मैं उस दिन संजीव कुमार के टक्कर का स्टार बनाया गया था- अली पीटर जॉन

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sanjeev kumar

मैं उस सुबह भाईदास हॉल से गुजर रहा था जब किसी ने मुझे बताया कि संजीव कुमार अपनी फिल्म, ‘अंगूर’ के लिए गुलज़ार के साथ शूटिंग कर रहे थे. उस समय गुजराती फिल्म निर्माता, चंद्रकांत संघानी के साथ  मेरी मीटिंग थी, लेकिन जब मैंने गुलज़ार और संजीव के जादू का कॉम्बो के बारे में सुना, तो मैं अपना मीटिंग भूल गया और भाईदास हॉल में चला गया, केवल यह देखने के लिए कि दर्शकों के बीच दीप्ती नवल, देवेन वर्मा और संजीव कुमार के साथ एक गीत शूट किया जा रहा था.

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मैं मंच पर दीप्ति को गाते हुए देख रहा था और संजीव और देवेन आगे की पंक्ति में बैठे थे. गुलज़ार मेरी कमजोरी के बारे में जानते थे और उन्होंने मेरे लिए एक कप गर्म चाय भिजवाया. जो मुझे किसी भी स्थिति या चुनौती का सामना करने के लिए प्रेरित किया.

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मैं अभी भी दीप्ति को देख रहा था, वो उस गाने में जान डालने की कोशिश कर रही थी. जब वह गा रही थी तब मैंने गुलज़ार को अपनी ओर आते देखा. उन्होंने अचानक मेरा हाथ पकड़ लिया और मुझे वहाँ ले गए जहाँ संजीव और देवेन बैठे थे और संजीव को दूसरी सीट पर जाने के लिए कहा और मुझे दो महान अभिनेताओं के बीच बैठा दिया.

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मुझे नहीं पता था कि क्या हो रहा, जब तक संजीव ने मुझे गंभीरतापूर्वक बताया कि  मैं इस सीन का एक हिस्सा था. शूटिंग में ब्रेक हुआ और मैंने संजीव से कहा कि मुझे ऑफिस जाना होगा तभी संजीव और देवेन ने एक साथ कहा, “अब अली तुझे ऑफिस में जाने की क्या जरूरत है ? गुलजार भाई ने  तेरे को अभिनेता बना दिया. मैं संजीव और देवेन के बीच बैठा रहा और गाने को उस तरह की रिएक्शन देनी थीं जैसा गुलज़ार चाहते थे. शाम को ‘गाना’ पूरा हुआ और मैं उस दिन ऑफिस नहीं जा सका.

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और मेरा दिन बन गया जब संजीव ने मुझे बताया कि  मैंने अच्छा काम किया और मुझे पत्रकारिता छोड़ कर एक्टिंग करना चाहिए. संजीव के साथ गुलजार, देवेन और दीप्ती ने भी मेरी एफॉर्ट की प्रशंसा किया. संजीव ने  एक डेब्यू एक्टर के तौर पर मेरे लिए उस शाम में सेलिब्रेशन किया, चोपस्यू में ड्रिंक और डिनर से शुरुआत की. उनका फेवरेट चाइनिज खाना और पीने की जगह, लगभग हर शाम और सेलिब्रेशन ढाबे पर हमारे खाने और पीने के साथ समाप्त हुआ,  लिंक रोड पर ‘जय जवान’ पंजाबी ढाबा था, जो इंडस्ट्री के सेवानिवृत्त सेनानियों के प्रबंधन में था.

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यह 35 साल से ज्यादा समय हो गया है जब मैंने अभिनेता के तौर पर शुरुआत की थी. लोग और मेरे दोस्त आज भी मुझसे कहते हैं कि मैं अपनी जवानी के दिनों में फिल्म इंडस्ट्री के दो दिग्गजों के बीच बैठा था.

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संयोग से मैं भी ‘बहारों के सपने’  में एक भीड़ के हिस्से में दिखाई दिया था जो राजेश खन्ना की तीसरी फिल्म थी और मैं एक पत्रकार था और इसके पहले और मैं अपने गुरु के अब्बास फ़ासला के नेतृत्व में वास्तविक पत्रकार बन सकता था और शबाना आज़मी के साथ मैंने एक सीन किया था, उस समय शबाना आज़मी संघर्षशील अभिनेत्री थी. और मुझे उस सीन के लिए कतार में खड़ा होना था. मुझे वो सीन करने के लिए 25 रुपये भुगतान किया गया. उस रुपए से मैंने अपने लिए एक कुर्ता  खरीदा था. फिल्म ‘अंगुर’ में यादगार भूमिका निभाने के बाद अली ने एक्टिंग को अलविदा कह दिया.

अनु- सलोनी उपाध्याय


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