INTERVIEW!! ‘‘जीवन में विवाद होने जरूरी हैं’’ – ‘अमिताभ बच्चन’

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हाल ही में अमिताभ बच्चन के साथ फिल्म ‘वजीर’ को लेकर बातचीत तय हुई लेकिन मिलने पर फिल्म पर कम लेकिन फिल्मों से जुड़ी बातों पर ढ़ेर सारी चर्चा हुई। क्यों न पाठकों को भी इस चर्चा में शामिल कर लिया जाये।

आपके कैरियर के साथ काफी सारी कहानियां जुड़ी हुई हैं, जैसे आपने एक फिल्म तेज बुखार होने के बाद भी पूरी की थी ?

उसकी वजह थी क्योंकि उस फिल्म का बेचारा प्रोड्यूसर पहले ही बहुत ओवर बजट हो चुका था। सो हमने सोचा कि कम से कम हमारी वजह से उसका थोड़ा सा नुकसान भी नहीं होना चाहिये।

आप किसी फिल्म में बहुत अच्छा काम करते हैं बावजूद इसके फिर भी विवाद हो जाता है। क्या आप इसे प्रोफेशन का ही एक अंग मानते हैं ?

हमारे ख्याल से विवाद होना अच्छा है क्योंकि जीवन में सब कुछ अच्छा होता चला जायेगा तो जीवन बहुत ही नीरस होता चला जायेगा। इसलिये कुछ अलग होना चाहिये चर्चा होनी चाहिये। हर इंसान अधूरा है वो भी गलतियां करता है। हमें उन गलतियों को स्वीकारना चाहिये। कई बार जब आप लोग हमारी किसी बात को लेकर आलोचना करते हैं तो मैं उसे काट कर अपनी दीवार पर लगा देता हूं जिससे मुझे याद रहे कि हमें इस गलती को सुधारना है।

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कोई ऐसा किरदार जिसे करने के बाद लगा कि ये क्यों किया ?

यहां मेरा कहना है कि हम ऐसा होने ही क्यों दे। हम पहले ही देख भाल ले कि हमें वो किरदार करना है या नहीं। लेकिन हां करने के बाद तो हमारी उसके साथ प्रतिबद्धता हो जाती है, फिर उसके लिये क्यों रोना।

आप विधु विनोद चोपड़ा के साथ दूसरी फिल्म कर रहे हैं और निर्देशक बिजॉय नांबियार के साथ पहली। कैसा अनुभव रहा ?

हमें ‘एकलव्य’ की कहानी भी अच्छी लगी थी और इस फिल्म की कहानी भी अच्छी लगी। अब किसी भी फिल्म का चलना न चलना तो किसी के हाथ में नहीं है। किसी के साथ काम करते वक्त आपको अच्छा लगता है तो आपको उसे पूरा सहयोग देना चाहिये।

बिजॉय नांबियार की बात की जाये तो उनकी सभी फिल्में डार्क और ग्रे शेड्स हैं ?

ये एक थ्रिलर है और इसकी कहानी बताने का ढंग अलग है। मुझे लगता है कि फिल्म देखने के बाद हम एक बार और मिलेंगे और इस पर चर्चा करेंगे। आप भी फिल्म देखने के बाद इसकी चर्चा जरूर करेंगे। जहां तक ग्रे शेड की बात की जाये तो वो होना चाहिये तभी किरदार में रंग आता है।

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क्या ये गुरू और शिष्य की कहानी है ?

बिलकुल नहीं। कहानी है ऐसे दो व्यक्तियों की जिनके जीवन में ऐसी परस्थितियां आ जाती हैं जिन्हें दूर करने के लिये उन दोनों एक होकर काम करना जरूरी हो जाता है। किस तरह ये अन्याय के खिलाफ लड़ते हुये न्याय की खोज करते हैं। ऐसे में कुछ हमारी बातें अच्छी लगेगी कुछ उनकी बातें अच्छी होगी। बेसिक कहानी ये है। इसे आप गुरू शिष्य की कहानी नहीं कह सकते।

क्या आपकी पोती आराध्या ने आपको इस लुक में देखा है ?

अभी नहीं देखा। अभी वे अपने माता पिता के साथ बाहर घूमने गई हुई हैं आने के बाद देखते हैं उनकी क्या प्रतिक्रिया मिलती है।

कम बजट की फिल्मों के बारे में आपको क्या कहना है ?

