दर्शक से नहीं जुड़ पाती ‘हसीना पारकर’

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रेटिंग**

बायोपिक फिल्मों की श्रृंखला में इस सप्ताह अपूर्व लाखिया निर्देशित फिल्म ‘हसीना पारकर’ का नाम है। ये फिल्म दाऊद इब्राहिम की बहन हसीना पारकर के जीवन पर आधारित ऐसी फिल्म है। जो बताती है कि एक अपराधी के जीवन का असर उसके परिवार पर किस हद तक पड़ सकता है।

क्या है फिल्म की कहानी ?

एक हवलदार के बारह बच्चों में हसीना सबसे छोटी थी। उन दिनों दाऊद के लगातार अपराध की तरफ बढ़तें कदमों से उसके हवलदार पिता बहुत परेशान थे क्योंकि दाऊद के कदमों पर उसका दूसरा भाई भी चल पड़ा था। इन सब के बावजूद दाऊद, हसीना को बहुत चाहता था। हसीना की शादी इब्राहिम पारकर नाम के शख्स से होती है। जो रेस्टॉरेन्ट चलाने के अलावा फिल्मों में छोटे मोटे रोल करता है। बढ़ते अपराधों के कारण एक दिन दाऊद को देश छोड़ना पड़ता है।

हसीना के पति का मर्डर

इसके बाद जैसे जैसे दाऊद के अपराधों का ग्राफ बढ़ता है। उसी के साथ मुबंई में अकेली रह गई उसकी बहन हसीना की दुष्वारियां भी बढ़ती जाती हैं। उसके पति का मर्डर हो जाता है बाद में वो खुद रेस्टॉरेन्ट चलाने की कोशिश करती है। दाऊद अपने जीजा की मौत का बदला जेजे कांड के तहत लेकर करता है। बाद में दाऊद द्धारा सीरियल बम ब्लास्ट के बाद पुलिस जीना मुश्किल कर देती है।

आखिर कैसे बदल गया हसीना का जीवन ?

दूसरी तरफ लोग बाग हसीना के पास अपने छोटे मोटे झगड़े सुलझाने के लिये आने शुरू हो जाते हैं। इसके बाद एक वक्त ऐसा भी आता है जब हसीना का बाकायदा रोजाना दरबार लगने लगता है। अब हसीना बड़े बड़े झगड़े सुलझाने और खुद भी बिल्डर लाइन में आने के अलावा बिल्डरों को सुरक्षा भी देने लगी। ये सिलसिला लगभग बीस वर्षो तक चलता रहा। इतने वर्षों के दौरान उस पर सिर्फ एक मुकदमा चला और उसमें भी वो बरी हो गई।

अपराधी की बहन से हमदर्दी कैसी ?

अपूर्व लाखिया फिल्म में एक बड़े अपराधी की बहन की कहानी बताने के चक्कर में, उसे हमदर्दी का पात्र बनाने की कोशिश करते पाये गये। यानी हसीना को ऐसा दिखाने की कोशिश की गई जैसे उसने जो भी किया मजबूरन किया। जबकि हसीना अपने जीवनकाल में जो कुछ करती रही, साफ था कि वो सब उसके भाई दाऊद की शह पर था। लेकिन कानूनन इसे साबित नहीं किया जा सका।

फिल्म का माइनस प्वॉइंट

फिल्म की शुरूआत अदालत में हसीना पर मुकदमें की कार्यवाही से शुरू होती है। बीच बीच में हसीना की कहानी फ्लेश बैक में चलती रहती है। अंत में फिल्म कहीं न कहीं ये बताने की कोशिश करती है कि दाऊद और उसकी बहन हसीना ने जो भी किया हालात के तहत किया। यही फिल्म का माइनस प्वॉइंट रहा क्योंकि फिल्म में दोनों भाई बहन द्धारा किये गये अपराधों को महिमा मंडित करने की कोशिश की गई। बेशक ये हसीना की बायोपिक है लेकिन मुख्य किरदार अंत तक दर्शक के साथ नहीं जुड़ पाता। दूसरे किरदार भी, किरदार तो लगते हैं लेकिन सच्चे नहीं लगते।

जूझती दिखीं श्रद्धा कपूर

हसीना पारकर के किरदार में श्रद्धा कपूर अपनी भूमिका से पूरी फिल्म में जूझती दिखाई दी। दरअसल बायोपिक में असली किरदार निभाने वाले ऐक्टर का काफी कुछ मिलता होना चाहिये। लेकिन श्रद्धा के साथ ऐसा कुछ नहीं था उसे सब अपने लुक और अभिनय से कर दिखाना था। जिसमें उसने काफी मेहनत की। लेकिन वो अंत तक अपने आपको दर्शकों से नहीं जोड़ पाती। उसका भाई सिद्धांत कपूर दाऊद के किरदार में जमा है। यानी रीयल लाइफ के बाद रील लाइफ में भाई बहन की ट्यूनिंग अच्छी लगी। हसीना के पति के रोल में अंकुर भाटिया अच्छे लगते हैं।

अंत में फिल्म के लिये यही कहा जा सकता है, कि दाऊद के साथ उसकी बहन हसीना पारकर की एसोसिएशन देखने की उत्सुकता को लेकर फिल्म देखी जा सकती है।

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Mayapuri