INTERVIEW!!! मैं कभी आर्ट फिल्म नहीं बनाऊंगा… अनीस बज़्मी

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आपने को सदा पब्लिक फोकस से अलग अलग रखने वाला फिल्म मेकर अपनी लाजवाब यात्रा बतौर लेखक, निर्देशक बता रहें है?
स्वंय को फिर से खोज निकालने के बारे मेंः- मेरी किसी भी फिल्म के प्रदर्शन के पश्चात् मैं उसे कभी नहीं देखता क्योंकि मैं जाने अनजाने अपनी फिल्मों से प्रभावित नहीं होना चाहता हालाकि मैं अब तक पचास फिल्मों से ज्यादा फिल्में बना चुका हूं फिल्म नोएन्ट्री जबर्दस्त हिट फिल्म थी और कई बार टी.वी. में प्रसारित भी हो चुकी है। आप वेलकम को भी कभी भी एन्जाॅय कर सकते है। पर मैंने अपने को वक्त के साथ बदल लिया है मैं विश्व भर की फिल्में देखता हूं और इस बात का ख्याल रखता हूं कि मेरी फिल्म मेकिंग का स्टाइल घिसी पिटी ना हो, मैं इस बात का ख्याल भी रखता हूं कि मेरी यूनिक में युवा सहायक हो ताकि युवा वर्ग के साथ मेरा कोई काॅम्यूनिकेशन गौप ना रह जाये। मैं अपने यंग बच्चों के साथ फिल्में देखता हूं और मुझे ऐसा नहीं लगता जैसे मैं 53 वर्ष का हो चुका हूं। मैं दिल से अभी बहुत युवा हूं, मैं हमेशा एक से बढ़कर एक फिल्में बनाने की सोचता रहता हूं मैं 12 महीने सिर्फ फिल्मों पर काम करता हूं, इसके अलावा मेरी कोई और हाॅबी नहीं है, जो मैं कल लिख चुका होता हूं वह मुझे आज पुरानी लगती है।

किस तरह वे प्रत्येक स्टार्स से काॅन्फिडेन्स महसूस करते है?

यदि आप एक के बाद एक सुपर हिट फिल्में देते है तो कोई स्टार आपको कोई प्रश्न नहीं करेगा, फिल्म ‘वेलकम’ के सेट पर स्व फिरोज भाई ने मुझसे कहा था कि वे मेरे शूट से इत्तफाक नहीं रखते है।, मैंने उनसे वादा किया कि फिल्हाल आप वही करते रहिये जो मैं कह रहा हूं, बाद में मैं जरूर बताऊंगा कि मैं फला दृष्य को इस तरह क्यों शूट कर रहा हूं। मैं अपने स्टार्स को अपने बच्चों जैसा ट्रीट करता हूं, मुझे पता है नाना पाटेकर किसी गुस्सेवाले बच्चे जैसे है जाॅन बहुत धीरज वाला है, अक्षय की तरह, नाना ने कहा था कि वह कच्छी मिट्टी की तरह है, मैं चाहे उसे किसी भी रू में ढाल सकता हूं, नाना वाकई बहुत अच्छे कलाकार है महान एक्टर है, महान इंसान भी है। उन्होंने कभी ‘वेलकम’ जैसे काॅमेड़ी नही की। फिल्म ‘वेलकम बैक’ में वे अलग तरह के रोल कर रहे है।, उन्होंने ना ‘वेलकम’ की तरह कोई रोल अब तक किया ना ‘वेलकम बैक’ की तरह किया, नाना का कहना है कि उन्हें मेरे कनैक्शन पर विश्वास है उन्हें पता है कि निर्देशक को उस फिल्म के बारे में ज्यादा जानकारी है कई बार कुछ मुद्दों पर टकराहत हो जाती है पर यह तो स्वभाविक है अनिल कपूर का एनर्जी लेवल लाजवाब है मैं पचास रिफ्लेक्टर लगा भी दूं तो वह पलक नहीं झपकाते है 58 के उम्र में भी।

