INTERVIEW!! ‘‘फिल्म ‘सरबजीत’ काफी संजीदा, भावनात्मक और चुनौतीपूर्ण फिल्म है..’’ उमंग कुमार

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नेशनल अवाॅर्ड और फिल्म ‘सरबजीत’

मशहूर कला निर्देशक उमंग कुमार ने जब बतौर निर्देशक पहली फिल्म के तौर पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त मणिपुर की बाक्सर मैरी कॉम पर फिल्म बनाने का बीड़ा उठाया था, तो लोगों के मन में कई तरह की शंकाए थी. मगर ‘मैरी कॉम’ ने न सिर्फ बाॅक्स आॅफिस पर सफलता दर्ज करायी, बल्कि  उमंग कुमार को इसी फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. अब उमंग कुमार पाकिस्तान की जेल में कैद रहे और वहीं पर मौत के मुँह में समा चुके भारतीय नागरिक सरबजीत की बायोेपिक फिल्म निर्देशित करने जा रहे हैं।

बायोपिक फिल्म ‘मैरी काॅम’ को बाॅक्स आॅफिस सफलता के साथ राष्ट्रीय अवाॅर्ड मिलने से आपका हौसला इतना बढ़ा कि आपने दूसरी बायोपिक फिल्म ‘सरबजीत’ निर्देशित करने का बीड़ा उठा लिया?

सच कहूँ तो यह मेरा कोई सोचा समझा निर्णय नहीं है. न ही मैं योजना बनाकर ऐसा कुछ कर रहा हूँ. सच यही है कि ‘मैरी काॅम’ के बाद मैं दो अन्य विषयों पर काम कर रहा था. मैंने ‘वर्ल्ड वार 2’ पर एक पटकथा लिखी है, जो कि बहुत बड़ी फिल्म होगी. इसके अलावा एक अन्य विषय पर छोटे बजट की फिल्म की पटकथा तैयार है. ‘वर्ल्ड वार 2’ की फिल्म के लिए आवश्यक तैयारी में समय लगने वाला है. इस बीच मैं छोटे बजट वाली फिल्म निर्देशित करना चाहता था.  मगर अचानक बीच में मेरे पास ‘सरबजीत’ को निर्देशित करने का आॅफर आ गया. अभिनेता जीशान कादरी ने मुझसे कहा कि मुझे इस पर सोचना चाहिए. इसके अलावा सरबजीत के बारे में काफी लंबे समय से बहुत कुछ पढ़ता आ रहा था. तो मेरे मन में कहीं था कि इस इंसान के बारे में कुछ तो काम किया जाना चाहिए. जब मेेरे पास इस फिल्म का आॅफर आया उस वक्त मैं मलेशिया जाने की तैयारी में था, इसलिए मना कर दिया था. पर मुझसे इस फिल्म की कहानी पढ़ने के लिए दी गयी.मलेशिया में मैंने यह कहानी पढ़ी और मैं दंग रहा गया. मुझे लगा कि यदि इस पर मैं काम नहीं करूंगा, तो कोई दूसरा करेगा. इसलिए मैंने हामी भर दी।

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तो आपने अब तक इस पर क्या काम किया?

पटकथा लिखी जा रही है. फिल्म का निर्देशन स्वीकार करने के बाद मैंने अपने ही हिसाब से लोगों से मिलना शुरू किया. मैं सरबजीत की बहन दलबीर सिंह कौर से मिला. यह एक बायोपिक फिल्म होते हुए भी काफी कठिन फिल्म है. मेरे लिए बहुत बड़ी चुनौती है. क्योंकि यह राजनैतिक फिल्म न होते हुए भी दो देशों के आपसी संबंधों की किसी न किसी स्तर पर बात जरूर करेगी. मैं इसे एक आम कथा की फिल्म नहीं मानता.सच कह रहा हूँ, इसमें सरबजीत के परिवार के साथ साथ दो देष भी जुडे़ हुए हैं।

जब आपने कहानी पढ़ी तो किस बात ने आपको सबसे ज्यादा इंस्पायर किया?

मुझे कहानी में मानवीय पक्ष भी नजर आया. साथ ही साथ इस बात ने भी प्रेरित किया कि यदि एक सच्चा इंसान अपने परिवार से बिछुड़ जाए, तो परिवार पर क्या बीतती है।

आपके लिए राष्ट्रीय अवाॅर्ड कितना मायने रखता है?

राष्ट्रीय अवाॅर्ड बहुत मायने रखता है. जब हम कुछ लिखते हैं, तो सोचते हैं कि सबको भा जाए. जब हम संगीत तैयार करते हैं, तो सोचते हैं कि लोगों के दिलों तक पहुंच जाए. यानी कि हम जो भी काम करते हैं, बड़ी सोच के साथ करते हैं. हम जब फिल्म बनाते हैं, तब हम अवाॅर्ड की बात नहीं सोचते. हमारा मकसद सिर्फ इतना होता है कि फिल्म दर्शको को पसंद आए. हम सिर्फ खुद ही लैपटाॅप पर देखने के लिए फिल्म नहीं बनाते. पर पहली बात यह भी होती है कि बनाते समय हमें भी अच्छी लगनी चाहिए. जब फिल्म हिट हो जाए, तो अवाॅर्ड क्यों नहीं मिलना चाहिए? अवाॅर्ड भी मिलना चाहिए.हम अवाॅर्ड के भूखे नहीं हैं. पर दिल में कहीं न कहीं ख्वाहिष तो रहती है. जो कहते हैं कि हमें अवाॅर्ड नहीं चाहिए, वह झूठ बोलते हैं।

राष्ट्रीय अवाॅर्ड के लिए कहा जाता है कि सरकारें बदलने के साथ राष्ट्रीय अवाॅर्ड के पैमाने बदल जाते हैं?

