INTERVIEW: 7/8 साल बाद बंगाल ही हमारे घर चला आया” – अमिताभ बच्चन

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लिपिका वर्मा

श्री अमिताभ बच्चन सदी के महानायक जो तारीफ के मोहताज बिल्कुल भी नहीं है। किन्तु आज भी अपने विनम्र स्वभाव से सब के मन को जीत लिया करते हैं। बड़े – छोटे जो कोई भी हो अमितजी के व्यक्तित्व से बहुत कुछ सीखते हैं।  लेकिन वह यही कहते हैं, “मैं क्या सीख दूँ नौजवान पीढ़ी बहुत ही गुणी और ज्ञानी है। बस यही कहना चाहूंगा कि जीवन है, उसमें जो भी उतार चढ़ाव आते हैं उनसे आप कुछ सीख लें और आगे बढ़ें। मैं अपने आप को सौभाग्यशाली मानता हूँ कि आज के निर्देशकों के पास बहुत अलग अलग कहानियां हैं जिस में आज भी वह मुझे देख पाते हैं। आज की नौजवान पीढ़ी से ऊर्जा मिलती है मुझे।”

आप एक बारी फिर निर्देशक रिभु के साथ काम कर रहे हैं फिल्म, “तीन” में क्या कहना चाहेंगे आप ?

‘युद्ध’ में अनुराग कश्यप से मिले थे और रिभु से वादा किया था कि आगे भी कुछ फिल्म उनके साथ करेंगे, सो, “तीन” के विषय पर विचार विमर्श करने के बाद हमने इस फिल्म से जुड़ने की इच्छा जताई।

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आपका कोलकाता से गहरा रिश्ता है क्या कहना चाहेंगे ?

दरअसल में उन दिनों ग्रेजुएट होने के बाद नौकरी ढूंढनी पड़ती थी और हमारे   बड़े बूढ़ों का यह विचार होता कि कम से कम ग्रेजुएट होना हर बच्चे के लिए जरुरी है। आजकल तो बहुत अन्य पढ़ाई भी होती हैं। सो किसी ने हमसे कहा, “ऑल इंडिया रेडियो” में एनाउंसर की नौकरी है। कोलकाता में भी यूं ही नौकरी के सिलसिले से हम वहां पहुँच गए और हमारी पहली नौकरी कोलकाता में लग गयी। लगभग 7/8 साल रहे कोलकाता में। उस समय बड़ी अजीब सी फीलिंग्स हुआ  करती क्योंकि बहुत सारी चीज़ों का ध्यान रखना होता – जैसे घर का किराया देना होता था, पहली नौकरी और पहली पहली पेमेंट। बहुत कुछ सम्भाल सम्भाल कर  करना होता था। उस समय का अनुभव और वह दौर हमेशा याद आता है। मेरे काफी बांग्ला मित्र भी बन गए थे। ‘पीकू’ फिल्म की शूटिंग और ‘तीन’ फिल्म की शूटिंग के समय रात-बरात चुपचाप घूमने निकल जाया करते और पुरानी यादें भी  ताज़ा हुई वहां पर। कोलकाता में ऋतुपर्णा घोष की फिल्म भी की थी हमने और ‘याराना’, ‘दोस्ताना’ फिल्म भी शूट की थी कोलकाता में। काफी महत्वपूर्ण रिश्ता है कोलकाता से।

यह कहना ज्यादा नहीं होगा कि जयाजी भी बंगाली ही हैं – कुछ बतलाएं इस बारे में ?

हंस कर बोले “हाँ 7/8 साल बाद बंगाल ही हमारे घर चला आया। दरअसल में शुरुआती तौर पर हम यही सोचते रहे कि हमने सबसे ज्यादा काम बांग्ला मेकर्स के साथ ही किया है। किन्तु अब पता चला कि सबसे ज्यादा काम रामू (राम गोपाल वर्मा) के साथ ही किया है। मिष्ठी भाषा के अतिरिक्त बांग्ला लोग स्नेह  प्रिय हैं, होनहार भी बहुत होते हैं। दरअसल में जल्दी किसी को पसंद भी नहीं करते हैं किन्तु एक बारी किसी को पसंद कर लें तो फिर स्नेह हमेशा बना ही रहता है। संगीत उनमें कूट कूट कर भरा होता है, बहुत निपुण होते हैं हर कला  क्षेत्र में, हमारे जितने भी सह कलाकार रहे उनसे हमेशा मिलने का मन होता है और उन्होंने हमेशा हमारा मनोबल बढ़ाया ही है।

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फिल्म, “तीन” में आपने स्कूटी भी चलाई है क्या कहना चाहेंगे कैसा रहा अनुभव ?

अनुभव बहुत अच्छा रहा क्योंकि हम लोगों के पास इतने पैसे नहीं थे कि मेरे लिए एक स्कूटी खरीद ली जाये, कॉलेज में जिसके पास स्कूटर होता उसे बहुत अमीर और हीरो माना जाता। कार वाले स्टूडेंट को तो सब कॉलेज में किंग माना करते हाँ! कॉलेज के दिनों में हम बारी बारी उसकी स्कूटी चला लिया करते। फिल्म, “तीन” के किरदार के पास एक खटारा स्कूटी है। उसे चलाने में काफी दिक्कतों  का सामना करना पड़ा मेरी खुशकिस्मती है कि – कुछ दिन पहले ही मैंने टी वी एस स्कूटी का एक एड शूट किया था और मुझे एक स्कूटी भेंट में मिली। स्कूटी को चलाना मैंने वापस सीखा और इसी वजह से शूटिंग के दौरान स्कूटी चलाने में मुझे आसानी रही। बस बहुत ही मजा आया, यही कहूंगा कि मुझे कॉलेज के दिन याद आ गए।


Mayapuri