मैं ओरिजिनल हूँ, कोई उधार की सोच नहीं रखती- कंगना रनौत

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कंगना रनौत को लेकर पिछले दिनों जो कुछ भी गलत धारणायें, नकारात्मक प्रचार और कंफ्यूजन का माहौल गर्म था उस मुद्दे को लेकर कंगना सारी सच्चाई बयाँ करते हुए बताती है कि जो कुछ भी हुआ वो इस तरह क्यों हुआ। बड़े अफसोस के साथ कंगना बताती है कि किस तरह उसे हर बार, लगातार गलत समझा जाता रहा है, गलत ढंग से उनकी छवि प्रस्तुत की जाती रही है और सबसे ज्यादा अफसोस की बात यह कि उनकी कही बातों को तोड़ मरोड़ कर पेश किया जाता रहा है।

आपने अनेक बार उस ‘एक वर्ग’ को इंगित करते हुए उन्हें बिकाऊ मीडिया, लिबरल मीडिया, देशद्रोही, वगैरा कहा। आपको ज्ञात होगा कि इस तरह पूरी मीडिया को एक शब्द में, इस तरह पंचिंग बैग के लहज़े और रूप में व्याख्या करना बिल्कुल वैसा ही है जैसे बॉलीवुड को एक शब्द में समेट दिया जाता है। दरअसल बात क्या है? आपको प्रेस से अपने करियर में काफी अच्छा प्रतिसार मिलता रहा है।

जी हाँ, प्रेस का काफी योगदान रहा मेरे ब्रैंड के निर्माण में। वे मेरे करियर के नींव है, मेरी धरातल है। मेरा कोई  प्रतिलिपि नहीं था। प्रेस ने खुद से मुझे वो स्थान दिया जहाँ उन्होंने मुझे स्थापित किया जो उनकी उदारता थी क्योंकि इससे पहले उन्होंने स्टार्स के अलावा कभी किसी एक्टर को ऐसा रेस्पेक्ट नही दिया। जातीय तौर पर मेरे पास मीडिया को धन्यवाद देने का यथेष्ट कारण है क्योंकि मैं हमेशा से ही मीडिया की डार्लिंग रही हूं। लेकिन मीडिया का एक खास वर्ग है जो मेरे खिलाफ एकजुट हुए हैं। इनमें वो लोग है जिनके खिलाफ मैंने किसी ना किसी कारण आवाज़ उठाई थी जिसकी वजह से वे सब एकजुट होकर एक गिल्ड बना रहें है। जब ये गिल्ड बनी थी तब इसमें जुम्मा जुम्मा पन्द्रह सोलह लोग थे जिनमें से ज्यादातर तो  एक्टिव, कार्यशील पत्रकार भी नहीं थे। कई तो पैसे खिलाये हुए पी आर एजेंसियाँ भी थी जो मेरे खिलाफ एजेंडा चलाती रही है। खैर मैं मानती हूँ कि उन लोगों को ‘द मीडिया’ कह कर संबोधित करना मेरे लिए सही नहीं है, मुझे सिर्फ उन लोगों से समस्या है जो पत्रकारिता की स्वतंत्रता का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं जबकि उन्हें मालूम ही नहीं कि विश्व के स्वतंत्र मीडिया की क्या भूमिका होती है क्योंकि यही वह लोग हैं जो मीडिया की स्वतंत्रत और सेकुलर होने के मायने को बदनाम कर रहे हैं। आप अपने को लिबरल नहीं कह सकते अगर आप एनवायरनमेंट डे या अन्य इशूज, जो लिबरल मीडिया उठाती है, उनका मजाक बना दो। मैं ऑब्जेक्टिव क्रिटिसिजम को स्वीकार कर सकती हूं भले ही मैं कोई अन्य आईडियोलॉजी को मानती हूं, लेकिन क्या मुझ में इतना भी ज्ञान नहीं है कि मैं समझ सकूं कि दूसरी तरफ क्या चल रहा है?  इस तरह से ही तो मैं अपने जीवन के पर पर्सपेक्टिव  को मजबूत कर सकती। इतनी सोच तो मुझ में है। हो सकता है कि मैं कम्युनिकेशन की चतुराई में माहिर नहीं हूं लेकिन इतनी समझ तो मुझ में है कि मैं समझ सकूं कि ऑपोजिट पर्सपेक्टिव की कितनी महत्वता है अपनी सोच और ऑडियोलोजी के लूपहोल्स ढूंढने में।