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बतौर निर्देशक उनका इमानदार और खरा होना?
सच्चाई में बड़ा दम है, जब आप सच्चाई से काम करते हो तो आपके स्टार्स भी आपको रेस्पेक्ट करता है, आपको उनकी चमचागिरी नहीं करनी पड़ती है, मैं अपनी फिल्म के प्रत्येक एक्टर से स्क्रिप्ट सुनाते वक्त कुछ भी नहीं छुपाता, जब कलाकार यह जान लेता है कि आपका उद्धेशय अच्छी फिल्म बनाने का है तो वह आपको पूरा मौका देता है कि उनसे कसकर काम निकाला जाय, बतौर एक्टर हमें सिर्फ अपने कलाकारों की समस्याएं ही नहीं जानना है बल्कि अपनी समस्याएं भी बताना है, मैं इमानदार हूं स्पष्ट बोलता हूं मुंहफट हूं इसलिए कई बार इसकी कीमत भी चुकाता हूं। कई बार तो मैं यहां तक बोल देता हूं अपने कलाकारों को कि अगर वे जबर्दस्ती अपना मनमाना शाॅट भी देंगे तो मैं उसे फिल्म में रखूंगा ही नहीं, काट दूंगा।

राज कपूर के सहायक होने के बारे में?
मैने राजकपूर से ज्यादा मेहनती कोई दूसरा निर्देशक नहीं देखा, वे थकते ही नहीं थे, उन्ही से प्रेरित हो कर मैं गर्मी हो या बरसात, बारहों महीने परिश्रम करता रहा मैंने फिल्म ‘प्रेम रोग’ के लिये बतौर उनके अंतिम सहायक चार वर्षों तक काम किया, उनके अलावा मैंने जैनेन्द्र जैन तथा रवीन्द्र पीपट के साथ भी काम किया और अन्य 15 फिल्म मेंकर्स के साथ भी काम किया, मैंने फिल्म ‘स्वर्ग’ ‘शोला’ और शबनम ‘बोल राधा बोल’ बगैरा फिल्में लिखी। जब फिल्म ‘बोल राधा बोल’ का विषय सुनाने के लिये मुझे नितिन मनमोहन के आॅफिस में चिन्टू के पास आना पड़ा तो चिन्टू (ऋषि कपूर) को इस बात पर बहुत आश्चर्य हुआ कि मैं इतनी देर से पहुंचा और फिर मैं राइटर बन गया। क्योंकि वह मुझे उनके पापा के सहायक के रूप में ही जानता था। उन्हें बोल राधा बोल का विषय बहुत पसन्द आया। वह फिल्म उनका इन डिमान्ड हीरो के रूप में अंतिम फिल्म थी, वे मुझे बच्चे जैसा प्यार करते रहे है।

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पच्चीस निर्देशकों के साथ काम करना?
प्रत्येक निर्देशक का अपना अनोखा स्टाइल है एक ही विषय पर हर एक निर्देशक अलग टाइप की फिल्म बना देगा, मैं सारे निर्देशकों के अच्छे प्वाइंटस को ले लेता हूं, मै लक्की हूं कि मैंने पच्चीस निर्देशको के साथ काम किया, कई बार साल भर उनके साथ बैठा। मैंने मनमोहन देसाई जी के लिये फिल्म दीवाना मस्ताना लिखी, पर वे उन दिनों काफी बीमार थे, निर्देशन के बारे में किसी किताब को साल भर पढ़ने से अच्छा है किसी गुरू के साथ चार दिन काम सीखना। मैंने ना सिर्फ सीखा कि क्या करना है बल्कि यह भी सीखा कि क्या नहीं करना है। जब मैं सेट पर बतौर निर्देशक मौजूद होता हूं तो अपने अंदर के राइटर को भूल जाता हूं, कई बार मैं खुद अपने लिखे सीन काट देता हूं। मेरे हिसाब से निर्देशक कैप्टन आॅफ द शिप होता है।

