अगर आप ना होते, देव साहब – अली पीटर जॉन

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वह दूसरों में प्रतिभा को पहचानने वाले अविश्वसनीय व्यक्ति थे। जिन लोगों की प्रतिभा को उन्होंने पहचाना, उन्हें ब्रेक भी दिया। इस तथ्य का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण रहस्यपूर्ण व अनन्त देव आनंद के गुरु दत्त शिराली है। देव आनंद बतौर लीड एक्टर अपनी पहली फिल्म ‘हम एक है’ कर रहे थे जो पुणे के प्रभात स्टूडियो में शूट हो रही थी। देव जब अपनी पहली फिल्म में काम कर रहे थे तब वह एक सहायक कोरियोग्राफर गुरुदत्त से मिले जो लेजेंडरी उदय शंकर बैलैट ग्रुप के साथ बतौर डांसर काम किया करते थे। देव आनंद सहायक कोरियोग्राफर गुरुदत्त से मिलकर काफी प्रभावित हुए व उन्होंने यह निर्णय लिया कि जब वह मुम्बई चले जाएंगे और एक प्रसिद्ध एक्टर बन जाएंगे व अपनी प्रोड्क्शन कंपनी शुरू करेंगे तब वह गुरुदत्त को अपनी फिल्म को डायरेक्ट करने के लिए कहेंगे। कुछ साल बाद देव एक बहुत बड़े स्टार बन गए व उन्होंने खुद की प्रोड्क्शन कंपनी ‘नवकेतन’ शुरू की और वह गुरुदत्त को बतौर डायरेक्टर लॉन्च करने की बात भूले नहीं थे। देव आनंद ने जब गुरुदत्त को फोन कर के यह बताया कि उन्हें फिल्म ‘बाजी’ डायरेक्ट करनी पड़ेगी तो गुरुदत्त पूरी तरह से चौंक पड़े। देव आनंद ये बात अच्छी तरह से जानते थे कि गुरुदत्त ने बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर भी कभी फिल्में नहीं बनाई। तब भी उन्होंने गुरुदत्त को फिल्म ‘बाजी’ डायरेक्ट करने का ऑफर दिया। डायरेक्टर गुरु दत्त की फिल्म में देव आनंद, गीता बाली और कल्पना कार्तिक ने मुख्य भूमिका निभाई थी। फिल्म सुपरहिट साबित हुई जिस वजह से गुरु दत्त एक बहुत प्रसिद्ध डायरेक्टर साबित हुए व उन्होंने बहुत सी फिल्में डायरेक्ट की व जल्द ही उन्होंने अपने बैनर को लॉन्च भी किया। गुरु दत्त ने ‘प्यासा’, ‘कागज के फूल’, ‘चौदहवीं का चाँद’ और ‘साहिब बीवी और गुलाम’ जैसी बहुत सारी यादगार फिल्में बनाई। यह दो दोस्त जल्द ही बहुत अच्छे दोस्त बन गए।

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फिल्म ‘कागज के फूल’ के फ्लॉप होने के बाद गुरु दत्त टूट चुके थे। डायरेक्शन के क्षेत्र में वह अपनी रूचि खो चुके थे। गुरु दत्त इस कदर खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे कि अगर वह अपने बैनर तले कोई फिल्म बनाते तो वह इसका सारा श्रेय अपने साथ काम करने वाले व्यक्ति को दे दिया करते थे। उन्होंने ड्रिंक करना शुरू कर दिया था जिस कारण उन्हें जॉनडिस हो गया। इस सबके बाद वह अपने पुराने व पहले दोस्त देव के पास गए व उनसे कहा कि वे दोबारा देव को डायरेक्ट करना चाहते है। देव आनंद ने गुरुदत्त की शारीरिक अवस्था देखी। गुरुदत्त कमजोर लग रहे थे, जॉनडिस के कारण उनका चेहरा पीला पड़ गया था। देव ने उन्हें गले लगाया और कहा कि पहले तुम पूरी तरह से ठीक हो जाओ तब हम फिल्म बनाएंगे। अगली सुबह देव को गुरु दत्त के घर से फोन आया उन्हें बताया गया कि गुरु दत्त का देहांत हो गया। उनके पास से व्हिस्की व नींद की गोलियों की छोटी बोतल भी मिली है। 39 साल की उम्र में ही गुरु दत्त की गाथा समाप्त हो गई। देव आनंद ही एक ऐसे व्यक्ति रहे जिन्होंने यह भविष्यवाणी की थी कि गुरु दत्त बतौर डायरेक्टर काम करेंगे व भारतीय फिल्मों की सबसे बड़े निर्देशकों में से एक के रूप में जाने जाएंगे। गुरुदत्त के लिए देव साहब की भविष्यवाणी सच साबित हुई?