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अगर आपको लगता है कि कुछ लोग आपके साथ अच्छा नहीं कर रहे हैं, आपके खिलाफ बरसों से षड्यंत्र रचते रहें हैं और वे लोग या तो आप के विरुद्ध खड़े लोगों द्वारा पोषित हो रहे हैं या आपको पसंद नहीं करते हैं तथा वे लोग कहते हैं कि वे आपको कभी कवर नहीं करेंगे तो क्यों आप एक वीडियो जारी करके कहती हैं कि आपको खुशी है कि वह आपको कवर नहीं करेंगे और फिर यह भी कहती हैं कि आप उन्हें लीगल नोटिस भेजेंगे यदि वे आपको कवर नहीं करेंगे?

दरअसल यह 15 16 लोग जो मेरे खिलाफ गुट बनाकर खड़े हैं, जब वे प्रशासक बन गए तो मैंने कहा अच्छी बात है, लेकिन फिर अब इन लोगों ने इसे मीडिया वर्सेस कंगना बना दिया है तथा और दो तीन सौ लोगों को इकट्ठा कर लिया है। अब मेरे प्रोड्यूसर्स पर प्रेशर आने लगा है क्योंकि वह हमारी फिल्म को भी कवर नहीं कर रहे हैं। अगर उन लोगों ने सिर्फ मुझे बैन किया होता तो मुझे जरा भी परवाह नहीं होती लेकिन उन लोगों ने कई और लोगों को जोड़ कर एक गिल्ड खड़ी करके सभी लोगों को मेरे खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया है और कहा कि ऐसा वे मीडिया के वेलफेयर के लिए कर रहे हैं। लेकिन असल में वह गिल्ड सिर्फ मेरे पीछे पड़ी है।पत्रकारिता की भलाई के लिए कुछ नहीं कर रहे है।

लेकिन वे दूसरे पत्रकारों के लिए क्या कर रहे हैं क्या नहीं कर रहे हैं इससे आपको क्या लेना देना? आपका उनके साथ इस तरह डील करने का क्या औचित्य है?

मेरा मानना है कि अगर आपको किसी को बैन करना है तो बैन कीजिए लेकिन आप पूरी मीडिया को अपने साथ खींचकर उसे कंगना वर्सेस मीडिया क्यों बना रहे हैं। यह ‘कंगना वर्सेस मीडिया’ नहीं है, यह ‘मेरे वर्सेस उन चंद लोगों’ का मामला है जिन्हें कुछ मूवी माफिया सपोर्ट देते हैं। इसीलिए यह मुद्दा मेरे और मीडिया का नहीं है। मुझे मीडिया से कोई समस्या नहीं है। इनमें मेरे कई बेहतरीन मित्र भी हैं। मैं वह अभिनेत्री हूं जिसे  भरपूर मीडिया सपोर्ट मिला है। भला मैं उसमें समझौता क्यों करूं? मैंने अपने प्रत्येक इंटरव्यू में कहा कि मुझे क्रिटिसिज्म से ज्यादा प्यारा और कुछ नहीं है और वो मेरे बेस्ट फ्रेंड है जो जेन्युइन, सत्य प्रिय मीडिया है। मैंने यह भी कहा कि अगर विरोधी ना हो तो आईडियोलॉजी भी नहीं रहेगी भले ही वे मेरी आलोचना करने वाले ही क्यों ना हो।अगर 16 लोग मुझसे नफरत करते हैं तो ढेरों लोग मुझसे प्यार भी करते हैं। मैं उनके और मेरे बीच कोई गलतफहमी पनपने देना नहीं चाहती। मैं सिर्फ उन 16 लोगों को इस तरह अपने से दूर रखना चाहती हूं ताकि वे मेरे आस-पास भी नजर ना आए।

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अगर आप कहते हैं कि लोग आपके प्रति पक्षपात वाला रवैया रखते हैं तो हो सकता है उनके साथ पहले आपका कुछ हुआ होगा, लेकिन अब आप उनके लिए ‘एंटी नेशनल’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं और उसे अपनी फिल्म ‘मणिकर्णिका’ के संदर्भ में लाते हैं तो यह कहां तक वैलिड है? ‘मंगल पांडे’ भी रानी लक्ष्मीबाई की तरह एक एमिनेंट फ्रीडम फाइटर थे, आमिर खान ने उन पर फिल्म बनाई थी, जो नहीं चली तो अगर आप कहें कि मंगल पांडे फिल्म नहीं चली है या अगर आप उनकी भूमिका पर मुंह बनाते हैं तो इसका मतलब यह तो नहीं कि हम उस ऐतिहासिक शहीद मंगल पांडे की यादों का अपमान कर रहे हैं और इसलिए आमिर खान से हमें माफी मांगनी चाहिए?

