ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी

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मायापुरी अंक 52,1975

कहते हैं कि हर चीज़ की अधिक मात्रा हानिकारक होती है। इसीलिए इस इंडस्ट्री में जिस किसी की अधिक पब्लिसिटी होती है उससे लोगों की उतनी ही अधिक आशायें बंध जाती हैं। और अब चीज उन आशाओं पर पूरी नहीं उतरती तो बड़ी निराशा होती है। कुछ ऐसी ही निराशा ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी की प्रथम फिल्म ‘सपनों का सौदागर’ की हीरोइन ड्रीम गर्ल कह कर कुछ ऐसी धाकड़ पब्लिसिटी दी गई थी कि लोग फिल्म का नाम ड्रीम गर्ल ही समझने लगे थे। वह वक्त राज कपूर का था। फिर भी ‘सपनों का सौदागर’ बॉक्स ऑफिस पर हिट नहीं हो सकी थी। लेकिन ड्रीम गर्ल की बुनियाद पर हेमा मालिनी को बेशुमार फिल्में मिल गई थी। और वह फ्लॉप फिल्मों की व्यस्त हीरोइन बन गई थीं।

हेमा मालिनी से मेरी मुलाकात फिल्मिस्तान स्टूडियो में सुबोध मुखर्जी की अभिनेत्री के सैट पर हुई थी। जब मैं सैट पर पहुंचा तो हेमा मालिनी शशि कपूर के साथ शॉट दे रही थीं। शॉट में शशि कपूर और हेमा मालिनी एक ही बिस्तर पर लेटे हुए थे और शशि हेमा का चुम्बन लेने की कोशिश कर रहे थे। इस शॉट के लिए काफी देर तक रिहर्सल होती रही। इसके बावजूद सब ठीक हुआ तो कई रिटेक हो गए। दरअसल हेमा मालिनी किसी अधखिली कली की तरह शर्मा जाती थी और शॉट कट हो जाता था। फिल्म में दोनों पति-पत्नी बने हुए थे। और शॉट पति-पत्नी वाली बात नहीं आ रही थी। इसलिए बड़ी देर और बड़ी मुश्किल में सुबोध मुखर्जी को मनपसंद शॉट मिला।

ड्रीम गर्ल की बड़ी प्रशंसा सुनी थी और वही मुझे सैट पर खींच ले गई थी। मैं भी कुछ पलों के लिए ‘सपनों का सौदागर’ बन जाना चाहता था। इसलिए जब शॉट ओ.के. हो गया तो मैंने भेंट के दौरान उनसे कहा।

मैं अपनी पत्रिका के लिए आपसे चंद सवाल करना चाहता हूं?

मेरे मैकअप रूम में चले चलिये। वही बातें कर लेंगे। हेमा मालिनी ने मद्रासी ब्रांड हिंदी में शर्माते हुए कहा था। और फिर अपनी मां की ओर इस तरह देखा था जैसे कह रही हो, आज्ञा है ना अम्मा?

मैकअप रूम में हेमा मालिनी के अलावा उनकी मां और एक हेयर ड्रेसर भी मौजूद थी। मैं सवाल करता और जवाब हेयर ड्रेसर देती थी या उनकी मां हेमा बस एक मनमोहक मुस्कुराहट बिखेर कर रह जाती थी।

मैंने उनके प्रारम्भिक जीवन के विषय में पूछा तो उन्होंने बताया था, मैं काफी दिनों तक दिल्ली में रही हूं इसलिए हिंदी बड़ी सरलता से बोल लेती हूं। (हांलाकि उनका यह कहना सच न था। दिल्ली रहने के बावजूद वह मद्रासी ब्रांड की हिन्दी बोलती थी। इसलिए उनकी बजाए मां और हेयर ड्रेसर सवालों के जवाब देने लगती थी) मैं फिल्मों में काम नहीं करना चाहती थी। मेरी इच्छा स्टेज पर डांस पेश करने की थी।

