INTERVIEW: ‘‘फिल्म ‘दो लफ्जों की कहानी’ की फैंटेसी भी है..’’ – रणदीप हुड्डा

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रणदीप हुड्डा बॉलीवुड के उन चंद अभिनेताओं में से एक हैं, जो कि अपनी कला को निरंतर मांझते रहते हैं। ‘सरबजीत’ के बाद अब वह काजल अग्रवाल के साथ फिल्म ‘दो लफ्जों की कहानी’ में नजर आने वाले हैं। दीपक तिजौरी निर्देशित यह फिल्म एक कोरियन फिल्म ‘ऑलवेज’ का हिंदी एडॉप्टेशन है।

फिल्म ‘सरबजीत’ को बॉक्स ऑफिस पर भले ही आपेक्षित सफलता न मिली हो, मगर आपके अभिनय को सराहा जा रहा है। आपको खुद किस तरह की प्रतिक्रिया मिल रही है ?

मुझे सबसे बड़ा पुरस्कार तो सरबजीत के परिवार से मिला, जब दलजीत कौर ने कहा कि वह चाहती हैं कि मैं उनके शव को कंधा दूं यानि कि इस परिवार ने मुझे स्वीकार कर लिया। उसके बाद जब हमने फिल्म के कुछ दृश्य उन्हें दिखाए, तो कुछ दृश्यों पर उन्होंने तालियां बजायी, तो कुछ दृश्यों में वह रोई भी, तो मुझे लगा कि इस फिल्म में अभिनय करने का मुझे पुरस्कार मिल गया उसके बाद फिल्म का प्रीमियर देखकर अमिताभ बच्चन जैसे लीजेंड कलाकार ने मेरे अभिनय की तारीफ करते हुए प्यार भरा पत्र लिखकर भेजा जब बच्चन साहब किसी की तारीफ में कुछ भी लिखकर भेजते हैं, तो वह इंसान वैसे ही गदगद हो जाता है। सोशल मीडिया पर बहुत तारीफें आ रही हैं मेरे सबसे बड़े आलोचक रहे मेरे पिता जी ने फिल्म ‘सरबजीत’ देखने के बाद मुझसे कहा कि, ‘बेटा! अब इससे आगे क्या करोगे?’ कुछ लोग फिल्म देखकर निकलते ही फोन करते हैं, पर वह कुछ बोल नहीं पाते हैं कुछ लोग फोन करके कहते हैं कि परदे पर उन्होंने रणदीप हुड्डा नहीं, बल्कि असली सरबजीत को देखा मेरी कोशिश भी यही थी और अपनी इस कोशिश में मैं सफल रहा यही मेरा सबसे बड़ा पुरस्कार है।

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अमिताभ बच्चन के पत्र ने आप पर क्या असर डाला ?

बहुत बढ़िया लगा हम उनकी फिल्में बचपन से देखते आ रहे हैं। वह मिलेनियम के पार हैं, उनसे कॉम्पलीमेंट मिलना, मेरी सबसे बड़ी हौंसलाफजाई रही। फिल्म इंडस्ट्री से भी मुझे एक नयी पहचान मिली है तो अब मेरे सामने अगली फिल्मों में कुछ बेहतर करने की चुनौती है, जिसे मैं करके दिखाऊंगा और अब लोगों को फिल्म ‘दो लफ्जों की कहानी’ में मेरा एक अलग रंग नजर आएगा।

फिल्म ‘दो लफ्जों की कहानी’ क्या है ?

यह एक साधारण प्रेम कहानी है जो कि एक गुजरे हुए जमाने के बॉक्सर और एक अंधी लड़की के बीच पनपती है यह प्यार महज एक इत्तेफाक है क्योंकि यह एक किस्मत का कनेक्शन है जिसका राज अंत में खुलता है। छोटे शहरों में लोग अपने प्यार के लिए बहुत कुछ करना चाहते हैं, यही इस फिल्म में है। छोटे शहरों में यदि कोई किसी लड़की को छेड़ दे, तो उसकी मौत निश्चित समझ लें ऐसा ही कुछ इमोशन इस फिल्म में भी है। फिल्म ‘दो लफ्जों की कहानी’ की सबसे बड़ी फैंटेसी यह है कि मेरी पत्नी या मेरा पति मेरे लिए मर मिट जाए। यह फिल्म देखने में दर्शकों को बेहद रोमांचक लगेगी।

आपने ‘दो लफ्जों की कहानी’ करने के लिए हामी क्यों भरी ?

