एक झलक हिन्दी फिल्मों के स्टूडियों पर

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मायापुरी अंक 2.1974

फिल्में देखते समय आपको ऐसा लगता होगा कि सितारों की नगरी स्वर्ग-समान होगी, ऐसा लगना भी चाहिये क्योंकि जहां इतने सारे सितारे जगमगाते हों वह नगरी स्वर्ग ही कही जानी चाहियें। आइये आपको सितारों की नगरी के अन्दर से दर्शन करायें। हां एक बात का ध्यान रखें कि अगर रास्ते में आपको कूड़े का ढेर नजर आये या सैट पर गरमी परेशान करने लगे तो बोर मत हों क्योंकि आप किसी फिल्म स्टार के घर नही बल्कि उनके कारखाने यानी स्टूडियो में आ रहे है। यह है तो एक तरह की ट्रेजडी कि लाखों रुपये कमाने वाले फिल्मस्टारों के घर तो एयर कंडिशड है किन्तु स्टूडियो नर्क बने हुए है, किन्तु किया भी क्या जाए ? न तो निर्माता इस ओर ध्यान देते है और न खुद फिल्म स्टार बेचारे कलाकार पसीना पोंछते जाते है और शॉट दिये जाते है। इसलिये कहते है कि यह सितारों की नगरी दूर से जितनी लुभावनी लगती है पास जाने पर उतनी भयानक लगने लगती है। हमें तो आए दिन इस भयानक नगरी की भयानकता का सामना करना पड़ता है क्योंकि ‘छोटी मोटी मुलाकातें’ स्तम्भ की सामग्री यही तो मिलती है।

हां तो यह महबूब स्टडियो है। अन्दर निर्माता निर्देशक देवेन्द्र गोयल की फिल्म ‘एक महल हो सपनो का’ की शूटिंग चल रही है, जरा शूटिंग का नजारा देखें

यह मुंबई की एक मशहूर सड़क है। आमने-सामने दुकानें है। सामने पुल है। किताबों की दुकान के सामने शराब की दुकान है। धर्मेन्द्र शराब घर से शराब पीकर बाहर निकलता है और एक टैक्सी को रोकता है। एक ओर लीना अपनी कार के बाहर खड़ी छिपकर देख रही है। धर्मेन्द्र टैक्सी का दरवाजा खोलकर अन्दर बैठ जाता है। ड्राइवर मीटर गिराने लगता है तो वह उसे रोक देता है।

ठहरना, हां भाई, जेबें टटोलता है। माफ करना जेबें एकदम खाली है। अगर ऐसे ही बैठ जाता तो तुम मेरी गर्दन पकड़ लेते। लेकिन शाहजी जिस दिन मेरी जेब रुपयों से भरी होगी उस दिन आपकी टैक्सी पूरे दिन के लिए इंगेज करूंगा। धर्मेन्द्र टैक्सी से उतर जाता है।

धर्म को दरअसल प्रेम में बड़ा धोखा हुआ है। उसी को भुलाने के लिए वह शराब पीता है और अय्याशी करता है। वह काम इस तरह करता है कि पहले तो अकेली लड़की देख कर उसे टैक्सी में लिफ्ट देता है फिर उससे भाव तय करने लगता है क्योंकि वह अपनी प्रेमिका की बेवफाई का बदला औरत जाति से ले रहा है।

टैक्सी छोड़ने के बाद वह पैदल जा रहा है कि पास में लीना की कार आकर रुकती है। आज टैक्सी की हड़ताल है आपको कहां जाना है चलिये आपको छोड़ देती हूं घबराइये मत मैं बहुत शरीफ लड़की हूं लीना इस प्रकार धर्मेन्द्र के संवाद उसी को सुनाती हूं और वह व्यंग्यपूर्ण हंसी हंसता हुआ बैठ जाता है।

लीना के गाड़ी स्टार्ट करते ही शाट ओ.के हो गया।

आपको शायद यह नही मालूम कि लीना, धर्मेन्द्र के मालिक अशोक कुमार की लड़की है। धर्मेन्द्र की ऐसी हालत देखकर उसे उससे हमदर्दी हो जाती है वह उसे सुधारने के लिए यह सब प्रयत्न कर रही शर्मिला टैगोर, देवेन वर्मा, संजना जगदीशराय और आशा चन्दा भी फिल्म के उल्लेखनीय कलाकार लेखक मुश्ताक जलीली, संगीत रवि का और गीत साहिर लुधियानवी के है। निर्माता-निर्देशक देवेन्द्र गोयल ने बताया कि उनकी फिल्म आधी से अधिक बन चुका है और संभावना इस बात की है कि फिल्म को नवम्बर में प्रदर्शित कर दिया जाए।

अरे यहां भी धर्मेन्द्र शूटिंग कर रहा है, लेकिन यहां हीरोइन शर्मिला टैगोर के साथ ओमप्रकाश भी यह के. आसिफ स्टडियो है। फिल्म है ‘चुपके चुपके’ आप भी जरा ‘चुपके चुपके’ ही सैट पर आइयेगा। जरा आवाज से कलाकारों का मूड डिस्टर्ब हो सकता यह छोटा-सा कमरा है। सम्भवत यह ओमप्रकाश का ड्राइंगरूम है। चारों ओर सोफे बिछे है। बीच में हम और तिपाई पर अंग्रेजी पत्रिकाएं रखी हुई है। उसी के पास ओमप्रकाश अपनी पत्नी उषाकिरण पुराने जमाने की यादगार और शर्मिला टैगोर के साथ है, दरवाजे में ड्राइवरों की सी सफेद वर्दी पहने धर्मेन्द्र खड़ा है।

कौन है ! ओमप्रकाश ने आहट पाते ही पूछा।

जी हम है साहेब मोहन प्यारे धर्मेन्द्र ने कहा।

वहां खड़े खड़े क्या कर रहे हो ?