बहुत सारी फिल्में हैं जो कम बजट की है। सोचिये ‘सरकार’ कितने बजट की फिल्म होगी। सोचिये, अनुमान लगाईये। आप यकिन करेंगे कि सरकार में मेरा सिर्फ आठ दिन का काम था। इसे बनाने वाले की खूबी कहा जायेगा।

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एक वक्त था जब आप एक खास इमेज में बंधे थे और दर्शक भी आपको उसी इमेज के तहत देखना चाहते थे ?

इसे मैं उनका अधिकर मानता हूं कि वे कौन सी फिल्म देखें और कौन सी न देखें। कुछ फिल्में अभी आई जो उन्हें पंसद नहीं आ पाई। ‘निशब्द’ ले लीजिये उसके पिटने को कारण भी अजीब था कि साठ साल का अमिताभ सोलह साल की लड़की से अफेयर नहीं कर सकता, जबकि ‘चीनी कम’ हिट थी क्योंकि उसमें वातावरण भी अलग था।

इन दिनों होम प्रोडक्शंस के तहत क्या हो रहा है ?

काम चल रहा है इससे पहले ‘पा’ में हमारा प्रोडक्शन था, शूजीत की फिल्म में हैं इससे पहले हमने दो मराठी फिल्म बनाई हैं तथा साउथ इंडियन फिल्में भी हम बना रहे हैं। आगे कोई अच्छी कहानी आयेगी तो करेंगे। वैसे उस विभाग को जया जी संभाल रही हैं।

जया जी के बारे में सुना था कि वे कोई स्क्रिप्ट बैंक खोलने जा रही हैं ?

उन्होंने ऐसा सोचा है कि जो कहानीकार अपनी कहानियां लेकर भटकते रहते हैं वे एक जगह उसे जमा कर दें। अच्छी सोच है। जया जी एक ऐसी मंडली भी बनाना चाहती है जिसमें सिर्फ फिल्मों को लेकर ही बातें हो। अब आप देखिये कि आप ‘वजीर’ के बारे में सारे सवाल कर रहे हैं लेकिन कोई ये नहीं पूछता कि फलां शॉट देते हुये आपकी क्या सोच थी या कैमरामैन से ये नही पूछा जाता कि फलां शॉट में उसने वैसी लाइटे क्यों लगाई या एडिटर से पूछा जाये कि तुमने ऐसी एडिटिंग क्यों की। इससे होगा ये कि हमारे दर्शकों का फिल्मों को लेकर और ज्ञानवर्धन होगा।

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इरफान के साथ आप काम कर चुके आगे नवाजुद्दीन के साथ काम करने जा रहे हैं, दोनों के बारे में क्या सोचते हैं ?

इरफान एक ऐसे कलाकार हैं कि उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं दिखाई देगी फिर भी वे अपनी बात कह जाते हैं। मुद्रायें बनाना बड़ा कठिन काम होता है। अभिनय करते वक्त हाथों का इस्तेमाल कैसे किया जाये। हम तो यहां व्हील चेयर पर हैं इसलिये हमारे लिये तो सुविधा हो गई है क्योंकि हमने अपने हाथ व्हील चेयर के पहियों पर ही रखने हैं। लोग कहते हैं ये आपके लिये बहुत ही नेगेटिव हैं कि आपको व्हीलचेयर पर बैठा दिया, जबकि मैं मानता हूं कि मेरे लिये ये पॉजीटिव है। अगर नवाजुद्दीन की बात की जाये तो शूजीत सरकार की एक फिल्म है ‘शूबाइट’। उस फिल्म में उन्होंने सिर्फ एक पासिंग शॉट दिया था। उसे देखकर मैंने शूजीत से पूछा था कि ये अद्भुत कलाकार कौन है, इसे तो और बड़ा रोल मिलना चाहिये था। यही नहीं जितनी भी नई पीढ़ी के लोग हैं क्या काम कर रहे हैं चाहें रणबीर कपूर हो या फिर रणवीर सिंह हो। बाजीराव मस्तानी में क्या काम किया हैं उन्होंने। बहुत मुश्किल है ।

 


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Mayapuri

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