मैं एक्सप्लेन करती हूं। एक शहीद जो देश का धरोहर है वह सबका अपना है। सबको उन पर फिल्में बनाने का हक है। मैंने किसी को उसके राइट्स पाने के लिए पैसा नहीं दिया है। वह पब्लिक डोमेन में है इसलिए वह फिल्म सबका हक है। जो भी हो, उस पर आलोचना करना भी है तो आमतौर पर जैसे आलोचक या दर्शक करते हैं वैसा करना चाहिए की फिल्म अच्छी या खराब बनी है, वगैरह, ऐसी आलोचना स्वीकार्य है, लेकिन ऐसा ना करके शहीद के नाम को विकृत करना तो ठीक नहीं है। आप भगत सिंह या मणिकर्णिका को विकृत नहीं कर सकते और वो भी यह बताए बिना कि फ़िल्म में क्या सही नहीं है। मैं सिर्फ यह कहने की कोशिश कर रही हूं कि किसी शहीद पर ट्रोल करने का  किसी को क्या अधिकार है? सिर्फ इसलिए कि वह पत्रकार है? क्या यह स्वीकार्य है? किसी नेशनल हीरो का अपमान करने या उनका मजाक उड़ाने का चलन क्यों बन गया है और वह स्वीकार क्यों हो? फिल्म पसंद ना आना वो चलता है, लेकिन उस ट्वीट में सिर्फ ये लिखा था कि उस निर्देशक के विवादों के चलते उसकी अगली फिल्म का नाम होना चाहिए ‘मणिकर्णिका हा हा हा’। अरे, थोड़ा तो सम्मान होना चाहिए शहीद के लिए। अगर मैं सेलिब्रिटी होकर इन बातों को नजरअंदाज करूँ, ये सोचकर कि मेरे पीछे वैसे ही बहुत कॉन्ट्रोवर्सीज़ चल रही हैं तो इसलिए अच्छा है कि आज यह बात छोड़ दूँ, कल वो बात छोड़ दूं, बस सिर्फ आगे बढ़ने की सोचूँ , तो  मैं किस तरह की व्यक्ति कहलाऊंगी एक समय के बाद?  इसलिए जब मैंने उस जेंटलमैन को देखा तो पूछ लिया कि आप यह क्या कर रहे हो यार? तो यह कहकर मैंने उस व्यक्ति का अपमान कैसे किया? मैं खुद महसूस कर रही हूं कि वह वेंडेटा, वह एजेंडा अब जाकर बाहर आया है। वो वीडियो उसी सिलसिले में है।

 

चंद मीडिया कर्मी ही नहीं बल्कि कई ऐसे लोग, जो अक्सर न्यूट्रल रहते हैं, वह लोग भी आपके और आपकी बहन द्वारा इस्तेमाल किए गए बैर युक्त टोन तथा भाषा को लेकर चिंतित हो गए हैं।

मैंने पर्सनली उन पीआर लोगों से संपर्क करके अपने डिफेंस में बात करने की भी कोशिश की थी जो मेरे खिलाफ नकारात्मक खबरें फैलाते रहे हैं, क्योंकि लोग मुझसे अक्सर पूछते हैं कि आपके बारे में ऐसी बातें क्यों फैल रही है। वो लोग अगर मेरे साथ काम ना करना चाहे या मैं उनके साथ काम करना ना चाहूं तो कोई बात नहीं। इस हिसाब से हमें एक दूसरे के रास्ते में नहीं आना चाहिए। मैं तो नहीं आती उनके काम के बीच, फिर वह लोग मुझे मेरा काम क्यों नहीं करने दे रहे हैं? मेरा इस तरह का प्रतिकार डिप्रेशन के कारण है। यह सोचना आसान है कि वो लोग किसी के प्रति इसलिए दुश्मनी निभा रहे है क्योंकि उनके पास कोई दूसरा काम नहीं है। लेकिन मुझे भी तो वह बेनिफिट ऑफ डाउट मिलना चाहिए कि मैं अगर इस तरह रिएक्ट कर रही हूं तो जरूर मुझे  भी दीवार से पीठ लगने तक पुश किया गया होगा।

