अपने छोटे  से गाँव में, मैंने भी कभी  होली खेली थी!

1 min


बंबई में मेरा गाँव (हाँ, महात्मा गाँधी जैसा आदर्श गाँव चाहते थे, या पचास साल पहले भी बेहतर था) और इसे भारत के दिल और आत्मा का प्रतिनिधित्व करने वाले धर्मनिरपेक्ष या राष्ट्रवादी भारत के रूप में ब्रांडेड या समतल नहीं किया जाना था! –अली पीटर जॉन

मुंबई में मेरा गाँव था और इसे एक धर्मनिरपेक्ष या राष्ट्रवादी भारत के रूप में ब्रांडेड या समतल नहीं किया गया था क्योंकि यह भारत के दिल और आत्मा को रिप्रेजेंट करता था। ईस्ट इंडियन कम्युनिटी के नाम से जाने जाने वाले समुदाय के अधिकांश बंगलों के चारों ओर लगभग 30 घर ही थे, जो मुख्य रूप से ईसाई थे। उन्होंने अपने पूर्वजों द्वारा उन्हें सौंपी गई जीवन शैली का पालन किया, जो उसी गाँव में रहते थे। जल्द ही, जैसे-जैसे गाँव का औद्योगिकीकरण (इन्डस्ट्रीअलाइज्ड) होने लगा, मेरे गाँव में अधिक से अधिक लोग कोंडिविता के नाम से पहचाने जाने लगे, जो कि महाकाली गुफाओं और कोंडिविता गुफाओं से प्राप्त एक नाम था। कोंडिविता गाँव के अन्य निवासियों में बड़ी संख्या में मुसलमान थे, यूपी के भईया लोग थे, तमिलनाडु, मैंगलोर और गोवा के ईसाई थे और यहाँ तक कि आंध्र की कम्युनिटी थी जिन्होंने नई सड़कों के निर्माण से और गधे के दूध को बेचकर और भारत के विभिन्न हिस्सों से अन्य समुदायों में काम करके अपना जीवन यापन किया था।

सभी कम्युनिटीज शांति के माहौल में रहती थी और कम्युनिटीज के बीच कोई बड़े विवाद या झगड़े नहीं होते थे। और यह साबित करता था कि गाँव वास्तव में सदियों से धर्मनिरपेक्ष था, वहाँ विशाल गुफाएँ थीं जो सभी धर्मों के लोगों द्वारा देखी गईं थी, (एक हजार साल पुरानी चर्च), एक टूटी हुई मस्जिद और कई पुराने मंदिर थे जिनमे राम, हनुमान, गणपति और अन्य छोटे और बड़े देवताओं के सम्मान में बनी उनकी मुर्तिया हैं।

और गाँव के लोग हर त्योहार को एक साथ मनाते थे। क्रिसमस, ईद, दिवाली, ईस्टर और गणपति महोत्सव जैसे त्योहारों को मनाने के लिए हिंदू, मुस्लिम, सिख और अन्य समुदाय एक साथ आते और इसे सेलेब्रेट करते थे। लेकिन एक त्योहार जो सच्ची भावना के साथ मनाया गया था वह होली था!

मैं तब केवल 12 साल का था जब मुझे पहली बार महसूस हुआ कि होली क्या हैं और होली का जश्न कैसे मनाया जाता है। मैंने इस रंगीन त्योहार के दौरान पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को इसका आनन्द लेते और होलिका को पूजते देखा था और मैं भी इसका हिस्सा बनना चाहता था, लेकिन मेरी माँ ने कहा कि यह एक ऐसा त्यौहार है जो रंग-बिरंगा दिखता है, लेकिन इसे चोट भी लग सकती है और तुम जल भी सकते हो और इसलिए मुझे समारोहों में हिस्सा लेने के लिए अपनी बारी का इंतजार करना पड़ा। और फिर मेरी बारी आई।

मेरी माँ का घर सभी समारोहों का केंद्र बन गया था। उनके घर में रंग को स्टोर कर दिया गए था और फिर सब ‘भाँग’ तैयार करने लगे, जो एक आत्मा-संतोषजनक ड्रिंक थी जिसे मेरे परिसर में रहने वाले लोगों ने कहा था की, ‘भाँग का नशा’ एक आदमी या औरत को स्वर्ग ले जाता हैं। और मेरी माँ के घर में ही रंगीन पानी की सभी बाल्टी और अन्य चीजे रखी गई थी।

समारोह की शुरुआत एक रात पहले एक विशाल अग्नि के जलने से हुई, जो उन्होंने कहा कि यह सभी बुराई और पाप को जलाने का एक तरीका है। जिस तरह से वहाँ कुछ भईया लोग महिलाओं और उनकी बेटियों के खिलाफ सभी प्रकार की गंदी गालियां दे रहे थे, इसे देख कर मुझे झटका लगा था क्योंकि मैं एक अच्छा ईसाई था जिसे मेरी माँ ने झूठ, लूट और गाली न देने के लिए प्रशिक्षित किया था। लेकिन यह एक ऐसा त्योहार था जिसके लिए हम लड़के कुछ भी कर सकते थे या कुछ भी त्याग सकते थे। और आग के जलने के दौरान हम सब ने ‘सा रा सा रा रा’ चिल्लाया था।

अगले दिन यह होली हर तरफ थी। हर सड़क, हर गली और हर घर की हर दीवार हर तरह के रंगों से ढकी हुई थी जहा किसी भी घर को बख्शा नहीं गया था और कुछ घरों में गटर के पानी और यहां तक कि अधिक गंदे तरल पदार्थ के साथ होली खेली गई थी। हम लड़कों ने भी भांग के कुछ गिलास पिए और पूरे दिन हँसते रहे बिना यह जाने कि हम क्यों हंस रहे थे। वह 2 दिन ऐसे दिन थे, जिनके लिए हमने साल भर तैयारी की और पैसे भी बचाए थे। दोपहर में, हम कभी-कभी क्रिकेट मैच खेलते थे, बिना यह जाने कि कौन बैटिंग कर रहा है, कौन बोलिंग कर रहा है, कौन कैप्टन है और वहाँ दो अंपायर यह बिल्कुल नहीं देख पा रहे थे की अंत में कौन हारा और कौन जीता था। और यह होली का जादू था!

लेकिन हमारे इस तरह के होली समारोह लंबे समय तक चलने वाले नहीं थे। लास्ट टाइम जब मैंने होली खेली थी, तब फिल्म इंडस्ट्री के कई डांसर्स और जूनियर आर्टिस्ट हमारे गाँव में रहने आए थे और उन्होंने होली के सभी रंगों को बदल दिया था और रंगों को बदसूरत बना दिया था। इसके बाद भूमि हड़पने वाले कुछ छोटे और बड़े लोग आए जिन्होंने मेरे गाँव में सभी बेहतरीन जगहों की खरीदारी की और धीरे-धीरे वहाँ से होली का जादू दूर होने लगा। और अब केवल उन शानदार और रंगीन होली के दिनों की यादें ही रह गई हैं।

जमाना बदल रहा है, यह तो वक्त का तकाजा हैं. लेकिन क्या हमारे त्यौहार, हमारी संस्कृति और हमारी आत्माओं का रंग भी बदल जाएगा?

अनु-छवि शर्मा 


Like it? Share with your friends!

Mayapuri

अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिये