INTERVIEW!! ‘‘वास्तविक जीवन में मैं रोने वाला इंसान नहीं हूं’’ – अक्षय कुमार

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अक्षय कुमार अगर साल में चार मसाला फिल्म करते हैं तो एक ऐसी फिल्म भी करते हैं जिसे कमर्शियल होते हुये भी मसाला फिल्म नहीं कहा जा सकता। इन फिल्मों को हम वैसी कमर्शियल फिल्में कह सकते हैं जिसमें मनोरजंन के साथ साथ कुछ कहने के लिये होता है वे फिल्में समाज या देश के बारे में कुछ न कुछ कहती दिखाई देती हैं। ऐसी ही फिल्म है ‘एयरलिफ्ट’ जो एक रीयल घटना पर आधारित है जो महज एक आदमी पर आधारित है। फिल्म को लेकर अक्षय से एक मुलाकात ।

क्या इस फिल्म को भी बेबी या हॉलीडे जैसी फिल्मों की श्रेणी में रखा जाये ?

एक हद तक हां, लेकिन ये 1990 में घटी एक घटना पर आधारित ऐसी फिल्म है, जिसमें इराक के शासक सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर हमला किया था। इस दौरान वहां रह रहे करीब एक लाख सत्तर भारतीय युद्ध में फंस कर अपना सब कुछ गंवा चुके थे। उन सभी को सिर्फ एक आदमी वहां से निकाल सुरक्षित इंडिया पहुंचाता है। कुछ राजनैतिक कारणों से उस दौरान भारत सरकार ने ये खबर मीडिया समेत हर किसी से छुपा कर रखी थी। जहां तक हॉलीडे या बेबी की बात की जाये तो बेशक वह दोनों फिल्में फिक्शनल थी लेकिन उनमें कहीं न कहीं यथार्थ भी झलकता था।  हां छब्बीस ग्यारह भी एक सच्ची घटना पर आधारित फिल्म थी।

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अपने किरदार के बारे में आपका क्या कहना है।

यह एक ऐसे अरबपति बिजनेसमैन का किरदार है जिसका बिजनेस सारे कुवैत में फैला हुआ था लेकिन हमले के दौरान एक रात में ही वह भी वहां रह रहे लाखों भारतीयों की तरह सड़क पर आ जाता है। बाद में वह किस प्रकार अकेला एक लाख सत्तर हजार भारतीयों को प्लेन द्वारा सुरक्षित इंडिया पहुंचा कर दम लेता है। बाद में इस हैरतअंगेज घटना को गिनिज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज किया गया। असलियत में इस काम को चार लोगों ने अंजाम दिया था लेकिन फिल्म में एक शख्स रंजीत कत्याल को इस घटना को अंजाम तक पहुंचाते हुये दिखाया है।

यह जिस तरह की भयानक घटना है क्या इसने आपको इमोशनल नहीं किया ?

फिल्म की शूटिंग के दौरान मैं इतनी बार भावुक हुआ था कि मुझे आंखो में ग्लीसरीन डालने की जरूरत नहीं पड़ी, क्योंकि उस शूटिंग के दौरान कितनी ही बार मैं फूट फूट कर रोया जबकि वास्तविक जीवन में मैं रोने वाला शख्स नहीं हूं।

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फिल्म में आपके सामने इस बार लगभग नई नायिका निमरत कौर है। उन्हें फिल्म में लेने की क्या वजह थी ?

इस फिल्म में परफॉर्म करने वाले कलाकारों की जरूरत थी। फिल्म के एक प्रोड्यूसर निखिल आडवानी ने मेरा ध्यान निमरत की तरफ लगाते हुये बताया कि वह थियेटर की मंजी हुई आर्टिस्ट हैं और लंचबॉक्स जैसी देश विदेश में हिट फिल्म में काम कर चुकी है। उन दिनों वह अमेरिकन धारावाहिक ‘होम लैंड’ की शूटिंग कर रही थी। उसी दौरान उन्हें इस फिल्म के लिये साइन किया गया। वाकई वह एक बेहद मेहनती और उत्कृष्ट अभिनेत्री हैं मैं उनके काम को देखकर बहुत प्रभावित हूं।

इस फिल्म को लेकर वास्तव में आप क्या सोचते हैं ?

जैसा कि मैंने पहले भी बताया है कि मैं इस तरह की फिल्म करता रहा हूं। गब्बर, बेबी, हॉलीडे या छब्बीस ग्यारह ऐसी ही फिल्में थी। बेशक ये फिल्में सौ करोड़ नहीं कर पाती लेकिन अस्सी नब्बे करोड़ तक का बिजनेस इन फिल्मों ने भी किया है। दूसरे यह सारी फिल्में मनोरजंक फिल्में थी लेकिन इस फिल्म का अनुभव अलग था इसका कैनवास भी काफी बड़ा था, इसमें मुझे काफी मेहनत करनी पड़ी।

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आप तो होली दीवाली या अन्य ऐसे किसी पर्व का इंतजार नहीं करते लेकिन इस बार आपने फिल्म के लिये राष्ट्रीय पर्व छब्बीस जनवरी चुना ?

मैं ऐसी बातों में बिलीव नहीं करता। दूसरे होली दीवाली जैसे त्यौहारों पर तो वैसे भी हमेशा से दूसरे स्टार्स का कब्जा रहा है इसलिये मेरी फिल्म का नंबर कंहा से आयेगा। वैसे भी साल में मेरी चार फिल्में रिलीज होती हैं और मैं उनसे पूरी तरह संतुष्ट रहता हूं। जंहा तक छब्बीस जनवरी की बात की जाये तो यह डेट मुझे मिल रही थी तो मैंने ली, वरना कोई जरूरी नहीं था।

 


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Mayapuri

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