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बड़े बड़े लोग आपके साथ काम करना नहीं चाहते।

ठीक है अगर बड़े लोग मेरे साथ काम करना नहीं चाहते हैं तो ना करें , उनका अपना सर्कल है, इसलिए मैं भी अपना काम करती जा रही हूं। लेकिन वे लोग मुझे मेरा काम भी करने नहीं देते हैं। वह लोग चारों तरफ से मुझे घेरने, कुचलने और हिट करने में लगे हैं। हर रोज मैं अपने खिलाफ छपे 5 से 6 खबरों से लड़ रही हूं। कभी एकता से मेरी लड़ाई की खबर, कभी अश्विनी के सेट को बर्बाद करने की खबर, कभी मणिकर्णिका के निर्माता के पैसे हथियाने की खबर, हर रोज एक नई तरह की खबर का सिलसिला देखने में आता है। यह एक हद तक इतना ज्यादा मानसिक रूप से थका देने वाली बात है कि कई बार मैं यह सोचती हुई रो पड़ी थी कि यह सिलसिला कब रुकेगा। यह सही है कि आज कोई मेरे काम को लेकर बात नहीं करता, क्योंकि यह अफवाहों का सिलसिला खत्म ही नहीं हो रहा है। अश्विनी जी का कहना है कि वे मेरे साथ एक और फिल्म में काम करना चाहती है, मणिकर्णिका के लेखक विजयेंद्र प्रसाद मेरे साथ एक और फिल्म ‘जयललिता’ कर रहे हैं, प्रसून सर मेरी अगली फिल्म में मेरे साथ काम कर रहे हैं, तो फिर वह कौन लोग हैं जो मेरे साथ काम नहीं करना चाहते या मेरे साथ जिनको कोई समस्या है? ‘मणिकर्णिका’ ने जबरदस्त सफलता हासिल की है, उसमें मेरे परफॉर्मेंस की भूरी भूरी तारीफ हुई है लेकिन खबरों में कभी इस बारे में कोई चर्चा नहीं की गई। मेरे बारे में सिर्फ नकारात्मक खबरें जारी होती है। क्या इस बारे में किसी ने सोचा? लेकिन मुझे पता है कि कौन ऐसी खबरें फैलाता है , कौन अपना पैसा और समय मेरे खिलाफ खबरें फैलाने के लिए मुहैया कराता है। तो फिर क्या मैं आवाज ना उठाऊँ?  मैं चुप बैठी रहूँ? क्या मैं अपने जीवन के लिए, अपने सर्वाइवल के लिए कुछ भी ना करूं? मैं जरूर करूंगी। भले ही ऐसा करते हुए मैं डेसपरेट दिखूँ, ऐसा मैं इसलिए  दिख रही हूं क्योंकि मुझे उसी तरीके से सताया जा रहा है। मैं सब जानती हूं कि ये सब कौन कर रहा है। ऐसा नहीं है कि मैं बिना कारण प्रतिकार कर रही हूं। मेरे खिलाफ गंदी कहानियों का एक सिलसिला जारी है, सिर्फ मुझे नीचा दिखाने के लिए। इन लोगों को मालूम पड़ना चाहिए कि वह जो करते जा रहे हैं वह करना जारी नहीं रख सकते। हर रोज सुबह नींद से जाग कर अपने व्यवसाय और नए प्रोजेक्ट को बर्बाद करने वाले आठ दस खबरों को देखना सुनना वाकई बहुत कठिन होता है। नहीं सहा जाता है हर रोज का यह सिलसिला।

इस तरह के पर्सनल झगड़े टंटे के रास्ते में उतर पड़ना क्या आपके लिए गैर जिम्मेदाराना नहीं है? जबकि आप की एक नई फिल्म प्रदर्शित होने वाली है और जो कुछ भी आप कर रही हैं वह आपके को-स्टार,  आप के निर्माता और बहुत सारे लोगों पर असर डाल रहा है?

