबदल हो किन्तु उनसे काफी करीब है, इसलिए हमने उसे अपनी छत्र छाया में ले लिया. उसके गाने सुनने के बाद लोग धोखा खा जाते हैं. शब्बीर को थोड़ी संगीत की साधना की जरूरत है