दीपिका पादुकोण और रानी मुखर्जी समेत जानिए कई स्टार्स के दिलचस्प सीक्रेट

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दीपिका पादुकोण

पर्दे पर अपने किरदार को निभाने के मामले में रणवीर और रणबीर बिल्कुल अलग हैं। जहां रणवीर पूरे प्रोसेस में विश्वास करते हैं, वह अपनी निजी जिंदगी में भी उस किरदार को अपना लेते हैं। करीब हर जगह वह अपने किरदार के बारे में सोचते हैं। सेट पर भी वह किरदार के तौर पर ही सबसे बर्ताव करते हैं। रणबीर बहुत ज्यादा तैयारी करते मुझे कभी नहीं दिखाई दिए। हालांकि वह जब अपना सीन निभाते हैं तो वह काफी अच्छा होता है। दरअसल रणबीर और मेरे किरदार की तैयारी करने का तरीका करीब-करीब एक जैसा ही है।

करण जौहर

फिल्मों के अर्थशास्त्र की एक बड़ी समझ है। मगर कभी-कभी लोगों को इसकी कम जानकारी होती है। वह इस व्यवसाय को नहीं समझते हैं कि यह कैसे कार्य करता है। कई बार लोग इन चीजों के बारे में व्यापक बयान देते हैं।मैं ऐसा पहला व्यक्ति हूं, जो यह चाहता है कि वही भुगतान किया जाए जो पूरी तरह से सही हो, न्यायसंगत और वैध हो। मैंने हमेशा यही किया है। कई महिलाएं हैं, जो पुरुषों की तुलना में अधिक धनराशि पाने की हकदार हैं। ऐसे भी पुरुष हैं, जिन्होंने अपनी प्रतिभा और तप के कारण अपनी कमाई की है और उन्हें काम मिला। यह बहुत व्यक्तिपरक है। मैं समानता की बात करता हूं और मैं वह व्यक्ति हूं, जो हमेशा समान रहा है।

तापसी पन्नू

फिल्म सांड की आंख के रोल के लिए मेकर्स कंगना के पास गए होंगे। वास्तव में वे कई एक्ट्रेसेस के पास गए थे लेकिन किसी ने फिल्म के लिए हामी नहीं भरी। जहां तक मेरा सवाल है तो मेकर्स ने इस फिल्म के लिए मुझे कभी अप्रोच नहीं किया। जब मुझे पता चला कि इस तरह की फिल्म बनाने की प्लानिंग चल रही है तो मैं खुद मेकर्स के पास गई। मुझे ये बात स्वीकार करने में कोई शर्म नहीं है। मैं इस फिल्म को करना चाहती थी।

भूमि पेडनेकर

मैं चाहती हूं कि जब लोग मुझे पर्दे पर देखें तो वे भूल जाएं कि वे मुझे देख रहे हैं, इसलिए मेरी पूरी कोशिश रहती है कि मैं अपने किरदार को प्रामाणिक बनाऊं। मेरी कोशिश रहती है कि दर्शक मेरे किरदार से भावनात्मक रूप से जुड़ जाएं। ‘सांड की आंख’ के लिए मैं अपने हरियाणवी लहजे को वास्तविक बनाना चाहती थी और इसके लिए मैंने अपने लहजे को प्रामाणिक बनाने के लिए फिल्मांकन और डबिंग के दौरान अपनी मां की मदद ली थी।

रानी मुखर्जी

मेरी सबसे यादगार बात राजा की आएगी बारात’ के रिलीज वाले दिन की है, जब मेरे पिताजी (दिवंगत फिल्म निर्माता राम मुखर्जी) का बाईपास ऑपरेशन होना था। वह ब्रीच कैंडी में भर्ती थे और ऑपरेशन के लिए जाने के इच्छुक नहीं थे। वह मेरी फिल्म की रिलीज का इंतजार करना चाहते थे। मैंने उस समय उनसे कहा था कि यह बहुत महत्वपूर्ण है कि उन्हें सर्जरी करानी चाहिए। वह सर्जरी के लिए गए थे और लगभग एक या दो दिनों के लिए आईसीयू में बेहोश रहे थे। जब वह ठीक हुए और होश में आए तो उन्होंने पहली बात फिल्म की रिलीज के बारे में पूछी। उन्होंने पूछा कि फिल्म कैसा कर रही है।

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