मैं जिंदगी में इतना ज्यादा हिसाबी नहीं रही। अगर आज मैं चुप रह गई तो आगे चलकर मुझे किसी को कुछ कहने का हक नहीं रहेगा। अगर आज मैं इस पोजीशन और इस प्लेटफार्म में रहते हुए भी यह सोचकर चुप हो जाऊं की ‘जाने दो, किसी ने हमारे देश के किसी शहीद का नाम विकृत किया है तो मुझे क्या लेना देना, मुझे अपने करियर का सोचना चाहिए’ तो मैं एक बनावटी, फेक इंसान हूं, अगर मेरी ये सोच रहेगी तो मैं वह इंसान नहीं जो मैं अपने आप को मानती हूं। मैंने जो प्रतिक्रिया प्रकट की, वह उस व्यक्ति और उस जैसे बहुत से लोगों (जो अपने ओहदे का अपमान करते हैं) के प्रति मेरी स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी। अगर मैं किन्ही बातों में यकीन रखती हूं और मैं उसे एक्सप्रेस करूं तो बुरा क्या है? मैं यह नहीं मानती कि फिल्में इंसानों से बढ़कर है। सच पूछो तो मैं एक ऐसे कैंसर से लड़ाई कर रही हूं जो मेरे कार्य क्षेत्र में फैलता जा रहा है। जैसे कि मेरी एक फिल्म ‘पंगा’ की एक को-स्टार ने मुझे बताया कि उसे रोज फोन करके यह समझाया जाता है कि “कंगना के साथ काम मत करो, वह तुम्हारी जिंदगी बर्बाद कर देगी।” कमाल है, लोगों को फोन करके समझाया जा रहा है कि कंगना के साथ काम मत करो, कंगना तुमसे तुम्हारी फिल्में छीन लेगी, तुम्हारा अपमान करेगी – – ब्लाह ब्लाह, ब्लाह। शायद वह को-स्टार भी यही सोच रही होगी कि वह दिन और वो परिस्थिति कब आती है। लेकिन आखिर में उसने कहा कि “मुझे तो आप मेरी छोटी बहन जैसी ही लगी”। यह जो हैरेसमेंट का सिलसिला शुरू किया गया है, वह लगातार चलता जा रहा है, रुकने का नाम नहीं ले रहा है। अब बताइए, ऐसी हालात में मैं किस तरह रिएक्ट करू?  क्या कोई प्रतिक्रिया ना दूं? क्या कुछ भी ना करूं? सच बताऊं तो मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि क्या सही रास्ता अपनाया जाए। यह कोई कोर्ट में ले जाने वाला मामला नहीं है क्योंकि इसमें भी लोग कॉल करके बोल सकते हैं कि इससे सावधान रहना, वगैरा-वगैरा (हंस पड़ती है कंगना) लेकिन ऐसा किया जा रहा है बहुतों से,  हर क्वार्टर में, जो मेरे कार्यक्षेत्र के वातावरण को सफोकेट कर रहा है।

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आप  कन्फ़्रन्टेशन (रूबरू किसी मुद्दे का सामना करना) का आनन्द उठाती हैं?

मैं व्यक्तिगत तौर पर महसूस करती हूं की कन्फ्रंटेशन्स (रूबरू आमना सामना करना) डिटॉक्सिंग की तरह है। जब आप अपने को डिटॉक्स करते हैं तो वह बिल्कुल आनंददायक अनुभव नहीं होता है, लेकिन आपको ऐसा करना ही पड़ता है। मैं कन्फ्रंटेशन को ऐसा ही मानती हूं। कई बार आपको ऐसा करना ही पड़ता है, हालांकि यह आसान नहीं बल्कि काफी ट्रिकी है, जो परिस्थितियों को बहुत खराब भी बना देती है लेकिन यह मेरा विचार है की आमने-सामने की बातचीत में कोई बुराई नहीं है, उससे रिश्तो में सुधार भी आ सकता है, यदि सामने वाले के पास इतनी सेंसटिविटी है कि वह आपके द्वारा दी जा रही ट्रीटमेंट को समझ पाए। सही कहूं तो इसमें बुराई नहीं है। वैसे  ऐसा करके दरअसल आप अपनी कमजोर कड़ी, सामने वाले को जता देते हो लेकिन यही सबसे सही उपाय है। जब कोई ऐसा ट्रीटमेंट देता है, भले ही वह लेयर्ड (परत दर परत) ट्रीटमेंट हो, खामोश ट्रीटमेंट हो या कैसा भी ट्रीटमेंट हो,  मैं ऐसी स्थिति में सामने वाले को बता देती हूं कि वह मुझ पर असर डाल रहा है। मैं क्यों ना बोलूं ? मैं चुपचाप अकेले क्यों दर्द सहूँ?  इसलिए हां मैं कन्फ्रंटेशन को मानती हुँ।

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