मैं लंबे समय से एक कमर्शियल फॉर्मूले वाली फिल्म करना चाह रहा था वह मौका मुझे इस फिल्म में मिला दूसरी बात मैंने पांच छह साल पहले एक कोरियन फिल्म ‘ऑलवेज’ देखी थी। इस फिल्म को देखने के बाद मेरे दिमाग में ख्याल आया था कि यदि इस फिल्म को हिंदी में बनाया जाए, तो उसमें मैं जरुर पूर्व बॉक्सर का यह जो मुख्य किरदार है, वह निभाना चाहूंगा। एक दिन जब दीपक तिजौरी इस फिल्म की स्क्रिप्ट मेरे पास लेकर आए, तो मुझे उनके अंदर एक आग नजर आयी, मुझे उनके अंदर नए तरीके से काम करने की चेष्टा नजर आयी तथा मुझे लगा कि मुझे तो मुँह मांगी मुराद मिल गयी।

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फिल्म के अपने किरदार को लेकर क्या कहेंगे ?

मैंने इसमें सूरज नामक एक पूर्व बॉक्सर का किरदार निभाया है, जिसका फाइटिंग नाम है- ‘स्ट्रांग’ यानि कि तूफान, मेरी भुजाओं पर टैटू बने हुए हैं। पूर्व बॉक्सर है, पर शर्मिला, शांत रहने वाला, अकेलेपन की जिंदगी जीने वाला इंसान है। वह जब फाइटिंग छोड़़ चुका होता है, तब जेनी (काजल अग्रवाल) नामक एक लड़की उसकी जिंदगी में आती है। वह इस लड़की की मदद करना चाहता है पर सूरज को तो सिर्फ लड़ाई करके ही पैसे कमाने आते हैं, इसलिए वह फिर से फाइटिंग को ज्वाइन करता है कुछ चीजें ऐसी होती हैं कि वह फाइटिंग के जरिए ही अपनी माशूका की मदद करता है।

फिल्म ‘दो लफ्जों की कहानी’ के सूरज के किरदार के साथ न्याय करने के लिए किस तरह की तैयारी करनी पड़ी ?

‘दो लफ्जों की कहानी’ के लिए मैंने अपने मसल्स बढ़ाए हैं पूरे छह माह तक ‘सुपर फाइटर लीग’ के सर्वश्रेष्ठ फाइटर इरफान खान से हर दिन सुबह दो घंटे ट्रेनिंग लेता था। शाम को मंसूर तय्यब के साथ दो घंटे ट्रेनिंग लेता था यह पहली बार हुआ है कि फिल्म के निर्माता अविनाश राय भी सुबह शाम मेरे साथ मेहनत करते थे पूरे छह माह तक मुझे दर्द निवारक दवाएं खाकर रहना पड़ा। ट्रेनिंग के दौरान मेरे जोड़ दर्द करते थे बहुत तकलीफ होती थी मैंने बहुत दर्द सहन किया है और अविनाश राय मुझसे कहते थे कि, ‘आपकी जो यह मेहनत है, जो चेष्टा है, उसे मैं आपके साथ रहकर बनाए रखूंगा ’मैंने फाइटिंग, किक, बॉक्सिंग, कुश्ती भी सीखी। ‘दो लफ्जों की कहानी’ के लिए मुझे बहुत तैयारी करनी पड़ी। सबसे ज्यादा इसी फिल्म के लिए मुझे दर्द सहन करना पड़ा।

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‘सरबजीत’ के बाद ‘दो लफ्जों की कहानी’ देखने वाले दर्शकों को क्या नयापन मिलेगा ?

