राज कपूर जैसे होली मनाता था आज कोई नहीं मना सकता है – अली पीटर जॉन

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राज कपूर जैसे होली मनाता था आज कोई नहीं मना सकता है एक रावण था जो सुभाष घई की होली में भांग घोलता था। अमिताभ हर आदमी को गले लगाता था,  आज उन्हें गले लगाने से डर लगता है उनकी भारी सिक्योरिटी की वजह से आज हर पिचकारी में एके-47 दिखती है, हर गुब्बारे में डर भरा हुआ लगता है और सारे रंग डर कर एक रंग हो गये हैं, लाल रंग, खून का रंग, जमाना कैसे कैसे बदलता है?

पहली बार मैंने आर.के स्टूडियो में होली उत्सव के बारे में अपने गुरु के.ए अब्बास से सुना। राज कपूर के.ए अब्बास को ‘माई व्यॉस एंड कंसिएन्स’’  कहा करते थे। उन्होंने मुझे बताया कि आर के स्टूडियो में होली उत्सव का मतलब भांग व फूड फेस्टिवल था। आर के स्टूडियो में स्थायी से कुंआ बनाया गया। जिसमें हर किसी को डुबकी लगाने पर मजबूर कर दिया जाता था, जबरन इस कुंए में सबको डाला जाता था। मैंने पहली बार ‘स्क्रीन’ मैगजीन में आर के स्टूडियोज में होली उत्सव के बारे में पढ़ा उस समय ‘स्क्रीन’ मैगजीन पच्चीस पैसे में मिलती थी। इसके लिए मैं अपने पड़ोसी पांडेय जी को धन्यवाद करता हूं वह एक ड्राइवर थे जो ‘स्क्रीन’ मैगजीन की अनेकों कॉपीज मुंबई में बांटते थे। मुझे क्या पता था कि उसी ‘स्क्रीन’ मैगजीन के लिए मैं काम करूंगा व आर के स्टूडियो के भव्य होली उत्सव का हिस्सा बंनूगा।

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मुझे याद है कि मेरे मुख्य रिपोर्टर आर.एम कुमताकर ने मुझसे कहा कि मैं संपादक श्री एस एस आर पिल्लई द्वारा आर के के होली उत्सव को कवर करने के लिए चुना गया। मैं अभी भी एक नौसिखिया था, यह मेरे लिए सम्मान की बात है कि मेरे करियर के पहले ही तीन महीने के दौरान मुझे एक इवेंट को कवर करने का सम्मान मिला। श्री कुमताकर ने मुझे चेतावनी दी थी कि त्योहार को कवर के लिए मैं अच्छे कपड़े ना पहंनू, कलाई घड़ी ना बांधु व अच्छे चप्पल या जूते का इस्तेमाल ना करूं। लेकिन वास्तव में उन्होंने यह नहीं बताया कि क्यों मुझे इन सभी निर्देशों का पालन करना चाहिए। लेकिन मैंने उनकी सलाह को बहुत गंभीरता से कबूला।

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मैं आर के स्टूडियो पहुंचा वहां सुरक्षा गार्ड ने मुझसे बिना कोई सवाल किए मुझे गेट में प्रवेश की अनुमति दी यह देख मैं हैरान रह गया। मैंने अंदर जाकर देखा कि एक आदमी जो पूरे रंग में डूबा हुआ था, बिलकुल भी पहचान में नहीं आ रहा। मैं उसे पहचानने की कोशिश कर रहा था, पर मैं उसे पहचान नहीं पाया। वह इंसान मेरी और बढ़ा व मुझसे लिपटा फिर एक शब्द कहे बिना उसने मुझे उठा लिया। वह कुंए की ओर मुझे ले गया व उसमें मुझे पटक दिया। यह मेरा पहला अनुभव था और यह क्या एक अनुभव था! मुझे याद है कि मुझे कुएं में किस तरह तीन बार गिराया गया व मैं सांस के लिए हांफ रहा था। मैं उस कुएं से निकलने की कोशिश करने लगा कि उस व्यक्ति ने फिर से मुझे कुंए में पटक दिया व जोर से चिल्लाया “होली है”। उस व्यक्ति की आवाज से मैं उसे पहचान गया जो कि पूरे रंग में निपटा हुआ था। उसके हाथ में बीयर की एक बोतल भी थी। वह ऋषि कपूर थे, वह कपूर परिवार के पहले ऐसे कपूर थे जिनसे मैंने मुलाकात की थी व मेरे सबसे दोस्त बने। उन्होंने तुरंत एक विशाल सूखे तौलिये से मुझे कवर किया। साथ ही उन्होंने मेरे हाथ में बीयर की दो बोतलें देकर धक्का दे दिया व कहा कि बस दो बोतल बीयर एक घूंट मे पी जाओ और इसे पीकर तुम खुद को दुनिया की ऊंचाईयों पर महसूस करोगे। मैं उनकी बात का इस तरह पालन कर रहा था जैसे एक हताश मरीज अपने डॉक्टर का पालन करता हैं। मैंने उस बोतल को पी लिया जो कि बाद में मुझे पता चला कि वह बीयर नहीं बल्कि व्हीस्की थी। अचानक मैंने खुद में एक परिवर्तन महसूस किया, मैं अब डरा हुआ महसूस नहीं कर रहा था, अब मेरा मूड स्टूडियो से बाहर जाने का नही कर रहा था जैसा कि पहले कर रहा था। मैं चिल्ला रहा था, गाना गा रहा था व बहुत ही अच्छा महसूस कर रहा था। पहली बार था कि मुझे शराब की ताकत का एहसास हुआ। मुझे ऐसा लग रहा था कि जैसे कि मैं किसी ओर ग्रह में पहुंच गया हूं जहां चारों ओर मनुष्य एक बड़े परिवर्तन के माध्यम से चले जा रहे थे।