साहेब अभी आके-आके खड़े हुए है।

यह आके-आके क्या होता है?

साहेब आपने खड़े-खड़े कहा तो हमने आके-आके कहकर कविता का रस ले लिया।

तो अब तुम छन्द में बात करोगे। यदि आप आज्ञा देंगे।

हरगिज नही। तुम पागल हो पागल।

नही साहेब अब हम पागल नही है। जब तक हमारा विवाह नही हुआ था लोग हमको पागल कहते थे। अब ऐसे कोई लक्षण नही दिखते।

इसकी तीन चार बार रिहर्सल हुई। फिर भी दो तीन रीटेक के बाद शॉट ओ.के. हुआ यह फिल्म की कहानी बड़ी ही दिलचस्प है। आज के तीस-चालीस साल पूर्व इसी फिल्म से संगीतकार एस.डी. वर्मन के फिल्मी जीवन की शुरूआत हुई थी। उसके बाद दो बार बंगला में यही कहानी फिल्माई जा चुकी है। हिन्दी में इसे पहली बार फिल्माया जा रहा है। धर्मेन्द्र पहली बार पूरी फिल्म में कॉमेडी करने वाला है। जिस प्रकार से फिल्म बन रही है उससे लगता है कि यह धर्मेन्द्र की एक यादगार फिल्म होगी। इसमें जया और अमिताभ भी मुख्य भूमिका निभा रहे है। ऋषिकेश मुखर्जी फिल्म के सहनिर्माता और निर्देशक है। संवाद गुलजार के है

बड़ी अजीब बारिश है मुंबई की भी। एक मिनट में मौसम साफ और जब बरसने लगे तो रुकने का नाम ही न ले। शाम के सात बजे थे, राजकमल स्टूडियो में यश चोपड़ा की फिल्म की शूटिंग चल रही थी। बाहर खुले अमिताभ बच्चन और परवीन बॉबी पर रोमांटिक सीन लिए जा रहे थे। अमिताभ बार-बार झेंप रहा था मगर परवीन चहकती फिर रही थी। लगभग सवा नौ बजे शिफ्ट खत्म हुई पैकअप हुआ तो मूसलाधार वर्षा हो गई। सभी कह रहे थे कि, बड़ा खुशकिस्मत है यश चोपड़ा भी क्योंकि यदि कुछ देर पहले ही बारिश होने लगती तो मामला गड़बड़ हो जाता।

वास्तव में यह बारिश जो शुरू हुई तो फिर अठारह घंटे तक होती ही रही। बारिश में लगभग पौने दस नीतू सिंह आई। आते ही मेकअप रूम में चली गई क्योंकि सैट पर पहुंचना था। हमने नीतू सिंह को उसके मेकअप रूम में ही जा पकड़ा।

आदमकद शीशे के सामने परी चेहरा नीतू सिंह अपने आपको संवारने में लगी हुई थी। पास में ही नीतू की मां बैठी थी जिसने हमें देखते ही अजीब सा मुंह बना लिया। जब हमने इसका कारण जानना चाहा तो नीतू की मां ने कहा, हम लोग तो दिल्ली वालों की शक्ल ही नही देखना चाहते। न जाने क्या क्या लिख डालते है बेबी के बारे में, आखिर कुछ तो तमीज होनी चाहिए।

नीतू की मां राजी सिंह का गुस्सा अपनी जगह बिल्कुल ठीक था। मगर सभी को एक ही लाठी से हांकने की बात हमें समझ नही आई। हमने पूछा, क्या सभी दिल्ली वाले ऐसे है? आप सभी को एक तराजू में क्यों तोल रही हैं ? ऐसा करके आप निश्चित रूप से कुछ सीरियस और अच्छे पत्रकारों को बदनाम कर रही है।

आप सीरियस और अच्छे पत्रकार है इसलिए तो मैंने आपको यहां मिलने का समय दे दिया नही तो मैं सुबह ही टेलीफोन पर मना कर देती। नीतू की मां ने बोलने का लहजा परिवर्तित किया।

आज नीतू सिंह को लेकर तरह-तरह की व्यर्थ की बातें पत्र-पत्रिकाओं में लिखी जा रही है। किसी पत्रिका में उसके जल्दी जवान होने पर आपत्ति प्रकट की जा रही है तो किसी में उसके बाप के विषय में अनेको आशंकाए व्यक्त की जा रही है। इस प्रकार की घटिया पत्रकारिता कहां तक युक्तिसंगत है, हमें नही पता।

नीतू की मां का आक्रोश एकदम उचित है। व्यक्तिगत संबंधों पर कीचड़ उछालने की अपेक्षा कलाकार की कला का मूल्यांकन होना चाहिए। हम ‘मायापुरी में हमेशा ही इस बात का प्रयत्न करेंगे कि पत्रिका में उन्ही तथ्यों का समावेश हो जो किसी भी कलाकार को प्रगति के पथ पर ले जाए।

राजकमल स्टूडियो में ही हमारी मुलाकात नवोदित अभिनेत्री जाहिरा से हुई। जाहिरा को हमने मायापुरी का पहला अंक दिखाया तो उसने कहा, बड़ा ही खूबसूरत पत्र निकाला है आपने। छपाई की दृष्टि से भी ‘मायापुरी’ आकर्षक है। मैं चाहती हूं कि इसकी सफलता दिन दूनी रात चौगुनी हो। एक स्वस्थ और रुचिकर साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन दिल्ली से हो रहा और क्या चाहिए ?


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