उन्हें दोनों किरदारों में देखकर आश्चर्य होगा क्योंकि दोनों ही किरदारों में मेरा अलग अलग शरीर है। मैं खुद हैरान हो जाता हूं कि क्या मैं यही हूं। मैंने एक रीयल किरदार सरबजीत का निभाया, तो दूसरी तरफ एक कमर्शियल फिल्म में रोमांटिक किरदार निभाया यह दोनों ही किरदार मेरे लिए नए हैं।

नेत्रहीन लोगों को लेकर आपकी अपनी सोच क्या है ?

इन लोगों के पास एक सिक्स सेंस होती है, जो हम लोगों के पास नहीं होती है उसे मैंने सीखा है, समझा है। फिर प्यार तो किसी से भी हो सकता है अपंग इंसान है, इसका अर्थ यह नहीं कि उसमें प्यार की भावना नहीं हैं। नेत्रहीन इंसान हो या भावनात्मक स्तर पर टूटा हुआ इंसान हो, हर किसी को प्यार जल्दी हो जाता है।

काजल अग्रवाल को लेकर क्या कहेंगे ?

बहुत चुलबुली एक्ट्रेस हैं उनके अंदर जोष है, वह बेहतरीन अदाकारा हैं। हमने 40 दिन एक साथ शूटिंग की और इस दौरान हमने मस्ती मजाक भी किया।

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आप किसी किरदार के लिए जो ट्रेनिंग लेते हैं, वह पूरी तरह से परदे पर नजर आती है.. ?

जैसे जैसे मेरा तजुर्बा बढ़ता जा रहा है, वैसे वैसे मैं हर तरह का किरदार करने में सक्षम होता जा रहा हूं। मैं किसी किरदार के लिए जितनी तैयारी करता हूं, उसका 30 या 40 प्रतिशत ही कैमरे के सामने आता है। मेरी तैयारी के बाद सेट पर पहुँचते पहुँचते लाइट, कैमरा, बूम आदि की वजह से ध्यान भंग होने पर उस तैयारी का प्रतिशत घटता रहता है पर मेरे अनुभव के आधार पर धीरे-धीरे उसका प्रतिशत बढ़ता जाएगा, क्योंकि अनुभवों से मैं ध्यान केंद्रित करना सीख रहा हूँ।

आलोचकों की राय आपके लिए कितनी अहमियत रखती है ?

देखिए, एक कलाकार के तौर पर हमें अपने अंदर से पता होता है कि हमने क्या सही किया है या क्या गलत यह अलग बात है कि इस बात को कोई कलाकार स्वीकार करता है, तो कोई नहीं। जब आलोचक मेरी आलोचना करते हैं, तो मैं बहुत ज्यादा निराश नहीं होता हूं जब आलोचक मेरी प्रशंसा करते हैं, तब मै फूलकर कुप्पा नहीं होता असली राय तो परिवार के सदस्य दे ही देते हैं। कम से कम मेरे परिवार का हर सदस्य बड़ी ईमानदारी से अपनी राय देता है।

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कोई नयी फिल्म ?

दूसरी दो फिल्में अभी पूरी की हैं, जिनके नाम अभी तक नहीं रखे गए हैं। अब मैं पूरे दस साल के बाद कुछ दिनों की छुट्टी पर जा रहा हूं, पिछले एक डेढ़ साल से तो वजन घटाने व बढ़ाने में तकलीफ सही अब आराम करना चाह रहा हूं कुछ रोचक फिल्मों की तलाश भी है।

कोई बायोपिक फिल्म कर रहे हैं ?

राजा रवि वर्मा पर एक बायोपिक फिल्म ‘रंगरसिया’ कर चुका हूं। इसके अलावा फिल्म ‘डी डे’ दाउद इब्राहिम पर थी पर भविष्य में कोई अच्छा मौका मिला, तो जरूरी करूंगा।

 


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Mayapuri

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