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मैं एक पागलपन के बीच में था कि मुझे अचानक एहसास हुआ कि मैं ड्यूटी पर था और मुझे रिपोर्ट करना था कि उत्सव के दौरान क्या- क्या हो रहा था। मैं सामान्य होने की पूरी कोशिश कर रहा था तब मैंने महान शोमैन राज कपूर व उनकी पत्नी कृष्णा को देखा जो राज्य के राजा- रानी की तरह विशाल कुर्सियों पर बैठे हुए थे। लगभग पूरी इंड्रस्टी ही उनकी ओर चली जा रही थी उस शोमैन के पैरों को छुने के लिए उसके बाद व सब उस भीड़ में शामिल हो गए। मैंने वहां देखा कि राज कपूर के लिए एक प्रसिद्ध कत्थक नृत्यांगना सितारा देवी एक घंटे से भी ज्यादा समय से नाच रही थी। साथ ही पंजाब से प्रसिद्ध भांगड़ा डांसर जोगिंदर सिंह भी अपने डांस से सबका मनोरंजन कर रहे थे। राज कपूर की उम्र बढ़ रही थी, राज कपूर काफी नशे में थे वह बोतलों को एक ही घूट में पिये जा रहे थे। इसके बाद मैंने रणधीर कपूर को देखा जिन्हें चार लोगों द्वारा एक मर्सिडीज में बैठाकर घर ले जाया जा रहा था। बाद में मैंने महसूस किया कि वह किसी भी त्योहार पार्टी या अवसर पर हमेशा सबसे पहले ड्रिंक करते थे। होली का समारोह देर शाम तक चलता रहा। मैंने आर के में तीन और होली का जश्न मनाया था। रणधीर कपूर जो कि परिवार के प्रवक्ता थे हमेशा ही मुझे अपने परिवार का हिस्सा मानते थे। ऐसा एक भी आर के के परिवार में परिवार में इवेंट नहीं हुआ जहां मुझे आमंत्रित ना किया गया हो व मुझे अभी भी एक ही विशेषाधिकार है।

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लेकिन सभी अच्छी चीजों का अंत कभी ना कभी होता है, आर के होली के साथ मुझे वहां की दिवाली व दशहरे का भी इंतजार रहता जो कि अब हमेशा के लिए समाप्त हो गया। राज कपूर ‘राम तेरी गंगा मैली’ की शूटिंग के दौरान गंभीर रूप से बीमार हो गए थे जो कि उनकी आखिरी फिल्म थी बतौर निर्देशक। उन्होंने दादा साहेब फाल्के पुरस्कार जीता, उस समय भी वह इतने बीमार थे कि भारत के राष्ट्रपति श्री आर वेंकटरमन ने प्रोटोकाल तोड़ा व जहां राज कपूर व उनकी पत्नी बैठी थी वहां गए व उन्हें पुरस्कार से सम्मानित किया। शोमैन मौके पर ही गंभीर रूप से बीमार पड़े व उन्हें नई दिल्ली के एस्कॉर्ट्स अस्पताल में भर्ती कराया गया। जो कि नंदाज का था(राज की सबसे बड़ी बेटी रितु की शादी नंदाज परिवार में हुई था)। उन्होंने जीवित रहने के लिए एक बहुत बड़ी लडाई लड़ी। लेकिन मौत की ताकत के आगे वह झुक गए व हिंदी सिनेमा के सबसे रंगीन अध्यायों में से एक का अंत हो गया। उनकी मौत के बाद आर के में कई तरह का परिर्वतन आया।

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लेकिन सबसे कठोर परिवर्तन था होली के त्योहार का,जिन्हें कपूर की होली कहा जाता था। वो पूरी तरह से खत्म हो गया था। उन गौरवशाली होली के दिनों का सिर्फ एक ही गवाह है और वो वह आर के का कुआं जो कि पूरी तरह से सुख गया है। जो कि एक शोक की तरह वहां खड़ा है।

