भारत की पहली बोलती फिल्म आलम आरा

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मायापुरी अंक 20,1975

भारतीय सिने इतिहास में 3 मई 1913 का दिन स्वर्णिम अक्षरों में अंकित रहेगा, क्योंकि इस दिन चित्र महर्षि दादा साहब फाल्के ने अपने अथक प्रयत्नों से भारत की पहली मूक फिल्म राजा हरिशचन्द्र प्रदर्शित कर अपनी चिर मनोकामना पूरी की थी, 1913 से 1938 तक के 25 वर्षो में उन्होंने 128 फिल्में बनाई थी। ‘गंगावतरण’ उनकी अंतिम फिल्म थी, उस काल में विभिन्न निर्माण संस्थाओं ने लगभग 1000 से अधिक मूक फिल्मों का निर्माण किया था, फिर अचानक फिल्मों को वाणी मिल गई भारतीय फिल्मों के पात्र बोल उठे, चलती फिरती तस्वीरों को खान बहादुर अर्देशर ईरानी ने बोलना सिखाया व 4 मार्च 1931 को मुंबई के मैजेस्टिक सिनेमा में भारत की प्रथम बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ प्रदर्शित की गई। इम्पीरियल फिल्मस के झंडे तले बनी यह फिल्म आज के प्रगतिशील सिने उद्योग की नींव का वह मजबूत पत्थर है जो सदैव याद रहेगा। 5 माह में बनी इस फिल्म की लागत उस समय में 7500 रुपये आई थी।

अर्देशर ईरानी के सहयोगियों में प्रमुख रूप से श्री अब्दुल अली युसुफ अली, आदिल ईरानी, जोसेफ डेविड व रुस्तम सी. मरुचा थे, अर्देशर ईरानी के विभिन्न मित्र व सहयोगी श्री अब्दुल अली युसुफ अली ने ‘आलम आरा’ के प्रदर्शन की समुचित व्यवस्था की थी, ईरानी व अली की पार्टनर शिप से ही मुंबई में मैजेस्टिक व अलैक्जेन्ड्रा सिनेमा का निर्माण हुआ था, ‘आलम आरा’ का छायाकंन (फोटोग्राफी) आदिल ईरानी ने की थी, व इस फिल्म के पट कथा व संवाद प्रसिद्ध नाटककार स्वर्गीय जोसेफ डेविट ने लिखे थे, जो फिल्म क्षेत्र में व थियेटर से संबन्धित व्यक्तियों में ‘जोसेफ दादा’ के नाम से जाने जाते थे। इम्पीरियल फिल्म कम्पनी के मैनेजर रुस्तम सी. मरुचा ने साउंड रिकॉर्डिंग का दायित्व निभाया था।

‘आलम आरा’ के कलाकारों में मास्टर विट्ठल (नायक), जुवैदा (नायिका), स्वर्गीय पृथ्वीराज कपूर, जगदीश सेठी, जिल्लो बाई, वजीर मोहम्मद खान व सुशीला आदि थे, मास्टर विट्ठल उस समय के सबसे मंहगे कलाकार थे। जिनका वेतन 1000) रु प्रति माह था उस पर आश्चर्य यह कि इस मंहगे कलाकार ने न तो फिल्म में कोई संवाद बोला, न ही कोई गीत गाया। स्व.पृथ्वीराज कपूर ने नायिका के पिता की भूमिका निभाई थी। इनकी भारी आवाज की उन दिनों काफी आलोचना की गई थी। इस फिल्म का महत्वपूर्ण पक्ष संगीत था, जो कि स्व.फिरोजशाह शास्त्री ने बी.ईरानी के साथ मिलकर तैयार किया था। संगीत तैयार करने में उन्हीं साजों व वाद्ययंत्रो का प्रयोग किया था जो मूक फिल्मों के समय थियेटर में बजाये जाते थे। शास्त्री साहब ऑल इंडिया रेडियो स्टेशन के प्रथम संगीत कार व गायक थे।

गायकी के इतिहास में प्रथम गायक वजीर मोहम्मद खान ने इस फिल्म का पहला गीत ‘दे दे खुदा के नाम प्यारे, ताकत हो गर देने की‘ गाया था। जो काफी लोकप्रिय हुआ था। चित्र की नायिका जुबैदा ने बदला जो दिलवायेगा यारब तू सितमगारों से, नामक गज़ल ‘आलम आरा’ की भूमिका करते हुए गाई थी। अन्य गीतों में जिल्लो का गाया गीत ‘रूठा आसमां गुम हो गया मेहताब’ व मुन्नी बाई का गीत ‘अपने मौला की मैं जोगन बनूंगी’ काफी लोकप्रिय हुए थे।

पहले ही दिन इस फिल्म की टिकटें 50-50 रुपये में बिकी थी। शो 3 बजे प्रारम्भ होने वाला था, पर सवेरे 9 बजे ही मैजस्टिक सिनेमा के बाहर अपार भीड़ एकत्रित हो गई।

इसके बाद दो बार और ‘आलम आरा’ का निर्माण 1956 व 1973 मैं देसाई फिल्मस व जयश्री फिल्मस के अंतर्गत किया गया, दोनों फिल्मों के निर्देशक नानू भाई वकील थे व आश्चर्य की बात ये है कि पहली फिल्म में दरवेश की भूमिका निभाने वाले कलाकार वजीर मोहम्मद खान ने 1956 व 1973 में बनी फिल्मों में भी वही दरवेश की भूमिका निभाते हुए उसी गीत की पंक्तियां गाई थी। ‘दे दे खुदा के नाम पर’ कुछ समय पूर्व ही उनका निधन हो गया।

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Mayapuri