एडिटिंग तथा आर्ट डायरेक्शन सीखना?
मैं एडिटिंग तथा आर्ट डिपार्टमेन्ट में भी था, मै प्रदीप सूरी जी का सहायक था फिर गंगा जी को आर्ट डिपार्टमेन्ट में ज्वाइन किया। तीन फिल्मों के लिए, राजा साहब के साथ भी मैं चार वर्षो तक एडिटिंग में रहा, उस वक्त पैसे कमाने के लिए यह सीख रहा था, मुझे याद है 1976 में सूरी साहब मुझे प्रतिदिन पांच रूपये देते थे जो काफी बड़ी रकम थी उस जमाने मे आज भी मैं फिल्म एडिटिंग कर सकता हूं।

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किस तरह टाइप्ड ना बनने की इच्छा से घर पर बैठा रहा?
जब मैंने फिल्म ‘प्यार तो होना ही था’ (रोमांटिक फिल्म) बनाई तो कई लोगों ने कहना शुरू किया कि मैं सिर्फ रोमांटिक फिल्में ही बना सकता हूं जबकि मै सस्पेन्स थ्रिलर बनाना चाहता था, पर कोई मुझे यह मौका दे ही नही रहा था आखिर चार वर्षो के बाद नितिन मनमोहन ने मुझे मौका दिया। उसके बाद तीन वर्ष फिर से घर बैठने के बाद मुझे एक काॅमेडी फिल्म ‘नोएंट्री’ बनाने का मौका मिला, उसके बाद मैंने काॅमेड़ी फिल्मों को मना नही किया, मैनें फिल्म ‘वेलकम’ ‘सिंह इज किंग’ बगैरा और मेरी सारी फिल्में हिट होती रही, आगे से मैं छोटी छोटी फिल्में बनाना चाहता हूं जो रिस्की नही है ताकि मेरी वजह से किसी निर्माता को नुकसान ना पहुंचे। मैनें नये लोगों को लेकर ‘इटस भाई लाइफ फिल्म बनायी थी लेकिन बदकिस्मती से वह रिलीज नहीं हुई। मैं एक इमोशनल इंसान हूं, कमेडी फिल्मे तो मैं तब लिखता हूं जब मेरा मूड खराब रहता है।
अक्षय और विपुल को वे निर्देशित करेंगे?
किसी फिल्म के रिलीज से दो दिन पहले मैं अपना एडिटिंग रूम छोडता ही नहीं हूं और ना ही प्रोमोशन्स पर जाना पसन्द करता हूं। मैं खुश हूं कि मेरे बारे में यह कहा जाता है कि अगर अनीस बज्मी निर्देशक है तो फिल्म अच्छी होगी, दर्शकों का इतना प्यार मुझे भाव विभोर कर देता है मैंने अक्षय के साथ सिंह इज किंग बनाई, मुझे लगता है कि यह फिल्म अक्षय की बेहतरीन फिल्मों में से एक है, अक्षय और विपुल के साथ मेरा रैपर्ट बहुत अच्छा है, मुझे इसका अफसोस नही है कि मैं अक्षय को सिंह इज ब्लिंग में डायरेक्ट नहीं कर रहा हूं, जब भी जरूरत होगी मैं अक्षय के साथ, विपुल के साथ हरी बावेजा, अब्बास मुस्तान डेविड धवन के साथ काम कंरूगा।

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डेविड के साथ उनकी केमिस्ट्रीः– डेविड के साथ मैंने कई फिल्मों में काम किया जैसे शोला और शबनम, बोल राधा बोल, राजा बाबू बगैरा मैंने उनके लिये लिखा, हम दोनों एक दूसरे को बहुत अच्छी तरह समझते थे मुझे बताया गया था कि सैंकड़ो बेस्ट राइटर्स सफल निर्देशक नहीं बन पाये थे इसलिए मुझे डर तग रहा था और मैंने निर्देशक बनने के बावजूद राइटर बने रहने की ठान ली। लक्कीली मेरी सारी फिल्में हिट हुई। मैंने डेविड के लिए मुझसे शादी करोगी व्यस्त होने के बावजूद लिखी, मैं कभी किसी के साथ इगो वाला मामला नहीं रखता, मेरे पास फिल्मों के अलावा कुछ सोचने का समय ही नही।

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बतौर राइटर अपने मेन्टल ब्लाॅक्स को कैसे निपटाते है?