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जब देव साहब एक जूनियर संघर्षशील व्यक्ति थे तब वह बड़ी हस्तियों जैसे बड़े भाई चेतन आनंद, बलराज साहनी, के.ए. अब्बास और जोहरा सहगल जैसा बनने की कोशिश किया करते थे। एक समय ऐसा आया जब उन्होंने अपने भाई के बैनर ‘हिमालय फिल्म्र्स’ में उनकी मदद की थी। एक बार शिवाजी पार्क में अपने ही घर में अब्बास ने देव को आश्रय दिया था, देव ने अब्बास साहब की फिल्म ‘राही’ में काम किया था। देव आनंद पहले ऐसे व्यक्ति रहे जिन्होंने धर्मेंद्र व सुनील दत्त के अंदर एक हुनर देखा। सुनील दत्त (बलराज दत्त ) तब ‘रेडियो सीलोन’ में बतौर अनाउंसर काम करते थे और जब वह देव आनंद का इंटरव्यू लेने आये तब देव साहब ने उनसे कहा कि तुम इस जॉब में अपना समय क्यों बर्बाद कर रहे हो तुम एक स्टार बन सकते हो। सुनील दत्त देव की बात सुन काफी खुश हुए। इसके बाद वह ‘मदर इंडिया’ फिल्म में नरगिस के बेटे की भूमिका में नजर आए। फिल्म में वह बुरे बेटे बिरजू के किरदार में नजर आए। देव आनंद राज कपूर के अच्छे मित्र थे तो जब उन्होंने राज कपूर के छोटे भाई शम्मी कपूर को देखा तो उन्हें भी एक्टर बनने की सलाह दी। शम्मी कपूर ने देव आनंद की बात मान ली और स्टार बनने के लिए अपने रास्ते पर निकल पड़े। देव आनंद एक प्रसिद्ध सुपरस्टार के रूप में लोगों के बीच पहचाने जाने लगे थे और एक बार जब देव आनंद स्टूडियो में शूटिंग कर रहे थे तब स्टूडियो के बाहर काफी भीड़ जमा थी उन्हें देखने के लिए जब वो बाहर आए तो उन्होंने भीड़ में एक खूबसूरत नौजवान को देखा और उसे अपने पास बुलाकर कहा कि तुम इस भीड़ मे क्या कर रहे हो जबकि एक एक्टर बनने की सारी क्षमताएं तुम में है। वो खूबसूरत नौजवान और कोई नहीं बल्कि धर्मेंद्र सिंह देओल थे। जो आगे चल कर देश के दिल की धड़कन बन गए।

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देव साहब प्रतिभा स्काउट थे जिन्होंने नूतन, वहीदा रहमान, आशा पारेख, जाहिदा, हेमा मालिनी, राखी जैसी अभिनेत्रियों को प्रोत्साहित किया था। उन्होंने इन सभी अभिनेत्रियों के साथ काम भी किया था। देव साहब एक स्टार व फिल्ममेकर थे जिन्होंने राज खोंसला व अपने भाई विजय आनंद को बतौर डायरेक्टर प्रेरित किया था। विजय आनंद ने ‘नौ दो ग्यारह’, ‘टेक्सी ड्राइवर’, ‘तेरे घर के सामने’, ‘गाइड’, ‘तेरे मेरे सपने’ जैसी फिल्मों के डायरेक्ट किया था। देव ने बासु चटर्जी और बीआर.इशारा जैसे डायरेक्टर्स को प्रोत्साहित किया जिन्होंने ‘मन-पसंद’, ‘प्रेम शास्त्र’ जैसी फिल्में बनाई थी। वह एसडी बर्मन, आरडी बर्मन, जयदेव, कल्याणजी- आनंदजी, राजेश रोशन, लक्ष्मीकांत- प्यारेलाल साहिर लुधियानवी, शैलेंद्र, हसरत जयपुरी, नीरज, मजरूह सुल्तानपुरी, अंजान और अमित खन्ना जैसे संगीत निर्देशकों व गीतकारों के प्रेरणा का एक स्रोत थे। मोहम्मद रफी, हेमंत कुमार और किशोर कुमार की प्रसिद्धि के पीछे इनका हाथ रहा। जो चालीस से भी ज्यादा गानों में देव आनंद की आवाज बने। देव आनंद ने अपनी आखिरी फिल्म ‘चार्जशीट’ के समय तक अधिक से अधिक प्रतिभा की खोज जारी रखी। फिल्म ‘चार्जशीट’ में देव साहब ने बहुत से नए एक्टर्स व म्यूजिक डायरेक्टर्स को अपना हुनर दिखाने का मौका दिया था। वह अपने जीवन में हर क्षेत्र में प्रतिभा की खोज किया करते थे पर मौत उनके जीवन में एक विलेन बन कर आई है। उन्होंने विलेन के तौर पर अपने पसंदीदा होटल डोरचेस्टर में आत्मसमर्पण कर दिया जहा वह असहाय बिस्तर पर लेटे हुए थे। जहां मौत उनके लिए एक विलेन साबित हुई ।
लता मंगेशकर और आशा भोंसले हमेशा ही देव आनंद की आभारी रही थी