वर्षों बाद सुभाष घई को ‘शोमैन’ का नाम दिया गया। उन्होंने बड़े सितारों के साथ बड़ी फिल्में बनाई। बॉक्स ऑफिस पर इतिहास कायम किया। शोमैन की शानदार पार्टियों के बारे में सभी लोग बातें भी किया करते थे। जब उन्होंने मड आइलैंड में अपना बंगला बनवाया तो उन्होंने होली के जश्न का समारोह शुरू किया। यह जश्न बिलकुल उसी तरह मनाया करते थे जिस तरह से आर के में मनाया जाता था। इंडस्ट्री के सभी लोगों को बुलाया जाता व इंडस्ट्री के बाहर के लोगों को भी आमंत्रित किया जाता था। होली का उत्सव आर के स्टूडियो की होली की तरह ही मनाया जाता था। अब वहां कई गायक व डांसर्स लाइव परफॉर्म किया करते थे। जल्द ही किसी कारण से यहां होने वाला होली समारोह भी समाप्त हो गया। सभी होली समारोह में नियमित रूप से हिस्सा लेने वाले रणधीर कपूर ने इस बारे में कहा कि “मैं होली के इस शुभ दिन पर यहां आता था क्योंकि मुझे ऐसा लगता जैसे मैं अपने पिता के पार्टी का हिस्सा बन रहा हूं सुभाष घई सहीं मायनों में शोमैन के शीर्षक के उत्तराधिकारी रहे “सुभाष घई के लिए यह सबसे अच्छा तारीफों में से एक रहा।

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इसके बाद बच्चन परिवार का समय आया। अमिताभ बच्चन ने बड़े पैमाने पर प्रतीक्षा में होली का जश्न मनाने का फैसला किया। अमिताभ और जया व्यक्तिगत रूप से हर किसी को होली के समारोह के लिए आमंत्रित किया करते थे। अमिताभ और पूरा बच्चन परिवार व्यक्तिगत रूप से हर अतिथि का स्वागत किया करते थे व सभी का व्यक्तिगत ख्याल रखते थे। बच्चन परिवार की पार्टी एक बार नवाबों और महाराजाओं द्वारा आयोजित की जाती थी। अमिताभ बच्चन की मां तेजी बच्चन इस समारोह की मुख्य आकर्षण रहा करती थी। उनकी मां नब्बे साल की थी वह विशेष रूप से किन्नरों के साथ गेट के बाहर डांस करने की कोशिश किया करती थी। बच्चन परिवार में होली का जश्न ज्यादा समय तक नहीं चला क्योंकि परिवार के लोग शारीरिक रूप से स्वस्थ नहीं रहा करते थे व कुछ अज्ञात बल भी इसका कारण रहे। पहली बार होली का महोत्सव तब हुआ जब जब उनके पिता डॉ हरिवंशराय बच्चन बीमार हो गए और उनका निधन हो गया। दूसरी बार उनकी मां श्रीमती तेजी बच्चन के बीमार पड़ने और निधन होने की वजह से होली का जश्न नहीं मनाया गया। तीसरी बार 1993 में मुंबई पर हुए आतंकी हमले की वजह से समारोह का आह्वान किया गया था।

अमिताभ एक उदासीन मूड में चले जाते थे जब वह इलाहाबाद की होली के समय, उनकी मां जब तक जीवित रही तब की होली का समय याद किया करते थे। यश चोपड़ा अपने जुहू में बंगला “आदितोदय” ( उन्होंने अपने घर का नाम उसकी दो बेटे आदित्य और उदय के नमा पर रखा था) में अपने परिवार के सदस्यों व अपने करीबी दोस्तों के साथ होली मनाया करते थे। यश चोपड़ा का होली जश्न बहुत ही ग्रैंड हुआ करता था। उनके गुजर जाने के बाद उनके घर में सभी समारोहों में भी एक ठहराव आ गया। जिस तरह से एक के बाद एक उत्सव का अंत आ रहा है।

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हर जगह कुछ अजीब सा लग रहा है। होली, दीवाली सभी जातियों, धर्मों और समुदायों द्वारा मनाये जा रहे त्योहारों का जश्न व रंग अपना आकर्षण खोता जा रहा है क्योंकि हर कोई बस त्योहार मनाने की औपचारिता भर कर रहा है। यह वो समय है कि जब हमें इन समारोहों का अर्थ ढूंढना है ना कि उन्हें मजे करने के लिए, इवेंट के उद्देश्यों, मीटिंग्स के उद्देश्यों के लिए मनाना चाहिए। यह वो समय जब हमे इस दिन को एक पवित्र दिन में बदलना है। नई पीढ़ी केवल सिर्फ आनन्द, उल्लास और तुच्छता में दिलचस्पी रखती है। वह इस त्योहार के अर्थ को समझने की कोशिश नहीं करते जो कि बुराई पर अच्छाई की विजय के पराक्रम के लिए मनाई जाती है। पुरानी पीढ़ी भी होली का जश्न मनाने के लिए पुरानी है और नई पीढ़ी त्वचा के रंग को बर्बाद करने का जोखिम नहीं उठाती। वह खुद को मैनटेन करने में ज्यादा विश्वास रखते हैं। वह होटल, पब, डिस्को में ही होली का जश्न मनाते हैं, साथ ही विभिन्न सुंदर स्थानों पर एक समूहों के साथ जाते जहां विभिन्न होटलों और इवेंट प्रबंधकों द्वारा उनके लिए होली के समारोह का आयोजन किया जाता था।


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Mayapuri

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