जब आप दिशाहीन होने लगते है तो मेन्टल ब्लाॅक में फंस जाते है, जब आप किसी सही स्ट्क्चर में काम नहीं करते तो ऐसा हो जाता है, नाना को मैंने पहले ही बता दिया था कि ‘वेलकम’ फिल्म हिट होगी पर उन्होने कहा था यह तो शुक्रवार को ही मालूम पड़ेगा, पर मैं तो समझ ही गया था कि वेलकम हिट होगी ही, अब कितनी बड़ी हिट होगी वह शुक्रवार को पता लगेगा, स्क्रीनप्ले एक ग्रामर (व्याकरण) की तरह है, अगर आप सही व्यकरण का इस्तेमाल करेंगे तो कभी दिशाहीन, मेन्टल ब्लाॅक नहीं होगें।

पीछे मुड़कर अपने कैरियर को देखते है तो?
अपने 39 वर्षो के कैरियर की तरफ मुड़कर देखता हूं तो बहुत संतुष्ट होता हूं, बतौर राइटर मै नम्बर वन रहा, चेन्नई के एअरपोर्ट में पांच कारे मुझे हाटल तक पहुंचाने के लिए खड़ी रहती थी, मेरे लिए नित चार पांच निर्माता घंटो मेरा इंतजार करते थे मैने दो फिल्मों में एक्टिंग भी की जब वे एक्टर्स शाॅट देने नहीं आ पाये जिन्हे वह रोल करना था (प्रतिबंध तथा अंगरक्षक) सभी कलाकारो ने कहा मैने अच्छा काम किया।

उनकी बेहतरीन फिल्मेंः-
आँखे, दीवानगी, नोएन्ट्री, वेलकम, बोल राधा बोल, शोला और शबनम बतौर मेरी बेहतरीन फिल्में थी तथा दीवानगी, नो एन्ट्री, वेलकम, सिंह इज किंग तथा बेलकम बैक बतौर निर्देशक मेरी बेस्ट फिल्में है। अब मैं ज्यादा मैच्चोर हो गया हूं और मेरी बेस्ट फिल्म अभी आना बाकी है। मैं अपनी फिल्मों से कभी संतुष्ट नहीं होता हूं और हमेशा रीशूट करने को तैयार रहता हूं। मैं राजकुमार हिरानी तथा रामू के काम की सराहना करता हूं।

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कभी आर्ट फिल्म क्यों नही बनायेंगे?
मैं कभी आर्ट फिल्में नहीं बनाऊंगा। बोरिंग आर्ट फिल्में ना बनाने का धैर्य है ना देखने का एक बार मैंने अपने घर की टी.वी. सेट तोड़ दिया था क्योंकि उसमें कोई आर्ट फिल्म दिखाई जा रही थी एलर्जी है मुझे आर्ट फिल्मों से।

वेल्कम बैक के बाद क्या?
वेल्कम बैक ‘बनाना’ ‘वेल्कम’ बनाने से भी ज्यादा टफ था, क्योंकि मुझे ऐसी फिल्म बनानी थी जो वेलकम जैसी होते हुए भी वेलकम जैसी ना हो, दो धारी तलवार पर चलने के बराबर है यह। ‘नोएन्ट्री में एन्ट्री’ तथा ‘गौरांग की फिल्म ‘आंखे’ मेरी आने वाली दो फिल्में है। सलमान भाई ने मेरी एक कहानी बहुत पसंद की है पर मैंने बाॅनी कपूर जी से वादा किया है कि पहले मैं नोएन्ट्री में एन्ट्री बनाऊंगा जिसके लिए चार वर्ष तक इंतजार हुआ है वक्त आयेगा तो सलमान भाई को लेकर फिल्म बनाऊंगा, वे अभिनय करने को राजी है। अपने को सदा पब्लिक फोकस से अलग अलग रखने वाले फिल्म मेकर ने अपनी लाजवाब यात्रा बताई, निर्देशक को।


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