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भारत रत्न लता मंगेशकर ने देव आनंद की अनेक फिल्मों मे से एक फिल्म के गाने की रिकार्डिंग फ्लोरा फाउंटेन के वेस्टर्न आउटडोर रिकॉर्डिंग स्टूडियोज में की थी। दो किंवदंतियों के बीच रिकॉर्डिंग के समय व बाद में बहुत ही घनिष्ठता हो गई थी। गाना रिकॉर्ड करने के बाद लता जी स्टूडियो से चली गई थी। जब देव आनंद को यह पता चला कि लता जी चली गई है तो वह उनके पीछे दौड़े। जब बुलबुल (लता जी) ने देव आनंद को अपने पीछे दौड़ते हुए देखा तो वह रुकी व देव ने करेंसी नोटों से भरा हुआ एक पैकेट बाहर निकाला व परिश्रम के रूप में लता जी को देने लगे। लता जी ने इसे लेने से साफ इंकार कर दिया व उन्होंने कहा कि देव साहब, आपने मुझे पिछले पचास सालों में ना जाने कितने पैसे दे चुके हैं, मैं आपकी शुक्रगुजार रहूंगी यह सब सुन देव साहब ने कहा कि ‘वो तो पुरानी बात है लता, अब तुमने पैसे नहीं लिए तो मैं रूठ जाऊंगा’ जब लता ने यह देख कि देव नहीं मान रहे उनकी बात तो लता जी ने कहा कि ‘आपके पास एक रुपया है तो दीजिए, बाकी मुझे कुछ नहीं चाहिए बस आपका आशीर्वाद मेरे साथ रहे यही मैं चाहती हूं’ एक विशाल भीड़ इकट्ठा हो गई दो किंवदंतियों को बात करते देखने के लिए। जिस कारण ट्रैफिक जाम हो गया। लता जी ने देव साहब के पैर छूने चाहे पर देव साहब ने नहीं छूने दिये। लता जी अपनी गाड़ी में चली गई तो वहीं देव साहब अपने स्टूडियों में। इसी तरह की स्थिति तब पैदा हुई जब आशा भोंसले उनकी फिल्म ‘गैंगस्टर’ का एक गाना रिकॉर्ड कर रही थी। उन्होंने बिना यह पूछे कि गाना किसने लिखा व युवा संगीत निर्देशक कौन है पूरा गाना रिकॉर्ड किया। देव साहब ने दोबारा से पैकेट निकाला और आशा जी को देने लगे (वही पैकेट जो उन्होंने लता जी को भी देने की कोशिश की थी पर लता जी ने नहीं लिये थे), यह देख आशा जी ने कहा कि नहीं ‘मैं आपसे एक पैसा नहीं ले सकती, आपने हमें बहुत पैसा व नाम दिया है’। यह बोल कर आशा जी देव साहब के पैर छू कर अपनी गाड़ी में बैठ कर चली गई। वो उनका आखिरी गाना था जो उन्होंने देव आनंद जी के साथ गाया था। फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ का गाना ‘दम मारो दम’ गाने के बाद आशा जी को नया जीवन मिला।

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Mayapuri