मुझे इस बारे में कुछ भी पता नहीं. काफी लंबे समय बाद दूसरी पार्टी की सरकार आयी है. इस तरह की बातें कुछ लोग हमेशा करते है. जबकि उन्हें भी सच का पता नहीं होता है. राष्ट्रीय पुरस्कार बहुत उंचे पायदान पर तय किए जाते हैं. राष्ट्रीय अवाॅर्ड की स्थिति यह है कि जब हम अपने नाम के साथ ‘राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त निर्देशक’ लिखते हैं, तो हमारा सम्मान बढ़ जाता है।

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‘मैरी काॅम’ को कई अवार्ड मिल गए.आपको क्या उम्मीद थी?

सच कहूं तो मुझे पूरी उम्मीद थी कि फिल्म ‘मैरी काॅम’ में मैरी काॅम का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार मिलेगा. पर जब उन्हें यह अवाॅर्ड नहीं मिला, तो मुझे थोड़ा सा खटका.क्योंकि प्रियका चोपड़ा ने इस फिल्म के लिए बहुत मेहनत की थी. मुझे लगता था कि वह राष्ट्रीय पुरस्कार की हकदार हैं. पर फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, तो हम सब यानी कि पूरी टीम को खुशी मिली।

आपको सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला?

सच यह है कि राष्ट्रीय अवाॅर्ड के लिए हमारी फिल्म को वायकाॅम ने भेजा था. मुझे इस बात की जानकारी नहीं थी कि किस किस कैटेगरी में यह फिल्म भेजी गयी है. जिस दिन राष्ट्रीय पुरस्कारों की घोषणा हुई, उस दिन मैं मलेशिया में था. मैं एक मीटिंग खत्म करके थक कर सो रहा था. फोन की घंटिया बजने पर नींद खुली, तो समाचार जानकर जो खुषी हुई, उसका अहसास शब्दों में बयां नहीं कर सकता. मेरे लिए यह आश्चर्यजनक उपहार था. हम बहुत खुश हुए.प्रियंका को नहीं मिला, फिल्म को मिल गया, तो मामला बराबर हो गया।

कला निर्देशक से निर्देशक बनते ही पहली फिल्म को अवाॅर्ड मिल जाना आपके लिए क्या मायने रखता है?

अब जिम्मेदारी बढ़ जाने का अहसास बढ़ गया है. पर यदि अवाॅर्ड ना मिलता, तब भी मैंने जिस तरह से पहली फिल्म बनायी थी, उसी तरह से दूसरी फिल्म बनाता. मैं हमेशा अलग तरह की फिल्में बनाता रहूंगा. मैं ‘वर्ल्ड वार 2’ सहित कुछ दूसरे विषयों पर फिल्म बनाने जा रहा था. इनकी पटकथा मैंने तैयार कर ली थी।

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आपको नहीं लगता कि आपने मैरी काॅम का अंत बहुत ही ज्यादा सिनेमैटिक कर दिया था?

कुछ तो सिनेमैटिक स्वतंत्रता लेनी पड़ती है.दर्शकों की आंखों में आंसू लाने के लिए, इमोशन को पैदा करने के लिए थोड़ी सी नाटकीयता लानी पड़ती है. यदि हम ऐसी स्वतंत्रता न लेते, तो अपनी ही कहानी को परदे पर देखते हुए मैरी काॅम को रोना कैसे आता?

मैरी काॅम की कहानी के बारें में पूरा देश भलीभांति परिचित नहीं था. पर ‘सरबजीत’ की कहानी से हर भारतीय व तमाम विदेशी लोग भी परिचित हैं. ऐसे में इस फिल्म को लेकर दर्शकों की उत्सुकता कैसे पैदा होगी?

मेरी राय में ‘मैरी काॅम’ की कहानी भी लोगों को पता थी. पर परदे पर कहानी किस हिसाब से आगे बढ़ती है, किस तरह से इमोशन लोगों को आगे अपनी तरफ खींचते हैं, वह मायने रखता है. हम सरबजीत की कहानी को भी इसी तरह से पेश करेंगे कि दर्शक टक टकी लगाकर फिल्म देखना पसंद करेंगे।

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सरबजीत की कहानी को बताने का अंदाज क्या होगा?

हम सरबजीत की कहानी को उनकी बहन दलबीर सिंह कौर के नजरिए से पेश करने वाले हैं.उन्होंने अपने भाई को पाकिस्तान की जेल से छुड़ाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया और इस दौरान कई बार सफलता और असफलता कि उम्मीद भी नजर आयी। यह सब बहुत ही यथार्थप्रद तरीके से फिल्म में उकेरने की हम कोशिश करेंगे. फिलहाल मैं पटकथा लिख रहा हूं।

आपकी फिल्म से क्या उभरकर आएगा?

हमारी फिल्म बहुत ही संवेदनशील और संजीदा फिल्म है. इस फिल्म को देखने के बाद लोग दूसरे देशो की जेलों में बंद कैदियों की व्यथा को लोग समझ सकेंगे. यदि हर देश की सरकार अपने देश में बंद दूसरे देश के कैदियों की व्यथा के देखकर उन्हें आजाद कर दें.तो हमें लगेगा की हमारी फिल्म सरबजीत सफल हो गयी।


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Mayapuri

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