यह भी हेमा ने गलत बताया था। उनकी बचपन से ही अभिनेत्री बनने की अभिलाषा थी। वैजयंती माला उनका आदर्श थीं। जिन दिनों वह स्कूल में पढ़ रही थीं, उन्होंने दिल्ली में जुबिली कुमार यानी राजेन्द्र कुमार से भेंट की थी। और उस पर अपनी मनोकामना बताते हुए कहा था कि वह फिल्मों में काम चाहती हैं। तब राजेन्द्र कुमार ने उनसे कहा था, वह अभी बच्ची हैं। जवान हो जाये तो उसे मुंबई में मिल ले।

मज़े की बात यह है कि जब वह जवान होकर मुंबई गई तो उन्हें मुंबई में राजेन्द्र कुमार के साथ काम नहीं मिला। उनके जन्मदाता आनंत स्वामी ने भी अपनी फिल्म आंसू और मुस्कान में हेमा के साथ अजय साहनी को हीरो लिया था। उस वक्त राजेन्द्र कुमार बड़ी तोप माने जाते थे। लेकिन जैसे-जैसे हेमा की गुड्डी ऊंची उठती गई राजेन्द्र कुमार आंसू मान नीचे झुकते चले गये। आखिर एक दिन वह भी आया कि राजेन्द्र कुमार को अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए हेमा मालिनी से ‘गोरा और काला’ में सहायता लेनी पड़ी और हेमा ने बचपन की यादों के सहारे उनके साथ काम किया। जिसका बदला राजेन्द्र कुमार ने फिल्म ‘सुनहरे संसार’ में वहीदा रहमान को हटवा कर हेमा मालिनी को फिल्म देकर चुकवाया था और दिलचस्प बात यह है कि उस फिल्म में वहीदा रहमान ने राजेन्द्र कुमार को रोल दिलाया था। वरना वह तो आउट डेटेड हीरो समझे जाने लगे थे।

खैर! अभिनेत्री में हेमा को रोमांटिक शॉट देने की परेशानी हो रही थी इसलिए हमने उनसे पूछा आप रोमांटिक शॉट देते समय क्या अनुभव करती हैं?

कुछ भी नहीं हेमा ने बड़े भोलेपन से कहा।

प्राय: ऐसे सीन करते समय हीरोइने भावुक हो जाया करती हैं। और शॉट खत्म होने पर भी काफी देर तक उसी स्थिति में रहती है क्या आप पर भी यह प्रतिक्रिया होती है?

मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि आप क्या कह रहे हैं। हेमा मालिनी ने कर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में पूछा था।

मैं जो कुछ भी पूछ रहा हूं वह एक अभिनेत्री से पूछ रहा हूं। आप अपने अनुभव बताईये

यह तो बड़ा नॉनसेंस प्रश्न है? वह झुंझलाकर बोली थीं। और हम उनका मुंह तकते रह गये थे कि इस लड़की को तो बात तक करनी नहीं आती। हीरोइन कैसे बन गई? लेकिन उनकी हेयर ड्रेसिंग ने हमारे चेहरे के भाव पढ़ लिये थे बोली

यह नई-नई आई हैं, इसलिए इनकी बात का बुरा न मानयेगा जब कुछ फिल्मों में काम कर लेंगी तो तब यह बातें इनकी समझ में आ जायेंगी।

और आज 25-30 फिल्में करने के बाद यह सारी बातें हेमा मालिनी की समझ में अच्छी तरह आ गई हैं। न्यूज में कैसे रहा जाता है? फिल्म वालों से कैसे ट्रीट किया जाता है? लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए क्या क्या हथकंडे इस्तेमाल करने पड़ते हैं? प्रेस वालों को अपनी ओर किस प्रकार आकृष्ट किया जाता है? किस प्रकार प्रेस वालों को टाला जाता है? फिल्म पॉलिटिक्स क्या होती है और उसे किस प्रकार अपनाया जाता है? वरना यही लड़की उस वक्त इंटरव्यू देते समय घबरा गई थी और अपनी सहायता के लिए शशि कपूर को बुला बैठी थी शशि! तुम इनके सवालों का जवाब दो। मेरी तरफ समझ में कुछ नही आ रहा है।

आज वही लड़की नंबर वन हीरोइन है। ‘सीता और गीता’ ‘लाल पत्थर’ ‘राजा जानी’ ‘शराफत’ आदि फिल्मों में सुंदर अभिनय से दर्शकों का मन जीत चुकी हैं। और उसके बारे में मेरी तरह सबको अपनी राय बदलने पर मजबूर होना पड़ा है। दरअसल वह तकदीर की धनी है। अगर भाग्य उसका साथ न देता तो आज वह भी अलका, सिम्मी, कोमल (पूनम) कुमुद छुगानी की तरह गुमनामी के अंधेरे में गायब हो चुकी होती। ‘सपनों का सौदागर’ जहां प्यार मिले, अभिनेत्री वारिस आदि लाइन से फ्लॉप फिल्में देने के बाद बहुत कम अभिनेत्रियां इंडस्ट्री में टिक पाई हैं।

यह सौभाग्य है हेमा का कि उनको धर्मेन्द्र जैसे हीरो का साथ मिल गया। और उनके साथ की हुई शुरू की सारी फिल्में ‘तुम हंसी मैं जवां’ ‘शराफत’ ‘राजा जानी’ हिट होती चली गई। फिर तो वह राजेश खन्ना जिसने मालिक से हेमा मालिनी को कटवाकर शर्मिला टैगोर को साइन करवाया था। अपने बुरे दिन आने पर उनकी मदद का तलबगार हुआ। और ‘प्रेम नगर’ में राजेश के साथ काम करके उसने अपनी कसम तोड़ी और आज सारे ही हीरो उसके साथ काम करने की इच्छुक हैं। किंतु दर्शक और फिल्मकार उन्हें केवल धर्मेन्द्र के साथ देखना पसंद करते हैं। हेमा को मां उतना ही नापसंद करती हैं। हालांकि आज हेमा-धर्मेन्द्र हॉटकेक की तरह फिल्मी बाजार में बिकते हैं। याद रहे, दोनों की लगभग आठ फिल्में प्रदर्शित हुई हैं और सबकी सब गोल्डन जुबिली और सिल्वर जुबिली फिल्में सिद्ध हुई हैं। लेकिन अधिक फिल्में साथ करने से दोस्ती भी अधिक गहरी हो जाती है। और हेमा की मां को दोनों की यह दोस्ती सुहानी नहीं। इसलिए आजकल वह धर्मेन्द्र की जगह शशि कपूर को आगे बढ़ाने के चक्कर में हैं उसने जितेन्द्र को मोहरा बनाया था। उसमें तो वह असफल रही शशि एक शादी शुदा और शरीफ इंसान हैं। और हेमा के आरंभिक काल में उन्होंने हेमा को बड़ा प्रोत्साहन दिया देखें, हेमा की मां इस लोकप्रिय जोड़ी (धर्मेन्द्र-हेमा) को तोड़ने में कहां तक सफल होती है? जबकि दोनों की अभी ‘प्रतिज्ञा’ ’शोले’ ’आज़ाद’ ’रज़िया सुल्ताना’ ’ड्रीम गर्ल’ आदि फिल्में आनी शेष हैं।

हेमा ने आज वैजयंती माला की खाली जगह भरके सिद्ध कर दिया है कि वह उसको तरह नर्तकी ही नहीं अच्छी अभिनेत्री भी हैं और यह हकीकत भी है कि हेमा मालिनी के कारण अब वैजयंती माला की कमी महसूस नही होती। आज हेमा का नाम बॉक्स ऑफिस हिट की गारंटी समझा जाता है।


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Mayapuri

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